शख्सियत : विश्व पुस्तक मेला छोड़ गया अनेक सवाल

ऐसे में जरूरत है कि जिला स्तर पर पुस्तक मेले और प्रदर्शनियां लगाई जानी चाहिए। इसके लिए संस्कृति मंत्रालय आवश्यक संसाधन जुटाए और किताबों के प्रकाशन पर अनुदान, लेखकों के मानदेय की व्यवस्था करे। प्रकाशक किताबें छाप कर मालामाल हो रहे हैं, वहीं लेखक इनके शोषण का शिकार है।

शख्सियत : विश्व पुस्तक मेला छोड़ गया अनेक सवाल

कवयित्री डाॅ. अनामिका अनु का कहना

⚫ नरेंद्र गौड़

 ’’नई दिल्ली के भारत मंडपम् में 10 से 18 जनवरी तक 53 वां विश्व पुस्तक मेला लगा, जिसे लेकर दावा किया जा रहा है कि विगत वर्ष की तुलना में इस बार बीस प्रतिशत अधिक पुस्तक प्रेमियों ने पुस्तकों की खरीद की है, लेकिन हर बार की तरह इस बार भी बड़े शहरों के साधन सम्पन्न पाठकों की ही संख्या अधिक देखी गई, छोटे नगरों के गरीब पाठकों की किताबों तक पहुंच नहीं हो पाई। ऐसे में जरूरत है कि जिला स्तर पर पुस्तक मेले और प्रदर्शनियां लगाई जानी चाहिए। इसके लिए संस्कृति मंत्रालय आवश्यक संसाधन जुटाए और किताबों के प्रकाशन पर अनुदान, लेखकों के मानदेय की व्यवस्था करे। प्रकाशक किताबें छाप कर मालामाल हो रहे हैं, वहीं लेखक इनके शोषण का शिकार है।’’

यह बात जानी मानी कवयित्री अनामिका अनु ने चर्चा में कही। इनका कहना था कि दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेले की सफलता को लेकर  बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन आम गरीब पाठक फिर भी इन तक नहीं पहुंच पाए। छोटे शहरों के पाठक किताबें पढ़ना तो चाहते हैं लेकिन कीमतें अधिक होने के कारण चाहकर भी किताबें नहीं खरीद़ पाते हैं।

किताबों की दुनिया में पसरा सन्नाटा

एक सवाल के जवाब में अनामिका जी का कहना था कि टीवी, मोबाइल और सोशल मीडिया ने  पाठकों को किताबों की दुनिया से दूर कर दिया है। पहले युवाओं के हाथों में किताबें हुआ करती थी, जो उन्हें पढ़ते और बहस करते थे। ऐसे पाठकों से पार्क भी आबाद हुआ करते थे, आज पार्क हैं जरूर, लेकिन वहां बैठे लोग मोबाइल की तरफ झुके नजर आते हैं। एक टेक्नालाॅजी ने लोगों के हाथों से किताबें छीनकर मोबाइल थमा दिये हैं। पहले ट्रेनों में लोग किताबें पढ़ते हुए सफर काटते थे, अब ऐसे दृश्य दुर्लभ हो चुके हैं। अब तो अखबार पढ़ता भी इक्का दुक्का आदमी नजर आता है। रेल्वे प्लेटफाॅर्मों से बुक स्टाॅल नदारद हैं।

लायब्रेरियों का हो आधुनिकीकरण 

अनामिका जी का कहना था कि जिला स्तर पर शासकीय लायब्रेरियों की हालत किसी से छिपी नहीं हैं। बजट की कमी के कारण पुरानी किताबों से काम चलाना पड़ रहा है। शासन को चाहिए कि ऐसे वाचनालयों का आधुनिकीकरण करे। वहीं प्रकाशकों को भी चाहिए कि किताबों को गांव कस्बों तक ले जाएं, वाहनों के जरिये प्रचार करते हुए किताबें बेचे। बड़े शहरों की काॅलोनियों में नीजि वाचनालय होते हैं, उन्हें शासन से अनुदान मिलना चाहिए। ताकि संसाधन जुटाए जाएं और किताबें खरीदी जा सके।

कागजों की बिक्री से जीएसटी हटे

अनामिका जी का कहना था कि सरकार व्दारा साहित्यिक किताबों की बिक्री पर जीएसटी नहीें लिया जाता, लेकिन छपाई के दूसरे साधन मसलन कागज, स्याही और बाइंडिंग पर जीएसटी लगता है, इसे भी हटाना चाहिए, तभी किताबें सस्ती होंगी। आम धारणा है कि कागज बनाने में जंगलों का विनाश होता है और किताब के हर पन्ने पर पेड़ों के आंसू  छपे होते हैं, लेकिन कागज बनाने के लिए जिस मात्रा में जंगल नष्ट होते हैं, उससे लाखों गुना फर्नीचर और सड़कों के निर्माण में उनका विनाश होता है।

मिल चुका भारत भूषण अग्रवाल सम्मान

केरल में रह रही  डाॅ. अनामिका को ’भारत भूषण अग्रवाल सम्मान (2020), राजस्थान पत्रिका वार्षिक ’सृजनात्मक पुरस्कार’ (2021) और ’रजा फेलोशिप’ (2022) ही नहीं केदार न्यास व्दारा दिया गया वर्ष  2023 का ’महेश अंजुम युवा कविता सम्मान’ भी नवाजा जा चुका है। इनका काव्यसंग्रह ’इंजीकरी’ वाणी प्रकाशन से छप चुका हैं, जिसे पाठकों ने खूब सराहा। मंजुल प्रकाशन से छपा अनामिका जी का कहानी संग्रह ‘येनपक कथा और अन्य कहानियाँ’ आज भी लोकप्रिय है। इन्होंने  ’यारेखः प्रेमपत्रों के संकलन’ तथा ’केरल से अनामिका अनुः केरल के कवि और उनकी कविताएं’ नामक दो किताबों का संपादन किया है। के. सच्चिदानंदन की इक्यावन कविताओं के अनुवाद की पुस्तक ’सिध्दार्थ और गिलहरी’ राजकमल प्रकाशन से छपी है।

भारतीय भाषाओं में रचनाएं अनुदित

अनामिका जी की रचनाओं का अनुवाद पंजाबी, मलयालम, तेलगू, मराठी, नेपाली, उडिया, गुजराती, असमिया, अंगे्रजी, कन्न्ड तथा बांग्ला भाषाओं में हो चुका है। इन्होंने मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की जीवनी भी लिखी है। एमएससी में विश्वविद्यालयीन  स्वर्ण पदक तथा पीएचडी में डीएसटी इंस्पायर अवाॅर्ड मिलना भी आपकी मामूली उपलब्धि नहीं है। इनकी रचनाएँ देशभर के सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं।

अनामिका अनु की कविताएं

मैं हर बार तुम्हें 
बचा लूंगी लज्जा से

मैं एक पत्र लिखना चाहती हूँ तुम्हें
बिल्कुल तुम्हारी तरह 
डरा और सशंकित होगा वह पत्र 
मैं उस पत्र में कामना को 
उद्देश्य या इंकलाब लिखूंगी
मैं उस पत्र में मीठे- गीले संवाद को 
विमर्श या धार्मिक अनुष्ठान लिखूंगी
मैं उस पत्र में 
चुंबन को भंवरा 
स्पर्श को आकाश
संवाद को पतंग
रूदन को धुंआ 
अपने ओंठों को खिड़की
तुम्हारे ओंठों को पर्दा लिखूंगी
मैं हर बार तुम्हें बचा लूंगी
उस लज्जा से
जो तुम्हें प्रेम करते वक्त आई।

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कोहरे भटके हुए पंछी हैं

सांप-सी सड़कें 
मिलती हैं चैराहे पर
हर बार चैराहा खा 
जाता है सड़क को
और हर बार चैराहे से ही 
जन्म होता है नई सड़क का
नन्ही-नन्ही चींटियां बड़े-बड़े 
आदमियों को निगल जाती हैं
कोहरे भटके हुए पंछी हैं
वे झरोखे टहनियां खोजते-खोजते
फैल गये है ठंडे होकर
आग की बाहों में पला नन्हा धुआँ
फैल गया है आस-पास 
कोहरे से बतियाता धुआँ
माँ के नाम में लिखकर आया है
’आग’ अभी-अभी।

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तुम्हें देखकर बुट्टियां 
गिन रहे हैं लोग

तुम्हें देखकर बुट्टियां 
गिन रहे लोगों को
लगता है कि तुम्हें और 
बड़ा होने देना चाहिए
तब और अधिक मुनाफा 
कमाया जा सकता है
कुछ व्यापारियों को लगता है
बढ़ते ही तुम्हारे स्वाद और दिमाग के 
खराब हो जाने की संभावना अधिक है
अभी समय अच्छा है
मांग अच्छी है
और स्वाद में कोई 
वैचारिक आग्रह भी नहीं
बाजार में भारी भीड़ है
ये पंचवर्षीय हाट है
और कुछ लोग बड़े व्यापारी।

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वृद्ध स्त्रियाँ

वृद्ध स्त्रियों के पास विवाह के गीत
और देवों की वंदना के अलावा
एक शिष्ट कविता होती है
जिसके शब्द उनके साथ की गई 
तमाम अभद्रताओं का प्रतिकार हैं
वृद्ध स्त्रियों के पास 
लौंग,वोलीनी, पानी
अरारूट के बिस्कुट
और रंग-बिरंगी गोटियों के अलावा
अंगूठें भर का दिल भी होता है
जिसे वे नाभि में छिपाकर रखती हैं 
नवासियों को इसलिए 
वे पेट से लगाकर सुलाती हैं 

वृद्ध स्त्रियां पृथ्वी का सबसे मसालेदार 
और सही से पक चुका व्यंजन हैं
इस कदर मजेदार और स्वादिष्ट कि
काल भी उनकी 
प्रतीक्षा में मुँह बाए खड़ा है।

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लड़कियों जब तुम वर्ण पढ़ती हो

सूरज लड़कियों की 
माँ कोयला नहीं रह पातीं
वे धीरे-धीरे ही सही 
कम से कम चांद या 
जुगनू जरूर बन जाती हैं
लड़कियाँ जब तुम बैग 
टांगकर स्कूल जाती हो
तुम्हारी मांओं के पांवों में 
पड़ी सदियों पुरानी 
बेड़ियां कड़कड़ा कर टूटने लगती हैं
लड़कियों !
जब तुम बहा रही होती हो पसीना
तुम्हारी मांओं के तपते 
कलेजों को मिलती है ठंडक
जब तुम दौड़ रही होती हो
तुम्हारी हार चुकी माँएं 
जीतने लगती हैं 
जब तुम तैर जाती हो 
लगभग जम चुके सागर को
तुम्हारी मांएं ठिठुरना और 
थरथराना छोड़ देती हैं

जब तुम पहाड़ पर चढ़ती हो
माटी कर दी गई तुम्हारी 
मांएं दुर्ग-सी खड़ी हो जाती हैं
मेरी प्यारी लड़कियों !
जब तुम कमाओगी रोटियां
तुम्हारी मांओं की अखंड 
भूख को तृप्ति मिल जाएगी
जब तुम तलाशोगी अपने लिए नई राहें
तुम्हारी मांओं की सदियों 
पुरानी भटकन खत्म हो जाएगी 
लड़कियाँ तुम्हारी बनाईं 
छोटी-बड़ी सभी पगडंडियाँ 
एक दिन हाइवे कहलाएंगी
और पुरानी सभी सड़कें 
ध्वस्त हो जाएंगी।