साहित्य रचना : हर चट्टान पे वक्त लिखा है, संघर्षों की सूक्त बनें
मानव! तू क्यों भूल गया है, मौन भी करता है संवाद धूप, हिम, तूफ़ान से लड़कर, पर्वत भी कहता है इन्कलाब.
⚫ मंजुला पांडे
मौन खड़े हैं पर्वत सब,
जैसे धैर्य की मूर्ति बनें।
हर चट्टान पे वक्त लिखा है,
संघर्षों की सूक्त बनें

शिलाओं में भी शब्द छुपे हैं,
हर रेखा में कोई छिपी कथा
निस्तब्ध शिखर की चुप्पी में,
सदियों से गूँज रही है व्यथा ।
हिम के नीचे आग जली है,
शांत दिखे, भीतर उबाल।
शैल सूत्र ये कहता हरदम —
“मौन नहीं, मेरा भी सवाल।”
ऋतुएँ अगणित बीतीं मुझ पर,
सवित-छाँव की छेड़ रही।
गुजरे कई युग आंगन से मेरे
हर पदचिन्ह हर पल चेत रही।
गर्जन को भी साध लिया है,
नभ छूने की चाहत में।
झुकते नहीं पवन के आगे,
डटे रहे हर हालत में।
जो टूटा, वह भी कुछ बोला,
हर बिखराव में था शामिल स्वर।
दर्द भी शिलालेख बन गया
हर बार चढ़ा नव दृढ़ता का ज्वर।
मैं पत्थर हूँ, पर जड़ नहीं,
बसा हुआ है मुझ में भी
संवेदनाओं का खूब बवाल
तुम सुन सको तो सुन लेना,
मेरे भीतर कई कथाएँ हैं,
सिसकियों संग गुजर हैं करती
छिपी अंतर्मन में कई व्यथाएं हैं।
मानव! तू क्यों भूल गया है,
मौन भी करता है संवाद
धूप, हिम, तूफ़ान से लड़कर,
पर्वत भी कहता है इन्कलाब.
⚫ मंजुला पांडे, पिथौरागढ़, उत्तराखंड

Hemant Bhatt