शख्सियत : आदमी को आदमी से दूर कर दिया मोबाइल की दुनिया ने

शख्सियत : आदमी को आदमी से दूर कर दिया मोबाइल की दुनिया ने

कवयित्री निवेदिता शुक्ला का कहना

⚫ नरेंद्र गौड़

’आदमी को आदमी से दूर कर दिया मोबाइल की दुनिया ने। जब मोबाइल नहीं था, तब लोग आपस में बोलते बतियाते थे और एक दूसरे के घरों में घंटों बातें करते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब तो एक ही घर के सभी लोग अपने-अपने मोबाइलों में डूबे रहते हैं और आभासी दुनिया में जीन लगते हैं। कभी -कभी ऐसे लोगों से भावनात्मक रूप से जुड़ जाते हैं जिनका दूसरे के लिए कोई महत्व नहीं होता। ये भावुक हृदय के लोगों के लिए बहुत घातक सिध्द होता है और ऐसे लोग अवसाद में चले जाते हैं या दुखी होकर आत्महत्या कर लेते हैं। हमारी युवापीढ़ी कई बार बिना सोचे समझे ऐसे चक्रव्यूह में फंस जाती है जिसके दुष्परिणाम जीवन भर भुगतने पड़ते हैं, लेकिन ऐसा नहीं कि इसके सकारात्मक पहलू भी हैं जिनसे इन्कार नहीं किया जा सकता।’

कवयित्री निवेदिता शुक्ला

यह बात जानी मानी कवयित्री निवेदिता शुक्ला ने कही। इनका कहना था कि मोबाइल के कारण बेहतर संचार सुविधाएं मिलने लगी हैं वहीं सूचना तक आसान पहुंच हो गई है और दैनिक कार्यों के प्रबंधन में आसानी होने लगी है। वहीं अगर नकारात्मक पहलुओं की बात की जाए तो लगातार कनेक्टिविटी से बढ़ता तनाव, दुर्घटनाओं का कारण बनने वाला ध्यान भटकना और लम्बे समय तक इस्तेमाल से स्वास्थ्य जोखिम शामिल हैं।

मोबाइल की जीवन में प्रमुख भूमिका

एक सवाल के जवाब में निवेदिता जी ने कहा कि मोबाइल फोन हमारे जीवन में प्रमुख भूमिका निभाता है। आमतौर पर इसे दैनिक जीवन में संचार का सबसे तेज साधन माना जाता हैं, हम अपने दोस्तों के साथ आसानी से संपर्क या संदेश, हमारे रिश्तेदार जहां कहीं भी हों उनसे हम तुरंत संपर्क कर सकते हैं। वहीं मोबाइल फोन मनोरंजन का एक साधन भी है।

व्यापक क्षमताओं से लैस

निवेदिता जी का कहना है कि मोबाइल फोन को आम बोलचाल की भाषा में सेल फोन कहा जाता है, यह एक पोर्टेबल उपकरण है जो दूरसंचार क्षमताओं को कंप्युटिंग शक्ति के साथ जोड़ता है। यह उपयोगकर्ताओं को सेलुलर नेटवर्क के कवरेज क्षेत्र में कहीं से भी वॉइस कॉल करने और टेक्स्ट संदेश भेजने की सुविधा देता है। आधुनिक स्मार्ट फोन, जो मोबाइल फोन का ही एक रूप है, इंटरनेट ब्राउजिंग, सॉफ्टवेयर एप्लिकेशन चलाने और मल्टीमीडिया कार्यक्षमता सहित व्यापक कार्यक्षमताओं से लैस है।

अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित

निवेदिता जी इटावा उत्तरप्रदेश में रहती हैं और ग्रहणी की जिम्मेदारियों का निर्वाह करते हुए लेखन का भी समय निकाल ही लेती हैं। आप स्नातक परीक्षाएं उत्तीर्ण हैं और लिखने के प्रति अभिरूचि बचपन से ही रही है। शाश्वत सृजन, प्रेम कहानी, वर्ल्ड बुक ऑफ रिकार्ड 2021 (हिंदी भाग) हार्ट बीट ऑफ इमोशन, लाइफ इज लाइक ए फिश (हिंदी), मां काव्य संग्रह, मेरी निहारिका, स्मारिका अनंता, होली वूमेन, नवोदय, अभ्युदय आदि पत्रिकाओं में आपकी रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं। यहां उल्लेखनीय है कि समयानुकूल हिंदी मासिक पत्रिका में आपकी रचनाएं चार वर्षों से निरंतर प्रकाशित हो रही हैे। ऑन लाइन काव्यमंचों पर भी आपकी सहभागिता रही है। आप यूएसए के हम हिंदुस्तानी हिंदी समाचार पत्रों में निरंतर लेखन कर रही हैं। आपको लेखन के लिए अटल सम्मान से भी नवाजा जा चुका है। 

निवेदिता शुक्ला की कविताएं


अश्रु बल

वक्त के तूफानों से 
व्याकुल ना होना तुम कभी 
बहा लेना अश्रु धारा 
ये हृदय पाषाण करना जानते हैं
काल के कपाल पर
धधकते अंगार हैं ये 
व्यथित खंड- खंड आत्मा के
शांत परावार हैं ये 
खंगालना खुद को 
झकझोर कूटना तुम 
आत्म गरल 
आत्म मंथन से अन्ततः 
सरस अमृत मिलेगा 
जब आसरा ना हो पास तुम्हारे 
कोई हाथ ना बढ़े अश्रु पोछने को 
तब हौसला कर सको तुम यदि
निज चरण कंटक खींचने का
धैर्य से उठ खड़े होना  
नवअवतरण का ये समय होगा 
कंपकपाते बाजुओं में फिर 
नव ऊर्जा का संचार होगा
सीख लेना तुम शजर से 
मौन हो पीड़ा को सहना 
मुस्कुरा कर कलियों का खिलना 
पुष्प मानिंद मौन झरना 
मन को देना फिर से तुम 
अश्रुओं सी वही रवानी 
तुम बदल सकते हो निःसंदेह 
फिर से अपनी कहानी।

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गुलशन भी तुम बिन

मुलशन भी तुम बिन 
वीराने लगते हैं..
भाव नहीं तो क्या था साथी
जो उपजा था बीच हमारे ?
चांँद को देखा तुम दिखते थे 
नेह नहीं तो क्या था साथी 
जो फैला था बीच हमारे?
शीतलता चांँदनी की तपन बढ़ाए
नेह नहीं तो क्या था साथी 
जो पसरा था बीच हमारे?
विदा का मंजर नयन भिगोए
प्रेम नहीं तो क्या था साथी 
जो गुजरा था बीच हमारे ?
यादें अश्रु धार बहाए 
नेह नहीं तो क्या था साथी 
जो बहता था बीच हमारे? 
धड़कन में सदायें तुम्हारी आती 
प्रेम नहीं तो क्या था साथी
 मौन हुए जब शब्द हमारे?
हर आहट पर लगता तुम हो आए 
नेह नहीं तो क्या था साथी 
जो हमने महसूस किया था।

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बारिश की फुहार 

बारिश की फुहार पड़ी तो 
सोंधी खुश्बू आई,
मन मयूर को छू गई फिर 
यादों की परछाई 
सिक्त किया रिमझिम बूंँदों ने 
बचपन का प्यारा कोना
कागज की वो नाव सलोनी 
बारिश में खूब बहाई 
आते- जाते बादल में देखूंँ 
इक सूरत पहचानी सी 
जी चाहे उसे आज रोक लूंँ 
गमक उठे अंँगनाई
दमक दामिनी कड़क- कड़क कर 
फिर चेतन सा करती 
स्वप्न देखती आंँखों से 
फिर ठहरी बूंँदें गिरती
मौसम हमें दिखाते हैं 
जीवन के रंग अनूठे 
हो सकता है जो हमें 
प्रिय हों साथ उन्हीं का छूटे।