शख्सियत : ग़ालिब, मीर, दाग़ को पढ़े बिना शायरी नामुमकिन
ग़ालिब, मीर, सौदा, मोमिन खां मोमिन, अमीर खुसरो, ज़ौक, फ़ैज़ अहमद फै़ज़, फिराक़ गोरखपुरी, जोश मलीहाबादी, कैफ़ी आज़मी जैसे अनेक शायरों ने ग़ज़लों की दुनिया को न सिर्फ समृध्द किया है, बल्कि इसके ज़रिए जीवन दर्शन से भी हमें रूबरू कराया है। उर्दू अदब को इनकी बेमिसाल शायरी पर फ़क्र है।
⚫ शायर डाॅ. अफ़रोज़ आलम का कहना
⚫ नरेंद्र गौड़
’’ग़ज़लें प्रेम, विरह, जीवन दर्शन और मानवीय भावनाओं को बयां करने वाली उर्दू तथा हिंदी साहित्य की समृध्द विधा है। यह 7 वीं शताब्दी की अरबी कविता से उपजी, जिसमें शेर होते हैं। दरअसल देखा जाए तो शेर दोहों का ही दूसरा रूप हैं। अनेक गायकों ने ग़ज़लों को आवाज़ देकर इसे अमर बनाया है। ग़ज़लें रूह को सुकून देने का सशक्त ज़रिया हैं। हमें गर्व होना चाहिए कि इस धरती पर मिर्जा ग़ालिब, मीर तकी मीर, दाग़ जैसे अज़ीम शायर हुए हैं, जिन्हें पढ़े बिना शायरी नामुमकिन है।’’

यह बात भारत में जन्मे, लेकिन कुवैत में इत्र के कारोबारी और मशहूर शायर डाॅ. अफ़रोज़ आलम ने कही। इनका मानना है कि मूल रूप से अरबी में जन्मी ग़ज़ल फ़ारसी के माध्यम से भारतीय उपमहाव्दीप में आई, जहां सूफी रहस्यवाद से प्रभावित होकर यह उर्दू और हिंदी साहित्य का नायाब नग़ीना बन गई। ग़ालिब, मीर, सौदा, मोमिन खां मोमिन, अमीर खुसरो, ज़ौक, फ़ैज़ अहमद फै़ज़, फिराक़ गोरखपुरी, जोश मलीहाबादी, कैफ़ी आज़मी जैसे अनेक शायरों ने ग़ज़लों की दुनिया को न सिर्फ समृध्द किया है, बल्कि इसके ज़रिए जीवन दर्शन से भी हमें रूबरू कराया है। उर्दू अदब को इनकी बेमिसाल शायरी पर फ़क्र है।
मानवीय भावनाओं की खुली क़िताब
एक सवाल के जवाब में डाॅ. अफ़रोज़ का कहना था कि ग़ज़लें खुशी, ग़म, प्यार, ज़ुदाई और शिकवा ग़िला जैसे मानवीय भावों की खुली क़िताब है। देश के मशहूर गायक कलाकारों ने ग़ज़लों को आज घर-घर पहुंचा दिया है। यह कहना सही नहीं है कि ग़ज़लों में प्रेम, प्यार के अलावा कुछ नहीं होता, वरन् इनमें रूहानी बातें और जीवन दर्शन भी होता है। वहीं तरक्की पसंद शायरों ने ज़माने की नब्ज को बखूबी टटोला और शायरी की दुनिया को नये मुकाम पर पहुंचा दिया है।
मुशायरों की दुनिया के बेताज़ बादशाह
मालूम हो कि डाॅ. अफ़रोज़ आलम को मुशायरों की दुनिया का बेताज बादशाह भी कहा जाता है। आप अपनी ग़ज़लों को तरन्नुम में जब सुनाते हैं तो श्रोता समूह ’वाह वाह’ करने को मज़बूर हो जाता है। आपने दुबई, यूएई, कतर सहित कई देशों में आयोजित मुशायरों में न सिर्फ शोहरत हासिल की है, वरन इन देशों में मुशायरे आयोजित कर अनेक शायरों को मंच प्रदान किया है। डाॅ. अफ़रोज़ ने लाॅकडाउन के दौरान आॅनलाइन मुशायरों का आयोजन किया, जिसमें जर्मनी, जापान, पाकिस्तान और अमेरिका जैसे अनेक देशों के शायरों ने शिरकत की थी। यह सिलसिला आज भी जारी है। आये दिन यह आॅनलाइन मुशायरों का आयोजन कर शायरों को बेहतरीन मंच प्रदान कर रहे हैं। वहीं लाखों श्रोता इनके फाॅलोअर्स भी हैं।
हिंदुस्तानियों की एकता पर बल
डाॅ. अफरोज की शायरी में समकालीन मुद्दे, सामाजिक स्थिति और बदलते ज़माने के दृश्य प्रमुखता से उजागर होते हैं। यहां उल्लेखनीय है कि आप अपने क़लाम के ज़रिए हिन्दुस्तानियों की एकता पर खास तवज्जो देते हैं। आप सभी धर्मों के लोगों को मिल जुल कर रहने और आपसी सौहार्द्र बनाए रखने का संदेश देते रहे हैं। आपके बीसियों ग़ज़ल संकलन छप चुके हैं, यहां सभी का उल्लेख करना सम्भव नहीं है।
खाड़ी के कई देशों में मुकाम
परफ्यूम कम्पनी में उच्च पदों पर नौकरी के कारण खाड़ी के कई शहरों में रहने वाले डाॅ. अफ़रोज़ आलम ज्य़ादातर कुवैत में रहते हैं, लेकिन इनका पैत्रिक निवास बथुआ बाज़ार, जिला गोपालगंज (बिहार) में है। जहां इनके वालिद पेशे से डाॅक्टर हैं जिनका अपना क्लीनिक है और समाज में खासी प्रतिष्ठा है, डाॅ. अफ़रोज़ उसी परिवार के बेटे हैं। 1 अप्रैल 1975 को जन्मे अफ़रोज़ साहब की प्रारंभिक शिक्षा अपने क़स्बे के ’सरस्वती सदन’ में हुई और बाद में अनेक स्कूलों काॅलेजों में शिक्षा प्राप्त की। सिवान (बिहार) की एक संस्था से पीजीडीसीए किया और बाद में दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया से एमबीए किया।
एक से बढ़कर एक उपलब्धियां
डाॅ. अफ़रोज़ का साहित्यिक सफ़र एक से बढ़कर एक उपलब्धियों से भरा पड़ा है। आपने लेखक के रूप में अनेक सेमिनारों में शिरकत की, विश्वविद्यालयों में लेक्चर दिए और शायर के रूप में दर्जनों देशों की साहित्यिक यात्राएं की हैं। पढ़ाई पूरी करने के बाद आप 1999 में कुवैत पहुंचे, जहां इन दिनों एक परफ्यूम कम्पनी में कार्यरत हैं।
साहित्यिक संस्थाओं से सम्बध्द
डाॅ. अफ़रोज़ ने बताया कि 2004 में इन्होंने कुवैत में ’अरबाब- ए-फिक्र-ओ-फन’ (कुवैत) नामक साहित्यिक संस्था का गठन किया और दस साल तक इसका संचालन किया। वर्ष 2015 में ’गल्फ उर्दू काउंसिल’ के अध्यक्ष का चुनाव जीता और ’कुवैत राइटर्स फोरम’ एवं ’मौर्य कला परिसर’ (कुवैत) जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं के उपाध्यक्ष रहे। आप भारत और नेपाल की कई साहित्यिक संस्थाओं के पदाधिकारी रहे हैं। एक सवाल के जवाब में इन्होंने बताया कि इनकी क़रीब बीस क़िताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें छह कविता संकलन, तीन समालोचना और समीक्षाओं की क़िताबें हैं, तीन साहित्यिक आलेखों की पुस्तकों के अलावा ’कुवैत में अदबी पेशरफ्त़ (कुवैत का साहित्यिक इतिहास) भी इनमें शामिल है।
हिंदी की ई पत्रिका के प्रधान संपादक
एक सवाल के जवाब में इन्होंने बताया कि हिंदी की एक त्रैमासिक साहित्यिक ई पत्रिका ’ग्लोबल साहित्य सारांश’ का भी प्रसारण हो रहा है जिसके आप प्रधान संपादक हैं। साथ ही उर्दू की तीन और अंग्रेजी की एक त्रैमासिक पत्रिकाओं के मैनेजिंग एडिटर हैं। इन्होंने बताया कि इनके जीवन तथा रचनाकर्म पर केंद्रित किताब ’डाॅ. अफ़रोज़ आलम एक गुलनार जीवन’ हाल ही में प्रकाशित हुई है जिसका शानदार सम्पादन सुपरिचित कवयित्री डाॅ. खुदेजा ख़ान ने किया है। इसमें डाॅ. अफ़रोज़ के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को लेकर अनेक सुप्रसिध्द लेखकों के आलेख शामिल किए गए हैं।
डाॅ. अफ़रोज़ की ग़ज़लें
(एक)
अश्क आँखों में नहीं दिल में तमन्ना भी नहीं
मैं हूँ ऐसी शाख़ जिस पर एक पत्ता भी नहीं
छीन कर ले जायें आँखों से न ख़्वाबों को मेरे
ज़हर आलूद फ़ज़ाओं का भरोसा भी नहीं
डूब कर सोचों में दुनिया को भुला देता हूं मैं
साथ में तुम को भुला दूं तो ये अच्छा भी नहीं
वक्त के सैलाब में गुमनाम ही रह जायेंगी
दिल में उठती आँधियों का कुछ ठिकाना भी नहीं
उलझनें इतनी हैं ’आलम’ आईना देखें तो क्या
ज़िंदगी का इतना दिलकश अब तो चेहरा भी नहीं।
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(दो)
हमेशा हिजरतों के सिलसिले अच्छे नहीं लगते
हमें अब रुखे फ़ीके ज़़ाएक़े अच्छे नहीं लगते
सितारे उनकी मंज़िल का कभी उन्वाँ नहीं बनते
जिन्हें पुर ख़ार तन्हा रास्ते अच्छे नहीं लगते
मुझ उड़ जाने दे ताकि फ़ज़ा का जाएजा ले लूं
सुनहरी पट्टियों से पर बंधे अच्छे नहीं लगते
सितारों को कहाँ आराम मिलता है अँधेरे में
तभी तो दिन में ये जलते दिए अच्छे नहीं लगते
कभी वह बात ही कह दे कि जो दिल में उतर जाये
बिना सिर पैर के कुछ फलसफे़ अच्छे नहीं लगते
अगर बह जायें आँसू तो खिले रुखसार की रंगत
रुके पलकों पे तो ये क़ाफ़िले अच्छे नहीं लगते
मैं अपने ही जुनूँ से इक नया ’आलम’ बनाऊंगा
मुझे पाबन्द करते दाएरे अच्छे नहीं लगते।
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(तीन)
कश्तियों से उतर न जायें कहीं
लोग तूफ़ाँ से डर न जायें कहीं
ज़िन्दगी है कि आग का दरिया
शिद्दत-ए-ग़म से मर न जायें कहीं
जिनको ज़ुल्मत ने बाँध रखा है
चाँदनी में बिखर न जायें कहीं
रोक अशकों को अपने पलकों पर
ये भी हद से ग़ुजर न जायें कहीं
आओ लिख लें लहू से अह्द-ए- वफ़ा
क़ौल से हम मुकर न जायें कहीं
हर क़दम पर मुहीब साए हैं
हम भँवर में उतर न जायें कहीं
उनकी यादों के जख्म अय ’आलम’
वक्त से पहले न भर जायें कहीं।
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(चार)
दोस्तों! दुनिया से ज़ुल्मत को मिटाने के लिए
शमाँ कर दो इल्म की रौशन ज़माने के लिए
पैकर-ए- उल्फ़त बनो और दो मोहब्बत का पयाम
इस जहाँ को लय मोहब्बत की सुनाने के लिए
तुम को क्या मालूम तूफाँ किस कदर है जेर-ए-आब
कितने गम पीने पड़े हैं मुस्कुराने के लिए
तेरी यादों को बसा कर दिल में रखता हूं सदा
अपने दिल को शिद्दत-ए-गम से बचाने के लिए
हो गए कुर्बां सर-ए- मकतल मगर हैं सर बलन्द
सर हमारा था सर-ए-नेजा सजाने के लिए
किस कदर मुश्किल है ’आलम’ इन सवालों का जवाब
जिन्दगी है अपनी खातिर या जमाने के लिए।
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(पाँच)
दिल में गम और न कुछ खुशी होगी
यूँ तेरे बाद जिन्दगी होगी
इक अधूरा सा होगा ख्वाब महल
जिसमें मध्दम सी रौशनी होगी
लफ्ज जोडूँ तो शेअ्र हो जाए
तुझको सोचूँ तो शायरी होगी
दिल के दरवाजे पर हुई दस्तक
मेरी आँखों में फिर नमी होगी
दिल की उलझन से ये खयाल आया
बात मेरी गली गली होगी
तुझसे मन्सूब है सभी किस्से
कब कोई बात आम सी होगी
जेहन-व-दिल के जो कोई पास रहे
फिर खयालों में बन्दगी होगी।

Hemant Bhatt