संस्मरण : कह 'काका' कविराय बने बमचक से 'धमचक'
काफी समय तक अपने मूल नाम के साथ ही मंचों से कविताएं पढ़ते रहे । उस दौर के प्रमुख कवि काका हाथरसी , हुल्लड़ मुरादाबादी , शैल चतुर्वेदी , प्रदीप चौबे, जैमिनी हरियाणवी, ओमप्रकाश आदित्य जैसे वरिष्ठ हास्य कवियों के साथ वे मंच साझा करते रहे।
⚫ आशीष दशोत्तर
वाचिक काव्य परंपरा में हास्य और व्यंग्य का मिश्रण करने वाले वरिष्ठ कवि श्री धमचक मुलथानी अपने मंचीय जीवन के 50 वर्ष पूर्ण करने की तरफ अग्रसर हैं । मंच पर लगातार पढ़ना और आधी सदी का सफ़र तय करना बहुत चुनौतीपूर्ण लगता है । धमचकजी ने इस कामयाबी को हंसी ठहाकों के साथ हासिल किया है।
जिस दौर में मंच से शुद्ध साहित्यिक और गरिमापूर्ण कविताओं की प्रस्तुति होती थी, धमचकजी की शुरुआत मंच पर उसी दौरान हुई । देश के ख्यातनाम कवियों के साथ उन्होंने मंच साझा किया और उनका स्नेह भी पाया। उनके जीवन का एक दिलचस्प वाकया उनके नाम परिवर्तन का है। उनका मूल नाम गजराज सिंह राठौर है । वे धार जिले के मुलथान गांव के निवासी हैं। शिक्षा वहीं पाई उसके बाद नौकरी उज्जैन होते हुए रतलाम तक की। उनके कवि सम्मेलनों की शुरुआत मूल नाम से ही हुई । काफी समय तक अपने मूल नाम के साथ ही मंचों से कविताएं पढ़ते रहे । उस दौर के प्रमुख कवि काका हाथरसी, हुल्लड़ मुरादाबादी, शैल चतुर्वेदी, प्रदीप चौबे, जैमिनी हरियाणवी, ओमप्रकाश आदित्य जैसे वरिष्ठ हास्य कवियों के साथ वे मंच साझा करते रहे । गीत ऋषि नीरज के साथ तो उन्होंने पचास से अधिक बार मंच साझा किया।
तो लोगों में मच जाती थी खलबली
देश के बड़े मंचों पर धमचकजी उस दौर में बहुत लोकप्रिय होने लगे थे। जब धमचक जी की रचनाएं मंच से प्रस्तुत होती तो लोगों के बीच खलबली मच जाती और ऐसा लगता कि हंसते-हंसते श्रोता धमा-चौकड़ी करने लगे हैं । उस दौर के मंचों के गौरव काका हाथरसी का स्नेह धमचकजी पर काफी था। वे जब भी धमचक जी की प्रस्तुति के बाद श्रोताओं में ऐसी खलबली देखते तो कह उठते कि यह आ गया है। अब श्रोताओं में बमचक - बमचक होगी । उज्जैन में फ़्री गंज पर होने वाले महत्वपूर्ण कवि सम्मेलन में भी धमचकजी की प्रस्तुति पर श्रोताओं में बहुत दाद मिली और हास्य सुनकर लोटपोट हो गए। बस तभी से काका हाथरसी का 'बम चक', 'धमचक' में बदल गया । मुलथान उनका गांव हैं। वहीं के निवासी हैं । इस कारण 'धमचक' के साथ 'मुलथानी' भी जुड़ गया। मुलथानी जब उनके नाम उसके साथ जुड़ा तो लोग उन्हें मुल्तान (पाकिस्तान ) का समझने लगे। किसी ने उनके नाम के साथ मुलथानी जुड़ा होने से उन्हें पाकिस्तान के सिन्ध का सिन्धी भी समझा। मगर उन्हें उनकी हास्य कविताओं ने सभी के मन में बसाया।
कवि सम्मेलनों के स्तर में बीते वर्षों में बहुत गिरा है। मंच से कविता तो लगभग गायब ही हो चुकी है। हास्य के नाम पर चुटकुले काबिज हो गए हैं। ऐसे में धमचक जी जैसे मज़बूत कवि की मौजूदगी कुछ उम्मीदें कायम रखती है।

आशीष दशोत्तर
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Hemant Bhatt