शख्सियत : पेपर लीक मामलों की रोकथाम ज़रूरी

हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार के लिए दीप्ति जी ने ’काव्यदीप हिंदी साहित्य संथान’ की स्थापना कर रखी है। इस संस्था के जरिए लगातार साहित्यिक गतिविधियां होती रहती हैं। दीप्ति जी साहित्य के साथ फोटोग्राफी और चित्रकला में भी पारंगत हैं। इस क्षेत्र में इन्हें पुरस्कृत भी किया जा चुका है। 

शख्सियत : पेपर लीक मामलों की रोकथाम ज़रूरी

कवयित्री दीप्ति सक्सेना का कहना

⚫ नरेंद्र गौड़

’देश में पेपर लीक किसी एक परीक्षा या राज्य की गड़बड़ी नहीं, बल्कि करोड़ों के संगठित नेटवर्क में बदल चुका है। 2014 से जुलाई 2026 तक मीडिया रिपोर्टों और आधिकारिक कार्रवाई वाले मामलों के संकलन में कम से कम 116 पेपर लीक के प्रकरण सामने आये हैं। इसके चलते छात्रों का भविष्य बर्बाद हो रहा है। पेपर लीक मामलों की रोकथाम के लिए कारगर उपाय ज़रूरी हैं।’

दीप्ति सक्सेना

यह बात कवयित्री दीप्ति सक्सेना ने कही। इनका कहना था कि पेपर लीक की वजह से करीब 7.5 करोड़ अभ्यर्थी प्रभावित हुए हैं। आज पेपर माफिया का दायरा 19 राज्यों में फैल चुका है। 2014 से 2024 के बीच 89 मामले दर्ज हुए थे। इनमें 21 केंद्रीय संस्थानों और 68 राज्य स्तरीय परीक्षाओं से जुड़े थे। इसके बाद 2025 में 20 और 2026 में जुलाई तक नीट यूजी समेत 7 मामले आये। निश्चय ही यह चिंताजनक स्थिति है। यदि समय रहते इससे नहीं निपटा गया तो आने वाला वक्त़ हमें कभी माफ़ नहीं करेगा।

उत्तरप्रदेश में सर्वाधिक पेपर लीक

 एक सवाल के जवाब में दीप्ति जी ने बताया कि उत्तरप्रदेश पेपर चोरी के 11 मामलों के साथ  सबसे ऊपर रहा, वहीं मध्यप्रदेश और राजस्थान में नौ-नौ, महाराष्ट्र में छह, गुजरात में पांच मामले दर्ज हुए। केंद्र की एसएससी केंद्रीय विद्यालय संगठन, यूपीएससी, सेना, ओएनजीसी और कृषि वैज्ञानिक भर्ती बोर्ड जैसी आठ परीक्षाएं रद्द करना पड़ी। इसके चलते भर्तियां दो से आठ महिने तक खिंची। 2025-26 में बोर्ड, भर्ती, पात्रता, विश्वविद्यालय और मेडिकल प्रवेश परीक्षा तक लीक जारी रही।

तीन लाख से अधिक भर्ती अटकी

दीप्ति जी ने बताया कि देशभर में जनवरी 2019 से जून 2024 के बीच 19 राज्यों में 65 परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक हुए। इनमें सरकारी भर्तियों से लेकर प्रवेश, बोर्ड और विश्वविद्यालय की परीक्षाएं शामिल हैं। इन 65 मामलों में 45 सरकारी भर्ती परीक्षाओं से जुड़े थे। पेपर लीक के कारण कम से कम 27 परीक्षाएं रद्द या स्थगित करना पड़ी। इनमें तीन लाख से अधिक सरकारी पदों पर भर्ती अटक गई।  सबसे ज्यादा निशाने पर शिक्षक और पुलिस भर्ती परीक्षाएं रही।

प्रतिभाशाली बच्चों ने आत्महत्या की

 पेपर लीक के कारण बीसियों प्रतिभाशाली बच्चों ने आत्महत्या करना पड़ी। इनमें  राजस्थान के झुनझुनू निवासी प्रदीप मेघवाल, आकांक्षा चतुर्वेदी, मध्यप्रदेश के धार में रहने वाली अवंतिका जैसे कई बच्चे शामिल हैं। इनकी आत्महत्या के लिए परीक्षा तंत्र जिम्मेदार है। एक दो लोगों के इस्तीफे से यह धांधली रूकने वाली नहीं है, वरन समूचे परीक्षा तंत्र में कसावट लाना अनिवार्य है।

साहित्यिक गतिविधियों को बढा़वा

 उल्लेखनीय है कि हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार के लिए दीप्ति जी ने ’काव्यदीप हिंदी साहित्य संथान’ की स्थापना कर रखी है। इस संस्था के जरिए लगातार साहित्यिक गतिविधियां होती रहती हैं। बदायूं उत्तरप्रदेश में स्व. वीरेंद्र कुमार सक्सेना और श्रीमती मंजु के घर जन्मी दीप्ति जी भौतिक शास्त्र में एमएससी के साथ ही एमएड, नेट- जेआरएफ (शिक्षा शास्त्र) की परीक्षाएं पास कर चुकी है। शासकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय कटसारी, आलमपुर, जाफराबाद, बरेली (उप्र) में आप 11 वर्षों से शिक्षिका हैं। साहित्य के साथ फोटोग्राफी और चित्रकला में भी पारंगत हैं। इस क्षेत्र में इन्हें पुरस्कृत भी किया जा चुका है। 

प्रकाशन एवं पुरस्कार

’बाल ग्रह की सैर’ नाम से इन्होंने बच्चों के लिए कविता संकलन का प्रकाशन किया है। इनका एकल कविता संकलन ’दीप्ति अंदर की रौशनी’ पाठकों में खासा सराहा गया है। इन्होंने तेरह भारतीय एवं एक अंतरराष्ट्रीय साझा काव्य संग्रह में सह कवयित्री के रूप में सहभागिता की है। इसके अलावा अनेक साझा संकलनों में इनकी कविताएं शामिल हैं। आप बच्चों के लिए मनोरंजक तथा ज्ञानवर्धक ई-बाल पत्रिका ’दीया’ की प्रधान संपादक रह चुकी हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में इनकी कविताएं प्रकाशित होती रही हैं। इन्हें अनेक संस्थाओं व्दारा पुरस्कृत किया जा चुका है।

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दीप्ति सक्सेना की कविताएं

तुम्हारे बिना अधूरी हूँ मैं

कैसा वीरान सा लगता
बादलों के बिना आसमाँ
नहीं लगते मनमोहक
फूलों के बिना कोई भी वृक्ष
मन के लबालब तालाब में
कैसे मिलते समर्पण के हंस
प्यासे ही रह जाते
कामनाओं के गूँगे चातक
वियोग की अग्नि जला देती 
सुख का सुरम्य अरण्य
अगर नहीं मिलती मुझे
तुम्हारे प्रेम की सघन वृष्टि
जीवन के कैनवास पर रह जाते
बिना रंगों वाले श्वेत- श्याम चित्र
दिनचर्या होती नीरस अनाकर्षक
जैसे बिना वादन का संगीत
भावनाएँ सुहागन हो खिल उठीं
तुम्हारे एक मधुरिम स्पर्श से
तुम्हारी छाया में पलने लगे
मिलन के अल्हड़ शर्मीले स्वप्न
आओ, परिपूर्णता की माँग भरकर
कल्पनाओं का आलिंगन करो
प्रेम की मिठास से 
भर दो मेरा तन-मन
कि कब से, तुम्हारे 
बिना अधूरी हूँ मैं।

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तुम्हारी याद ले आई...

बरसों पुरानी किताब में
सूखे हुए गुलाब की
भीनी सी गंध छाई
तुम्हारी याद ले आई...
डायरी के पन्नों में छुपी
सौ बार मेरे नाम की
तुम्हारे हाथ की लिखाई
तुम्हारी याद ले आई...
हकीकत का सपना देखती
असली चाहत से भरी
वो नकली सगाई
तुम्हारी याद ले आई...
अफसोस कीमत न चुकी
उस अंगूठी की कभी
इतनी मिली रुसवाई
तुम्हारी याद ले आई...
गमगीन ही करते रहे
हादसे जिंदगी के मुझे
जब-जब फूटी रुलाई
तुम्हारी याद ले आई...

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खिल चुका वसंत

जब तुमने पकड़ा मेरा हाथ
पुष्पित आसमान से जैसे
झरने लगे नये फूल
प्रेम के पंखों की छुवन से
रग-रग में उठती सिहरन से
दौड़ पड़ा रोमांच
स्नेह की गुनगुनी धूप से
खिलती दिल की बगिया में
भरने लगी रंगत
तुम्हारे प्यारे वादों के
शीतल-शीतल छींटें
उड़ेलने लगे आनंद
मन की पगडंडी पर
गिरे हुए गुलमोहर,
विस्मित कर रहे आँखें
मुझ पर तुम्हारे प्रेम का 
गाढ़ा रंग फुसफुसाया,
देखो! खिल चुका वसंत!

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वो रफ कॉपी

कितने ही इम्तहानों को 
जीतने के लिए
कुर्बान होती हैं 
कितनी ही रफ कॉपियाँ
कि जिनपर दोहराए जाते हैं
सैकड़ों सवाल-जबाब बार- बार
आज हाथ पड़ गयी 
ऐसी ही रफ कॉपी
पुरानी अलमारी की 
धूल भरी दराज में
कुछ अनसुलझे सवालों की सने
कुछ बिगड़े लेख से 
बदसूरत हुए पन्ने थे जिसमें
सुबह की किरन को 
स्याही में मिलाकर
लिखे थे कुछ जज्बात अनजाने से
जिनमें सिसकती-बिलखती मिली
एक उलझी-उलझी सी 
अनकही कहानी
ख्वाबों के इकरार की चाशनी में
पूरी तरह सराबोर होकर
हर्फों की मिठास में लिपेटे हुए
निश्चल प्रेम में पगी हुई अधूरी दास्ताँ
जो भर लाई आँखों में पूरा समन्दर
याद आया एक भयानक चक्रवात
जिसके जोर से फड़फड़ाने लगे पन्ने
और बन्द हो गयी 
फिर से वो रफ कॉपी 
हमेशा के लिए।

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एक पुराना प्रेमपत्र

एहसासों के दबे 
कदमों की आहट 
डर के पीछे छुपी 
इच्छाओं की गुनगुनाहट
चुपके से टहलती रहीं 
जिसके गलियारे में
आज बरसों के बाद 
मिला वो प्रेमपत्र...
जैसे मिट्टी की खुदाई में 
मिला हो पुरातन अवशेष
उजाले की बातें
दिल की सीढ़ियों से उतर कर
नाचीं थीं कागज के आँगन में
ख्वाबों की जमीं बनकर कागज
भीगता रहा अरमानों की बारिश से
हकीकत की धूप से 
सूखी एक कहानी
मिली तो खिल से गये 
पपड़ाये होंठ
अतीत की कानफोड़ू 
साँय-साँय के बाद
फिर छा गई एक 
लंबी गूँगी खामोशी।