शख्सियत : सोशल मीडिया और गेमिंग की लत बच्चों के लिए ख़तरनाक

अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों की सीखने की प्रक्रिया के लिए हानिकारक है। जाने माने न्यूरोसाइंटिस्ट होर्वाथ ने चेतावनी दी है कि सीखने- समझने की क्षमता में कमी केवल केरियर तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह भविष्य की जटिल वैश्विक समस्याओं को सुलझाने की मानवीय शक्ति को भी कमजोर कर देगी।

शख्सियत : सोशल मीडिया और गेमिंग की लत बच्चों के लिए ख़तरनाक

कवयित्री आर्यावर्ती सरोज ’आर्या’ का कहना

⚫ नरेंद्र गौड़

  ‘‘अंधाधुंध मोबाइल, लैपटाॅप के उपयोग बच्चों की एकाग्रता खत्म कर रहे हैं। पुरानी पीढ़ी के लोग जहां परिस्थिति का डटकर मुकाबला किया करते थे, वहीं आज आये दिन मामूली बातों को लेकर बच्चे आत्महत्या कर लेते हैं या घर से भाग जाते हैं। सीखने और समझने की क्षमता में निरंतर कमी आ रही है, भविष्य और भी खतरनाक हो सकता है।’’


यह बात कवयित्री आर्यावर्ती सरोज ’आर्या’ ने कही। इनका कहना था कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों की सीखने की प्रक्रिया के लिए हानिकारक है। जाने माने न्यूरोसाइंटिस्ट होर्वाथ ने चेतावनी दी है कि सीखने- समझने की क्षमता में कमी केवल केरियर तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह भविष्य की जटिल वैश्विक समस्याओं को सुलझाने की मानवीय शक्ति को भी कमजोर कर देगी।

एकाग्रता में आ रही कमी

 एक सवाल के जवाब में सरोज जी ने बताया कि सैन डिएगो स्टेट यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर जीन ट्वेंगे के अनुसार अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों की एकाग्रता खत्म कर रहा है, जो कि सीखने की प्रक्रिया के लिए हानिकारक है। सोशल मीडिया और गेंमिंग एप्स को व्यावसायिक हितों के लिए जानबूझकर इस तरह डिजाइन किया गया है कि वे उपयोगकर्ता को लम्बे समय तक बांधे रखें। नवम्बर 2025 के एक अध्ययन के मुताबिक टिकटाॅक अपने सहज इस्तेमाल के कारण सबसे ज्यादा लत साबित हुआ है। इस डीजिटल आदत के कारण बच्चों में अवसाद और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याएं बढ़ रही हैं जिसके मेटा जैसे बड़े प्लेटफाॅम्स पर 1,600 से अधिक परिवारों और स्कूलों ने मुकदमें  दर्ज करा दिए हैं।

आत्महत्या के मामले बढ़े

 सरोज जी का कहना था कि अगर हम भारत की बात करें तो कोई भी अखबार देख लीजिए कम उम्र के लड़के लड़कियां मामूली बात को लेकर फांसी पर लटक जाते हैं, कारण बस इतना था कि उन्हें मोबाइल देखने के बजाए पढ़ने को कहा था। आज आप किसी भी शहर, कस्बे, छोटे से छोटे गांव में चले जाइए ऐसे युवक जिनके शरीर पर भले ही ढ़ंग के कपड़े नहीं हों, लेकिन वह किसी दुकान के पटिए या पेड़ की छाॅह में मोबाइल पर झुके नजर आएंगे। मोबाइल खरीदने को लेकर भी बच्चे अपने मां बाप पर दबाव डालते हैं। उनके किसी सम्पन्न मित्र के पास बीस-तीस हजार रूपए का मोबाइल है तो उन्हें भी वही चाहिए। उन्हें न अपने गरीब मां बाप की फटेहाली की चिंता है और स्कूली पढ़ाई की।

पाँच पुस्तकें प्रकाशित

 सरोज जी का जन्म उत्तरप्रदेश के जिले देवरिया के गांव तिलईबेलवा में सूर्यभान मिश्र और करूणा देवी के घर हुआ। आप एमए कर चुकी हैं एवं वाराणसी के काशी विद्यापीठ ने इन्हें विद्यावाचस्पति की मानद उपाधि प्रदान की है। आपकी पाँच किताबें प्रकाशित एवं चर्चित हैं जिनमें उपन्यास ’छोटी मालकिन’, कहानी संकलन ’कुछ पन्ने जिंदगी के’, बालकथा संकलन ’चंद्रयान’, कविता संग्रह ’सरोज काव्य मंजरी’ और ’निश्चेतन सिलिका’ शामिल हैं। आप दूरदर्शन के विभिन्न चैनलों से रचना पाठ कर चुकी हैं। इनकी एक पुस्तक का लोकार्पण दिल्ली संसदीय कक्ष में हुआ था। वल्र्ड रिकाॅर्ड ऑन लाईन कवि सम्मेलन में आप मुख्य अतिथि रही थी। इन्होंने भोजपुरी फिल्म ’नाचे दुल्हा गली-गली’ के लिए शानदार गीत लिखे हैं जिसे जी टीवी के ’जी बाइस्कोप चैनल’ पर प्रसारित किया गया। इनका लिखे गीत आज भी लोकप्रिय हैं। 

पाठ्यक्रम में शामिल कहानी

  इनकी कहानी ’बूढ़ी अम्मा’ दक्षिण भारत, दुबई, दोहा, कतर में कक्षा आठ के  पाठ्यक्रम में शामिल है। यदि सम्मान की बात करें तो संस्कृति विभाग (उत्तर प्रदेश) संस्कार भारती द्वारा आयोजित ’कवि कुंभ’ में सम्मान, उपन्यास ’छोटी मालकिन’ के लिए वर्ष 2019 में सम्मान। लोकसभा और राज्यसभा चैनल पर  रचनाओं का आधे घण्टे प्रसारण हो चुका है। कुल जमा सत्तर से अधिक संस्थाएं इन्हें सम्मानित कर चुकी हैं।

काव्य चंद्रिका सारस्वत सम्मान

 उल्लेखनीय है कि विगत दिनों लखनऊ के त्रिवेणी नगर में अनागत साहित्य संस्था की गोष्ठी एवं सम्मान समारोह आयोजित हुआ था। इस अवसर पर सरोज जी को काव्य चंद्रिका सारस्वत सम्मान प्रदान किया गया। यह सम्मान कवियों और साहित्यकारों की रचनात्मक उपलब्धियों को मान्यता देने के लिए दिया जाता है। गोष्ठी में नगर के अनेक जाने माने रचनाकारों ने उपस्थिति दर्ज कराई थी।

सरोज ’आर्या’ की कविताएँ

मेरा आसमान

मेरे लिए मेरा!
आसमान खुला छोड़ दो! 
दायरे खुद तय करुंगी 
मेरी चिंता छोड़ दो
उड़ सकूं उन्मुक्त
कर सकूं अभिव्यक्ति 
मेरा जीना, मेरा मरना 
मुझ पर निर्णय छोड़ दो 
कर सको तो मुझ पर 
बस एहसान इतना करना
वह नज़र, वह सोच
अपने पास ही धर रखना 
दृष्टि जो कुदृष्टि डाले 
देह पर जो कुबुद्धि बन 
पड़ा हो नेह पर 
अपनी छोटी सोच
छोटी नियत अपने पास रखना 
मेरे हिस्से की खुशी और 
होठों की हंसी 
दे दो मुझको मेरी हिस्से वाली 
मेरी जिंदगी
विचर सकूं जिस धरा 
वो जहान छोड़ दो 
मेरे लिए मेरा खुला 
आसमान छोड़ दो।

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दुनिया की सैर करा रही

दिल में समंदर सा 
तूफान  लिए कुछ
स्मृतियों की धुन गुनगुना रही 
किरणों ने  बिखेरा है 
साज अनहद
सुर -लहरी बन तरंगे 
झीलमिला रही
वक्त़ से पहले वक्त़ का 
तकाजा  था 
कि असाध्य सांझ की बेला 
तुझे बुला रही 
उठ रही लहरें कुछ 
इस तरह की मानो वादियों को भी मचलना सीखा रही
उड़ चला मन का पंछी अब तो 
दिल की टहनियों पर 
कुछ ठौर पा रही 
बिठाकर यादों की 
कश्ती में हमें ’आर्या’ 
पूरी दुनिया की सैर कर रही।

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सरसों के फूल

महक उठे सरसों के फूल
गेहूं बालियां लहराने लगी।
धरणी जैसे हुई सुनहरी
स्वर्ण कलश छलकाने लगी।।
सद्यः ब्याही तरुणी ने 
ज्यूं धारी पीली साड़ी 
पीत वसन ओढ़ अवनी ने 
किया अलंकृत हर क्यारी 
आम्र बौर चहुं ओर खिले
मदमस्त हुई है फुलवारी
नव वर्षोत्सव और वसंत की 
आने की है तैयारी।।
डाली-डाली नवल सुकोमल
पल्लवों से है श्रृंगारित
विहंग-चहक उठे पेड़ों पर
पत्ते-पत्ते देख हरित।।
वसुधा तन अस हुआ अलंकृत 
चहुं ओर है हरियाली।।
बल्लरियां गाती बल खाती
जैेसे राग भोपाली।।
सर्द रात्रि ने उठा लिया घूंघट
मचल उठी ठंड गुलाबी।
सूर्य रश्मियां छिटक प्रकाश
गाती स्वर मधुर प्रभाती।।
वासंती नवरात्रि आई
चैत्र नवमी लेकर उमंग।
पुष्प शरों पर चढ़कर आया
नव वर्ष पर नवल वसंत।।

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आसान नहीं पिता बन जाना

स्मरण हो उठती है
पिता की वो त्याग भावना
मेरे लिए वाहन प्रबंध
और स्वयं बस से जाना
स्कूटर, मोटर साइकिल से
विद्यालय छोड़कर आना
मेरी सभी इच्छाएं पूर्ण करना
माथे पर शिकन तक न लाना
संघर्षों को स्वयं ही साधा
मुख पर ले प्रभा मंडल की आभा
सुख सुविधाओं का प्रबंध करना
आचार व्यवहार में पूर्ण रहना
गंभीर व्यक्तित्व एवं 
एकनिष्ठ कर्तव्य
मन में ममत्व सभी से अपनत्व
भीतर से सहज सरल और 
बाहर से कठोर बन जाना
पूरे घर की जिम्मेदारियों का 
अकेले ही बोझ उठाना
आसान नहीं है 
पिता बन जाना।।

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नया विहान

भोर ने टांग दिया
सूरज आसमान में
सांझ ने उतार दिया
क्षितिज की कमान से
सागर ने धर दिया
समय के अंक में 
अवसर देख धावा बोला
गगन में मयंक ने 
सम श्वेत अश्वरथ
प्राची की ओर से 
हो आसीन भोर भानु 
निकल पड़े जोर से
उषा ने बिखेर दिया
हिरण्मयी किरणें
अरण्य में कुलांचे
भरने लगी हिरणें
कलरव विहग से 
जाग उठा ये जहान
दिनकर के आगमन से 
आया फिर नया विहान।।

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उकेर रही हूं

उकेर रही हूं
तेरी -मेरी यादों के 
कुछ लम्हे
कुछ स्मृतियां 
कुछ अहसासों को 
वो पल जो सिर्फ हमारे थे
जिन्हें संजोए  हैं 
संभाले हैं हमने 
वक्त से चुरा कर 
सबसे छिपा कर 
आज भी गहराया है 
मेरे मन के भीतर 
मिट्टी की सोंधी खुशबू के 
साथ तुम्हारे वो अहसास 
उकेर रही हूं 
मिट्टी के मटकों पर 
प्रीत के चटक रंगों से 
भर रही हूं रंग 
जो पल बदरंग रह गए थे 
उन्हें रंगीन बनाकर 
जीवन को सजाना जो है 
उकेर रही हूं 
दरकते हुए वक्त
अहसासों की नमी से।