साहित्य रचना :  ग़ुरबत में पैरवी नहीं चाहिए, हक़ीक़त में बेचारगी नहीं चाहिए

साहित्य रचना :  ग़ुरबत में पैरवी नहीं चाहिए, हक़ीक़त में बेचारगी नहीं चाहिए

मंजुला पांडेय 

कि ग़ुरबत में पैरवी नहीं चाहिए,
हक़ीक़त में बेचारगी नहीं चाहिए।

जिऊँ तो मैं जिऊँ अपने बल पर सदा,
मुक़द्दर की दी ज़िंदगी नहीं चाहिए।

हो सके तो मुंसिफ़-सा करम कर दो,
उधारों में कोई इनायत नहीं चाहिए।

सफ़र मेरा हो चाहे कठिन राहों में,
मगर झूठी कोई रौशनगी नहीं चाहिए।

सच की लौ से जले हर अंधेरा यहाँ,
मगर झूठी कोई रोशनी नहीं चाहिए।

मुझे मेहनत पे अपने भरोसा रहे,
किसी और की रहनुमाई नहीं चाहिए।
 
क़लम से लिखूँ मैं हक़ीक़त का सच,
मंजुल की झुकी शायरी नहीं चाहिए।


मंजुला पांडे, उत्तराखंड