साहित्य रचना : स्त्री-मन
थोड़ा सम्मान थोड़ी स्नेह की बारिश करते रहो तो भूमि की तरह वह बस तुम्हें देती जाएगी तुम हार कर भी जीत जाओगे और वह जीत कर भी सब कुछ हार जाएगी।
⚫ रंजनालता, समस्तीपुर
भूमि सा होता है यह स्त्री मन
जो देते रहो सम्मान का खाद-पानी और धूप
साथ ही स्नेह की बारिश से करते रहो सराबोर
तो यह भूमि सोना उगलेगी फूल खिलाएगी
हरे-हरे फसलों से घर आंगन भर जाएगी
सब कुछ तुम्हें देखकर भी यह सदा मुस्कुराएगी।

जो छोड़ दो इस भूमि को
और तपने दो निष्ठुरता की कड़ी धूप में
विरक्त कर दो इसे सम्मान के खाद-पानी से
और स्नेह की बारिश से भी
तो बन जाएगा यह मन मरुभूमि-सा
फिर कोई फूल खिल न सकेंगे
न बगिया महकेगी न घर-आंगन
केवल उदासी के रेत ही रेत नजर आएंगे
जिसमें यह मरुभूमि-सा मन खुद भी झुलसेगा
और इसकी रेत तुम्हारी आंखों को जलाएगी।

जो कर सको तो इतना कर लो
अपना पुरुषत्व का दंभ छोड़ स्त्री-मन पढ़ लो
मत बनने दो उसे मरुभूमि-सा
थोड़ा सम्मान थोड़ी स्नेह की बारिश करते रहो
तो भूमि की तरह वह बस तुम्हें देती जाएगी
तुम हार कर भी जीत जाओगे
और वह जीत कर भी सब कुछ हार जाएगी।

रंजनलता
Hemant Bhatt