धर्म संस्कृति : संकल्प, बुद्धि, विवेक, भावना, अनुभव और आस्था से व्यतीत हो जीवन

नवकार भवन में आचार्य प्रवर श्री विजयराजजी मसा ने कहा
हरमुद्दा
रतलाम,14 जुलाई। जीवन में 20 से 30 की उम्र के दौरान पुरूषार्थी बनने संकल्प करो। 30 के बाद बुद्धि का उपयोग करो। 40 के बाद विवेक से जियो। 50 के बाद भावनामय हो जाओ और 60 के बाद अनुभवों के साथ रहो। 60 बाद के बाद के आस्था के साथ चलो। जीवन में संकल्प, बुद्धि, विवेक, भावना, अनुभव और आस्था रहेंगे, तो पुरूषार्थ होगा और आलस्य का भाव कभी नहीं आएगा।
यह बात परम पूज्य प्रज्ञा निधि युगपुरुष आचार्य प्रवर 1008 श्री विजयराजजी मसा ने कही। सिलावटों का वास स्थित नवकार भवन में प्रवचन के दौरान उपस्थित श्रावक एवं श्राविकाओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि सबकी जिदंगी अनमोल है। इसमें बीता हुआ कल तो क्या? बीता हुआ पल भी कभी नहीं आता, जिंदगी के सभी पल प्रभु की भक्ति से सार्थक किए जा सकते है। आलसी व्यक्ति भक्ति नहीं कर सकता। आलस्य का चूहा जब जीवन कुतरता है, तो सन्मति जागृत नहीं होती और सन्मति के बिना सदगति का मार्ग नहीं मिलता। सदगति के बिना सिद्धी कभी नहीं मिलेगी।
सभी विद्या होती है पुरुषार्थ से सिद्ध
आचार्यश्री ने कहा कि संसार में जितनी भी विद्या, शिल्प और कलाएं है, वे सभी पुरुषार्थ से सिद्ध हुई है। अयोध्या में अदभुद शिल्प से श्री राम के भव्य मंदिर का निर्माण पुरूषार्थी ही कर रहे है। आलसी व्यक्ति यह कार्य कभी नहीं कर सकता। जीवन में कुछ भी हासिल करना है, तो उसके लिए पुरूषार्थ करना आवश्यक है। उन्होने कहा कि आलस्य दुर्मति का चैथा दोष है। वर्तमान में इससे कई लोग पीडित है। इससे बचाव का एक ही मूलमंत्र पुरूषार्थ है। पुरूषार्थी के जीवन में आलस्य कभी नहीं रहता।
आलसी के दिमाग होते हैं चार प्रकार के
आचार्यश्री ने बताया कि आलस्य का संबंध दिमाग से होता है और आलसी के चार प्रकार के दिमाग होते है। पहला खाली दिमाग, दूसरा खुरापाती दिमाग, तीसरा खर्चीला दिमाग और चैथा खामोश दिमाग। खाली दिमाग शैतान का घर होता है। खुरापाती दिमाग बेईमान का घर होता है। खर्चीला दिमाग अपव्यय का घर और खामोश दिमाग निकम्मेपन का घर है। इसके विपरीत पुरूषार्थी के दो प्रकार के दिमाग है-पहला खुला दिमाग और दूसरा खिला-खिला दिमाग। खुला दिमाग अच्छाईयों का घर है, जबकि खिला-खिला दिमाग सच्चाईयों का घर होता है। सदैव अच्छाइयों और सच्चाईयों के साथ रहने वाला सच्चा पुरुषार्थी है।
परिग्रह से बचने का आह्वान
प्रवचन के आरंभ में उपाध्याय, प्रज्ञारत्न श्री जितेशमुनिजी मसा ने पर का आग्रह रखने वाले परिग्रह से बचने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि जीवन में अर्थ नहीं मिले, तो चलेगा, लेकिन जीवन को अर्थ मिलना चाहिए। विद्वान सेवारत्न श्री रत्नेश मुनिजी मसा ने भी संबोधित किया। आदर्श संयमरत्न श्री विशालप्रिय मुनिजी मसा ने श्रावक-श्राविकाओं से प्रवचनों पर आधारित रोचक प्रश्न किए। संचालन हर्षित कांठेड द्वारा किया गया।