विचार सरोकार : प्रकृति में मानव जीवन और नवरात्रि का महत्व

प्रकृति हमें जीवन के लिए आवश्यक तत्व जैसे हवा, पानी, भोजन और आश्रय प्रदान करती है। भारतीय दर्शन में, मानव को प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाए रखने वाला माना गया है। यह पर्व प्रकृति और मानव जीवन के बीच गहरे संबंध को भी दर्शाता है। नवरात्रि वर्ष में दो बार मुख्य रूप से मनाई जाती है – चैत्र (वसंत) और शारदीय (शरद ऋतु) – जो प्रकृति के बदलाव और नवीकरण के चक्र से जुड़े हैं।
बृजेश त्रिवेदी
प्रकृति में मानव जीवन और नवरात्रि का महत्व गहराई से जुड़ा हुआ है, क्योंकि दोनों ही जीवन के चक्र, शक्ति और संतुलन को दर्शाते हैं। मानव जीवन प्रकृति का एक अभिन्न अंग है। प्रकृति हमें जीवन के लिए आवश्यक तत्व जैसे हवा, पानी, भोजन और आश्रय प्रदान करती है। भारतीय दर्शन में, मानव को प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाए रखने वाला माना गया है। हमारा अस्तित्व पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) पर निर्भर है, और इनके संतुलन से ही जीवन संभव है। मानव जीवन का उद्देश्य केवल प्रकृति से लेना नहीं, बल्कि उसे संरक्षित करना और उसका सम्मान करना भी है।

नवरात्रि, जो नौ रातों का पर्व है, शक्ति की देवी दुर्गा की आराधना का समय है। यह पर्व प्रकृति और मानव जीवन के बीच गहरे संबंध को भी दर्शाता है। नवरात्रि वर्ष में दो बार मुख्य रूप से मनाई जाती है – चैत्र (वसंत) और शारदीय (शरद ऋतु) – जो प्रकृति के बदलाव और नवीकरण के चक्र से जुड़े हैं। इन नौ दिनों में माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है, जो शक्ति, साहस, करुणा और ज्ञान का प्रतीक हैं। यह पर्व हमें यह सिखाता है कि प्रकृति की तरह ही जीवन में भी चुनौतियों का सामना करने के लिए आंतरिक शक्ति की आवश्यकता होती है।
प्रकृति और नवरात्रि का आपसी संबंध
नवरात्रि का समय प्रकृति के संतुलन और शुद्धिकरण का भी प्रतीक है। जैसे प्रकृति ऋतु परिवर्तन के साथ खुद को नवीकृत करती है, वैसे ही नवरात्रि के दौरान उपवास, ध्यान और पूजा के माध्यम से मानव अपने शरीर, मन और आत्मा को शुद्ध करता है। यह पर्व हमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और उसके साथ तालमेल बिठाने की प्रेरणा देता है।

प्रकृति मानव जीवन का आधार
प्रकृति मानव जीवन का आधार है, और नवरात्रि हमें उस शक्ति की याद दिलाती है जो प्रकृति और मानव दोनों में निहित है। यह एक अवसर है आत्म-चिंतन, शक्ति संचय और प्रकृति के प्रति सम्मान व्यक्त करने का।
प्रकृति के परिपेक्ष्य
प्रकृति में “क्षय” जैसा कुछ नहीं होता; यह केवल मानव गणना की सीमा है। जब हम कहते हैं किसी भी तिथि का क्षय हुआ, तो इसका मतलब है कि वह तिथि सूर्योदय के समय प्रभावी नहीं रही। लेकिन प्रकृति के लिए यह मायने नहीं रखता कि सूर्योदय कब हुआ। चंद्र तिथि तो अपनी गति से चलती रहती है।
मान्यता बनाम प्रकृति का सत्य
पंचांग में सूर्योदय को तिथि निर्धारण का आधार बनाना एक प्राचीन परंपरा है, जो मानव जीवन को व्यवस्थित करने के लिए उपयोगी है। यह त्योहारों, पूजा-पाठ और सामाजिक कार्यों के लिए समय निर्धारित करता है। उत्सव या व्रत की तिथि निर्धारित करने में लोग असमंजस में पड़ सकते हैं कि कौन सी तिथि मान्य होगी।
मानव और प्रकृति के बीच सेतु है पंचांग
इस संशय को दूर करने के लिए ज्योतिष शास्त्र और स्थानीय परंपराएं मार्गदर्शन करती हैं। आमतौर पर, विद्वान या पंचांग निर्माता यह सुझाव देते हैं कि जिस तिथि का प्रभाव अधिक समय तक रहता है या जो सूर्योदय के समय प्रबल होती है, उसे प्राथमिकता दी जाए। नवरात्रि जैसे त्योहारों में, चूंकि यह नौ दिनों का उत्सव है, तिथि क्षय होने पर भी अगली तिथि को गणना में शामिल कर क्रम बनाया जाता है। पंचांग, मानव और प्रकृति के बीच एक सेतु है, लेकिन यह प्रकृति का केवल एक व्यावहारिक प्रतिनिधित्व करता है, न कि उसका संपूर्ण सत्य।

बृजेश त्रिवेदी