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मूर्ख दिवस पर विशेष : आओ ! टेपा-टेपा खेलें !

मूर्ख दिवस पर विशेष : आओ ! टेपा-टेपा खेलें !

⚫भारत के टेपों में मालवा का टेपा अपनी अलग पहचान रखता है। ‘मूर्खतापूर्ण मासूमियत’ मालवा के टेपा का ‘टॉप सीक्रेट’ है, जिसे वह प्रतिवर्ष 1 अप्रैल को टेपा सम्मेलन में ‘ओपन’ करता है। टेपा की दृष्टि से वैसे भी मालवा ‘आत्मनिर्भर’ है। भारत के टेपा-इतिहास में मालवा का विशेष योगदान है। मालवा का टेपा, जब निर्यात होकर विदेश जाएगा तो इकट्ठा होकर टेपा कालोनी बमाएगा और खेल की दिशा बदल देगा। यह कहते हुए कि ‘बहुत हो चुका क्रिकेट। आओ। टेपा-टेपा खेलें।’ ⚫

⚫ प्रोफेसर अज़हर हाशमी

एक अप्रैल यानी मूर्ख दिवस! जिस दिन दुनिया में मूर्ख दिवस होता है। उसे दिन उज्जैन में पेपर सम्मेलन होता है मैं तो  टेपा सम्मेलन के बहाने शुद्ध मूर्खतापूर्ण विचार व्यक्त कर रहा हूं। शुद्ध शब्द का प्रयोग मैंने इसलिए किया कि इन विचारों में मिलावट नहीं है। मेरे इन मूर्खतापूर्ण विचारों की शुद्ध मौलिकता दर असल शुद्ध मौलिकता है। मिलावट के इस दौर में सिर्फ दो ही मौलिक हैं। एक तो मूर्ख और दूसरा टेपा। यह ‘मौलिकता’ ही इनका चरित्र है। इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि मूर्ख और टेपा अपनी ‘ओरिजनलिटी के कारण ही वर्जिन’ है।

मूर्ख और टेपा के बीच कुछ बारिक विभाजक रेखा है, जिसे समझने में बुद्धिजीवी मूर्खता कर देते हैं। हालांकि ‘बुद्धिजीवी उच्चकोटी के मूर्ख होते हैं, और मूर्ख उच्चकोटी के बुद्धिजीवी’। इसे हम एक वाक्य में इस तरह कह सकते हैं कि ‘बुद्धिजीवी मूर्ख’ और ‘मूर्ख बुद्धिजीवी’ एक-दूसरे के पूरक हैं। मूर्ख और टेपा एक ही सिक्के के दो पहलू है। अंतर केवल ‘हेड’ और ‘टेल’ का है। मूर्ख के पास हेड नहीं होता और टेपा के पास टेल नहीं होता है। तो बात चल रही है कि मूर्ख और टेपा के बीच बहुत बारिक विभाजक रेखा है। मुझ जैसे मुर्ख लेखक की स्थापना यह है कि टेपा दरअसल मूर्ख का ‘तत्सम’ और मूर्ख वास्तव में टेपा का ‘अपभ्रंश’। मूर्ख ‘कच्चा माल’ है और टेपा ‘रिफाइंड प्रोडक्ट’।

टेपावाद तानाशाही नहीं लोकशाही में विश्वास करता

आयात कहां से हुआ यह तो पता नहीं किंतु उज्जैन के टेपों ने अब टेपावाद को विकेंद्रित भी कर दिया है। संपूर्ण मालवा अंचल में अब जगह-जगह टेपा सम्मेलन आयोजित होने लगे है। इससे यह तो सिद्ध हो जाता है कि टेपावाद तानाशाही नहीं लोकशाही में विश्वास करता है, केंद्रीयकरण में नहीं विकेंद्रीकरण में विश्वास करता है। आर्थिक मंदी के इस दौर के बावजूद टेपावाद उफान पर है। यानि तेजी के दौर में है। वह दिन दूर नहीं जब नगर- गांव की बजाय गली-मोहलों में टेपा सम्मेलन होने लगेंगे। टेपा-सम्मेलन में विकेंद्रीकरण की यह लहर तो यही संकेत दे रही है कि जिस तरह से आमों की टोकरियां बाहर भेजी जाती है, उसी तरह ‘अच्छी मांग’ के चलते ‘टेपों की टोकरियां भी विदेशों में निर्यात की जाने लगेंगी। जिस तरह विदेशों में भारतीयों का (योग को वहां योगा ही बोला जाता है। अब तो हम भी हिंग्लिश के कारण ‘योगा’ ही बोलते हैं।) ने धूम मचा रखी है, उसी तरह भारतीय टेपा भी सिक्का जमा देगा।

भारत के टेपों में मालवा का टेपा अपनी अलग पहचान

भारत के टेपों में मालवा का टेपा अपनी अलग पहचान रखता है। ‘मूर्खतापूर्ण मासूमियत’ मालवा के टेपा का ‘टॉप सीक्रेट’ है, जिसे वह प्रतिवर्ष । 1 अप्रैल को टेपा सम्मेलन में ‘ओपन’ करता है। मालवा का विशेषकर उज्जैन का टेपा जिस ‘मासूमियत’ टांग अड़ाता है और फिर टांग खींचता है उसी पर तो एक शोध ग्रन्थ लिखा जा सकता है। (यह मूर्ख लेखक शोधग्रंथ यानी रिसर्चरूपी इस टिपाईगिरी या टीपाटापी का ‘मौलिक कार्य’ बहुत ही जल्द करने वाला है।)

टेपा की दृष्टि से वैसे भी मालवा ‘आत्मनिर्भर’

चूंकि विदेशों में टेपा-खपत’ की दृष्टि से निर्यात की चल रही है अतः ‘मालवा का टेपा’ निर्यात की दृष्टि से बढ़िया है। मालवा का टेपा चाहे ठेलों में भेजों या थेले में टोकरी में भेजो या टोकरे में जहां भी जाएगा, अपना रंग दिखाएगा। टेपा की दृष्टि से वैसे भी मालवा ‘आत्मनिर्भर’ है। भारत के टेपा-इतिहास में मालवा का विशेष योगदान है। मालवा का टेपा, जब निर्यात होकर विदेश जाएगा तो इकट्ठा होकर टेपा कालोनी बमाएगा और खेल की दिशा बदल देगा। यह कहते हुए कि ‘बहुत हो चुका क्रिकेट। आओ। टेपा-टेपा खेलें।’

⚫ प्रोफेसर अज़हर हाशमी

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