शख्सियत : ’अब तक का इतिहास देश का झूठा बता बदलते जाओ’

नाज़िश का कहना था कि श्रेष्ठ कविता की एक पहचान यह है कि वह हमें एक से अधिक बार पढ़े जाने के लिए आकृष्ट करती है। उसे दूसरी बार पढ़ने पर हमें कविता का और विशद् अर्थ मिलता है। कविता में ऐसा बहुत कुछ होता है जो प्रत्यक्षतः कहा गया है।

शख्सियत : ’अब तक का इतिहास देश का झूठा बता बदलते जाओ’

नाज़िश अंसारी का कहना

⚫ नरेंद्र गौड़

एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों के संदर्भ में ’भगवाकरण’ का मुद्दा राजनीतिक और वैचारिक विवादों से जुड़ा है, जहां आलोचक आरोप लगाते हैं कि मुगलकाल के इतिहास और अन्य विवादास्पद विषयों में किए गए बदलाव शिक्षा का भगवाकरण करते हैं, जबकि सरकार इसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति और राष्ट्रीय पाठ्यचर्चा की रूपरेखा के अनुरूप एक सकारात्मक परिवर्तन बताकर अपना पल्ला झाड़ रही है। जो भी हो यह तय है कि शिक्षा के भगवा विचारधारा के अनुरूप बनाने की कुत्सित कोशिश हो रही है और इसका पुरजोर विरोध होना चाहिए। इसी बात को लेकर कैलाश मनहर ने सही लिखा है-’कपट मार्ग पर चलते जाओ, सच पर कालिख मलते जाओ, अब तक का इतिहास देश का, झूठा बता बदलते जाओ।’ 

यह बात हिंदी की कवयित्री,  कहानीकार चिंतनशील व्यक्तित्व की धनी नाज़िश अंसारी ने कही। इन्होंने न केवल अपनी कविताओं और कहानियों के जरिए एक अलग पहचान बनाई है, बल्कि इस प्रायोजित नफरत और उन्माद के दौर में अपने निर्भीक और बेबाक प्रतिरोधी लेखन के जरिए सभी का ध्यान आकृष्ट किया है। इनका कहना है कि एनसीईआरटी की किताबों में महाकुंभ मेले, सरकारी योजनाओं जैसे ’मेक इन इंडिया’ और ’बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे नये अध्याय जोड़े जा रहे हैं। वहीं भयानक तथ्यात्मक गलतियां भी की जा रही हैं, मसलन एक जगह गोर्की की कहानी को निर्मल वर्मा की कहानी बता दिया गया। नाज़िश कहना है कि अनेक शहरों के नाम बदलकर उनकी पहचान को नष्ट किया गया है। इतिहास को मनमाने ठंग से तोड़मरोड़ कर पढा़या जा रहा है।

किसे माना जाए श्रेष्ठ कविता?

कविता की श्रेष्ठता को लेकर पूछे सवाल के जवाब में नाज़िश का कहना था कि श्रेष्ठ कविता की एक पहचान यह है कि वह हमें एक से अधिक बार पढ़े जाने के लिए आकृष्ट करती है। उसे दूसरी बार पढ़ने पर हमें कविता का और विशद् अर्थ मिलता है। कविता में ऐसा बहुत कुछ होता है जो प्रत्यक्षतः कहा गया है, नहीं होता किंतु यही महत्वपूर्ण भी होता है। कई बार हम अनकहे को समझने के लिए कविता में पुनः झांकते हैं। कविता को सम्पूर्णत्व में ग्रहण करने पर हमें इसमें निहित संदेश का आभास होता है। कई बार कवि कविता में उपस्थित होता है और चीजों को स्पष्ट कर देता है, लेकिन श्रेष्ठ कविताओं में कवि अक्सर अनुपस्थित होता है। कविता में कवि जितना अनुपस्थित दिखता है, वह उतना ही अधिक उपस्थित होता है।

आधुनिक कविता में जटिलता का सवाल

 आधुनिक कविता की जटिलता को लेकर पूछे सवाल के जवाब में नाज़िश का कहना था कि आधुनिक जीवन की तरह आधुनिक कविता भी जटिल हो सकती है, क्योंकि वह उसे प्रतिबिम्बित करती है। कविता एक प्रभाव को व्यक्त करने के लिए क्षणों का प्रवाह या श्रंखला है। काव्य अभिव्यक्ति में कथ्य को प्रतीक और बिम्बों तथा सादृश्यों व्दारा सांकेतिक किया जाता है। सपाट बयानी से कवि अधिकाधिक बचता है। बिना काव्यतत्वों के सिर्फ सपाट बयानी कोई सीधा प्रहार कर सकती हो, यह संभव नहीं है। शीघ्र लोकप्रियता अर्जित करने के लिए ऐसा किया जा सकता है और किया भी जाता है, किंतु यह लोकप्रियता स्थायी नहीं हो सकती। मार्क्सवाद एक क्रांतिकारी विचारधारा है। यह रचनाकार में संघर्षधर्मी चेतना प्रदान करती है। इससे कोई कवि विचार और वक्तव्यों का अपनी कविता में प्रभावशाली संयोजन कर सकता है, किंतु जीवन यथार्थ के गहन अवलोकन, जीवन के प्रति अनुभूतिगत संवेदना और कल्पनाशक्ति के अभाव में उसकी कविता दोहराव का शिकार हो जाएगी। विचार और कथ्य को बार-बार दोहराने वाला कवि लोकप्रिय कैसे रह सकता है? इसके जवाब में नाज़िश का कहना था कि कहन में नये प्रयोग करके कवि लोकप्रिय रह सकता है।

नाज़िश की कहानी को मिला हंस कथा सम्मान

नाज़िश अंसारी मनोविज्ञान से परास्नातक हैं। इनकी कविताएं
हिंदवी, सदानीरा, समालोचना आदि में प्रकाशित हो चुकी हैं। नाज़िश की पहली कहानी को  वर्ष 2023 में ’हंस कथा सम्मान’  मिल चुका है। इनकी कहानियां इंडिया टुडे साहित्यिक वार्षिकी, वनमाली कथा, पूर्वकथन में आदि महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी है।

नाज़िश अंसारी की चुनिंदा कविताएं

शादी खाना आबादी

तमाम दीनी किताबों से अपने हगने 
मूतने तक का तरीका मिलान करने वालो के
पास कुंडली नहीं थी 
फिर भी मिलाया 
पहले खानदान फिर बिरादरी में ढूंढा 
शुद्ध नस्ल का तंदुरुस्त लड़का
कोशिश रही कि न हो मसाला,
सिगरेट, शराब जैसी कोई लत
हो भी तो चल जाएगा आजकल का चलन है
बिटिया को देखना चाहें देख लें
वैसे नामहरम से पर्दा है हमारे यहाँ

ग्रह नक्षत्र.. हम नहीं मानते
रख लीजिये चाँद की कोई भी अच्छी तारीख 
शादी सादी ही बेहतर 
होटल वोटल खाना वाना
चलन है आजकल का तो करना पड़ता है
वरना फिर बेटी को ही सुनना पड़ता है

मौलवी साहब एक वकील दो 
गवाह की मौजूदगी में सुनाते हैं
आपका निकाह जनाब अलां के फलां 
साहबजादे से तय पाया जाता है

लड़की छूट रहे प्रेमी के साथ 
दिल के लड़खड़ा कर गिरने पर 
सीली सांस छोड़ती है 
फिल्म बाजार की शबनम की तरह 
दुल्हनों ने हाँ कहा या आह भरी
कोई नहीं जानता.. 

बैठक में भारी भरकम आवाजे धर्म की 
सर्वश्रेष्ठता पर दे रही हैं बयान
सुभान अल्लाह दीन ने औरत को 
कितनी इज्जत बख्शी
बगैर उसकी रजा के निकाह 
मुमकिन ही नहीं
माशाअल्लाह.. माशा अल्लाह.. की 
बढ़ती भनभनाहट से दूर 
सुर्ख घूँघट हिनाई हाथों में 
मुँह ढाप कर रो देता है 

इस लगभग काल्पनिक घटना को 
सुनकर अ-वर्ग लपक कर 
व्यक्त करेगा संवेदना 
वर्ग-ब लगाएगा स्टेटसय फीलिंग 
बेइज्जती विथ अलिफ बे एंड थर्टी थ्री अदर्स

मुझे उस स वर्ग की तलाश है जो साथ 
मेरे गवाही दे कि देश में लोकतंत्र
पिछले कुछ वर्षों से जो 
मृत्युशय्या पर मर्णासन्न है 
मध्यवर्गीय फासिस्ट पिताओं के 
घर कभी जन्मा ही नहीं था।

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बुलडोजर

सोचा-
कम लिखा जाए
पढ़ना ज्यादा हो
कम कर दिया जाए कहना
सिर्फ़ सुनना शेष हो

टेलीविजन और अख़बार सब 
बंद कर देने के बाद भी
ख़बरें दराज़ से आ ही जाती हैं
गर्द की पर्त बनकर फ़र्श से चिपक जाती हैं
सबसे अच्छे फिनायल से पोंछा लगाकर भी
स्वच्छ भारत के सरकारी अभियान में 
सहयोग न कर पाने का मलाल है
अबकी बिखरी धूल का रंग धूसर नहींकृलाल है

मैक्रो बायोलॉजी की छात्रा कभी नहीं रही
फिर भी देख सकती हूँ इसमें चिपकी
किसी अरण्य-रुदन की सुगबुगाहट
किसी मौन विलाप की खिसखिसाहट
बाकी तो सबने देखा
थोड़ा मीडिया का भौं-भौं
और फिर बुलडोजर का हौं हौं
न्यायिक व्यवस्था को कुचलता हुआ
तिरंगे की हरी पट्टी को 
लगभग फाड़ता हुआ
यहाँ चला वहाँ चला
जाने कहाँ-कहाँ चला

आप कनखियों से हँसेंगे, 
मगर कहेंगे, विक्टिम कार्ड खेलती हूँ
ना, मैं गर्द से पैर बचाकर चलती हूँ
इसलिए नहीं कि मलेच्छ के ठप्पे
से बचना है मुझे
( यूं भी बचने की सम्भावना वहां होती है 
जहां चुनने का विकल्प हो)
इसलिए कि एक विज्ञापन कहता है-
विकास करने वाले देश में हर 
वक्त़ कुछ न कुछ बनता है

मेरे उत्तम प्रदेश में बनना मतलब ढहना है
मौरंग, कन्नी, मिस्त्री जैसे शब्द 
कर दिए गए है चलन से बाहर 
अब सिर्फ चल रहा है, चलेगा बुलडोजर

सो, कृपया अपने वाहन की गति धीमी रखें
विकासशील देश में कार्य प्रगति पर है।

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बिलकीस

बिलकीस!
उम्र कैद का मतलब
उम्र भर की कद नहीं होता

तो क्या हुआ जिन्हें मरकर भी जलना 
नहीं था उन्हें जिंदा जलाया गया
तुम्हारे बच्ची को पत्थर पर 
पटक कर मारा गया
तो क्या हुआ जो बेहिसाब औरतें नंगी की गयीं
जिस्म उनके गोश्त के लोथड़े बने
वहशी नारंगी भेड़ियों में तक््सीम हुए

हाँ, सोते में अचानक घुसती होगी 
तुम्हारे नथुनों में केरोसिन की झार
चमड़ी पिघलने की चिरांध
और गाढ़ा काला गुबार
फिर भी पढ़नी चाहिए शुकराना
तुम्हारा पंचवासा गर्भ 
तलवार की नेजे से बच गया
मुखिया ने कहा
अमल का रद्दे अमल था, हो गया.

उस खूनी सुबह से लेकर
 अगस्त की उमसाई दोपहरी तक
गाँव की पंचायत से दिल्ली की कचहरी तक
हर दरवाजे पर लिखा मिलेगा 
कष्ट के लिए खेद है
बन्द करो खटखटाना
बेचारी बनना छोड़ो
कितना सिसकोगी आँसू पोछो
उठो, आपदा में अवसर खोजो

बिलकीस, याद रखना!
उम्र कैद का मतलब
उम्र भर की कैद नहीं होगा
कातिल ही तुम्हारा मुंसिफ है
कितना तुम्हारे हक में फैसला देगा!

(कविता की आखिरी दो पंक्तियां 
सुदर्शन फाकिर के शेर से प्रेरित है)