व्यंग्य : आधार का अंतिम संस्कार शुरू? अब डर लगने लगा है...
पंद्रह साल की मेहनत, करोड़ों लोगों का भरोसा, सुप्रीम कोर्ट के फैसले, संसद के कानून – सब एक पंक्ति में दफन। आज जन्मतिथि मरी। कल लिंग की बारी है। परसों नाम मरेगा। फिर पता।
⚫ बृजेश त्रिवेदी
पंद्रह साल की मेहनत, करोड़ों लोगों का भरोसा, सुप्रीम कोर्ट के फैसले, संसद के कानून – सब एक पंक्ति में दफन।
आज जन्मतिथि मरी।
कल लिंग की बारी है।
परसों नाम मरेगा।
फिर पता।
ये खबर नहीं, एक दस्तावेज़ का मृत्यु प्रमाण-पत्र है।
उत्तर प्रदेश ने 24 नवंबर को और महाराष्ट्र ने 26 नवंबर को मिलकर आधार कार्ड को जन्मतिथि के कफन में लपेट दिया। सरकारी आदेश का एक वाक्य इतना ठंडा है कि पढ़ते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

“आधार कार्ड के साथ जन्म प्रमाण-पत्र संलग्न नहीं होता, अतः इसे जन्मतिथि के प्रमाण के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा।”
बस।
पंद्रह साल की मेहनत, करोड़ों लोगों का भरोसा, सुप्रीम कोर्ट के फैसले, संसद के कानून – सब एक पंक्ति में दफन।
आज जन्मतिथि मरी।
कल लिंग की बारी है।
परसों नाम मरेगा।
फिर पता।
और अंत में प्लास्टिक का वो कार्ड मरेगा जिसे कभी “भारत की आत्मा” कहा जाता था।
कल्पना कीजिए वो दिन:
आप रेलवे काउंटर पर सीनियर सिटीजन टिकट लेने जाते हैं।
अफसर मुस्कुराते हुए बोलेगा,
“अंकल जी, आधार में 60 साल लिखा है, लेकिन हम तो अब जन्म प्रमाण-पत्र मांगते हैं।
और हाँ, लिंग भी तो लिखा है Male… वो भी तो अब नहीं मानते न!
जरा मेडिकल बोर्ड का सर्टिफिकेट भी ले आइएगा, वरना लेडीज कोच में भी नहीं बैठने देंगे।”
शादी रजिस्ट्रार के सामने दुल्हन-दूल्हा खड़े हैं।
अफसर फाइल देखकर बोलेगा,
“आधार में Male और Female लिखा है, लेकिन अब ये प्रमाण नहीं।
दोनों जरा जिला अस्पताल से लिंग प्रमाण-पत्र ले आओ,
फिर शादी करवाएंगे… वरना भाग के जाना पड़ेगा!”
बैंक में पेंशन क्रेडिट नहीं हो रही।
मैनेजर फोन पर चिल्लाएगा,
“अरे भाई, आपकी उम्र ही अवैध हो गई है!
जन्म प्रमाण-पत्र लाइए, नहीं तो खाता फ्रीज!”
और एक दिन आएगा जब कोई नया आदेश निकलेगा:
“आधार में जो नाम लिखा है, वो भी अब प्रमाण नहीं।
DNA टेस्ट कराओ, फिर बताना तुम कौन हो!”
ये मजाक नहीं, अगला कदम है।
जिस दिन सरकार ने कहा कि “आधार के साथ मूल दस्तावेज नहीं है, इसलिए उसकी कोई जानकारी मान्य नहीं”,
उस दिन आधार का अंतिम संस्कार शुरू हो गया।
अब सिर्फ चिता जल रही है – हर रोज एक नया लकड़ी का टुकड़ा डाला जा रहा है।
आज जनता सड़कों पर नहीं उतरी,
क्योंकि वो अभी भी लाइन में खड़ी है –
किसी नई लाइन में,
किसी नए सर्टिफिकेट के लिए,
किसी नए अफसर की मुस्कुराहट के लिए।
लेकिन अब सवाल सिर्फ जन्मतिथि का नहीं रहा।
सवाल ये है:
जब एक देश का सबसे बड़ा पहचान-पत्र
अपनी ही सरकारों के हाथों
एक-एक करके अपनी सारी जान गंवा रहा हो,
तो बचा ही क्या है?
बचा है सिर्फ एक प्लास्टिक का कार्ड,
जिस पर लिखा है “Government of India”,
और जिसके नीचे जनता चिल्ला रही है:
“हमारा आधार कहाँ गया?”
सरकार, अब चुप मत रहो।
ये सिर्फ एक दस्तावेज नहीं मर रहा।
एक पूरा भरोसा मर रहा है।
और जब भरोसा मरेगा,
तो फिर कोई भी नया कार्ड, कोई भी नया ऐप, कोई भी नया कानून
उसे जिंदा नहीं कर पाएगा।
जो अभी भी अपने आधार कार्ड को देखकर सोच रहा है –
ये अब कागज का टुकड़ा है या मेरी पहचान का अंतिम अवशेष?
⚫ बृजेश कुमार त्रिवेदी, स्वतंत्र पत्रकार
Hemant Bhatt