शख्सियत
शख्सियत : पेपर लीक मामलों की रोकथाम ज़रूरी
हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार के लिए दीप्ति जी ने ’काव्यदीप हिंदी साहित्य संथान’ की...
शख्सियत : केवल शब्दों का संसार नहीं होती कविता
समकालीन विधाओं में भी स्त्री, दलित, आदिवासी और शोषित वर्गों की अस्मिता और अधिकारों...
शख्सियत : मोबाइल फोन में सिमटकर रह गई आज की दुनिया
डिजिटल दुनिया में जरूरत से ज्यादा रमे रहने पर लोगों में शारीरिक थकान, गर्दन में...
शख्सियत : लोकमंगल और लोक चेतना के तटों के बीच बहती है डॉ....
स्वभाव में सरल, व्यवहार में विमल, कर्म में कुशल, सृजन में सबल और संपादन में सफल—...
शख्सियत : उर्दू को सांप्रदायिक नजरिये से देखना तंग दिमागी...
हिंदी की बोलियों (खड़ी बोली) और फ़ारसी अरबी के मेल से उर्दू का जन्म हुआ और आरंभिक...
शख्सियत : युध्द के कारण बच्चों के अधिकार होते हैं तबाह
युध्द बड़े देशों या गुटों के बीच होते हैं, लेकिन इसकी कीमत उन मासूम बच्चों को चुकाना...
शख्सियत : सोशल मीडिया और गेमिंग की लत बच्चों के लिए ख़तरनाक
अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों की सीखने की प्रक्रिया के लिए हानिकारक है। जाने माने...
शख्सियत : मनुष्य होने का सलीका सिखाता है साहित्य
प्रकृति में समन्वय, संतुलन और लय प्राकृतिक रूप से विद्यमान है। इसलिए वहां जीवन की...
शख्सियत : कविताओं के जरिए डाॅक्टरों को बनाया जा रहा मानवीय...
प्राचीनकाल में वैद्य मरीजों की नब्ज देखते थे, जिसके व्दारा मरीज से उनका आंतरिक रिश्ता...
शख्सियत : ग़ालिब, मीर, दाग़ को पढ़े बिना शायरी नामुमकिन
ग़ालिब, मीर, सौदा, मोमिन खां मोमिन, अमीर खुसरो, ज़ौक, फ़ैज़ अहमद फै़ज़, फिराक़ गोरखपुरी,...
शख्सियत : विश्व पुस्तक मेला छोड़ गया अनेक सवाल
ऐसे में जरूरत है कि जिला स्तर पर पुस्तक मेले और प्रदर्शनियां लगाई जानी चाहिए। इसके...
शख्सियत : धारदार कविताएं क्यों नहीं लिखी जाती हैं अब?
आज की कविता सामाजिक सरोकारों के बजाये निजी भावनाओं का हिस्सा हो चुकी है, वह अमूर्त...
शख्सियत : संपूर्ण भूमंडल को ढंक चुकी स्वार्थ की कालिख़
आज संयुक्त परिवारों का दिन-प्रतिदिन विखंडन हो रहा है, समुदाय टूट रहे हैं, समाज कमजोर...
शख्सियत : गीता की तरह एक और दर्शन लेगा जन्म
जनवरी 2026 तक की स्थिति के अनुसार दुनिया के कई हिस्सों में युध्द और सैन्य तनाव जारी...
शख्सियत : अवधूत जयनारायण बापजी थे धुरंधर वक्ता, अभिभाषक...
जैसा कि लोग बताते हैं जयनारायण जी ने सोचा कि आज उनकी वजह से ईश्वर को तकलीफ पहुंची...
शख्सियत : छोटे और बड़े शहरों के लेखकों के बीच कभी पाटी नहीं...
कस्बाई लेखकों की पांडुलिपियां आर्थिक कारणों से छपने को तरसती रहती हैं और बड़े लेखकों...