शख्सियत : छोटे और बड़े शहरों के लेखकों के बीच कभी पाटी नहीं जा सकती खाई
कस्बाई लेखकों की पांडुलिपियां आर्थिक कारणों से छपने को तरसती रहती हैं और बड़े लेखकों की हर दूसरे तीसरे साल एक किताब छप जाती है। कहना न होगा कि छोटे शहरों के लेखकों की हालत रेस के हारे और थके घोड़ों जैसी है।
⚫ कवि एवं शोधछात्र धनेश्वर द्विवेदी का कहना
⚫ नरेंद्र गौड़
’हिंदी साहित्य की दुनिया आज दो खेमों में विभाजित है, एक खेमा वह है जो छोटे शहरों में रहते हुए लिखता तो है, लेकिन किताबों के दाम अधिक होने के कारण पढ़ नहीं पाता। वहीं दूसरा खेमा दिल्ली, मुम्बई, कोलकता, प्रयागराज, भोपाल, इंदौर जैसे बड़े शहरों में रहता है, जहां आये दिन सेमिनार, साल में तीन चार पुस्तक मेले आयोजित होते हैं जिसके चलते इन लेखकों की जान पहचान का दायरा विस्तृत होता है और रचना प्रकाशन के पर्याप्त अवसर मिलते हैं। लेखकों के बीच की यह खाई कभी पाटी नहीं जा सकती है।’

यह बात कवि तथा संस्कृत साहित्य में शोधकार्य कर रहे धनेश्वर द्विवेदी ने कही। इनका मानना है कि बड़े शहरों के लेखकों की बिरादरी अकादमियों या प्रकाशकों की सभा में बोलते, पुरस्कार लेते-देते रहे और पूंजीवाद से कथित रूप से लड़ने का दावा भी करते हैं। बड़े लेखकों की जमात यह भी तय करती है कि क्या लिखना श्रेष्ठ है और क्या लिखना नहीं! इस तरह शहरी और देहाती लेखकों के बीच खाई बढ़ती गई जिसे पाटा जाना संभव नहीं है।
कस्बाई लेखकों की किताबें छप नहीं पाती
एक सवाल के जवाब में धनेश्वर जी ने कहा कि ऐसा नहीं छोटे शहरों के रचनाकार प्रतिभावान नहीं हैं, लेकिन उनकी पहुंच अकादमियों तक नहीं, न प्रकाशकों तक होती है। कस्बाई लेखकों की पांडुलिपियां आर्थिक कारणों से छपने को तरसती रहती हैं और बड़े लेखकों की हर दूसरे तीसरे साल एक किताब छप जाती है। कहना न होगा कि छोटे शहरों के लेखकों की हालत रेस के हारे और थके घोड़ों जैसी है।
रस, छंद, अलंकार से चिपके कस्बाई लेखक
एक और सवाल के जवाब में धनेश्वर जी ने कहा कि कस्बों के लेखक साहित्य की उसी शब्दावली में जी रहे हैं जो पंत, प्रसाद, निराला, महादेवी के समय में प्रचलित थी, यही नहीं अनेक कवि रस, छंद अलंकार, दोहा, सोरठा की दुनिया में रमे हुए हैं। इनकी पहुंच सीमित है और आधुनिक साहित्य से बहुत दूर। कस्बाई लेखकों की गोष्ठियां इन दिनों सोशल मीडिया पर खूब प्रसारित हो रही है। जहां एक संचालक होता है और तीन चार कवि, कवयित्री होते हैं।
आधुनिक साहित्य में आम बोलचाल की भाषा
कवि धनेश्वर जी ने कहा कि छोटे शहरों में घरेलू और छोटे स्तर के कवि सम्मेलन भी होते हैं, जहां दस बारह श्रोता अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। इनमें से भी कई इन कवियों के रिश्तेदार होते हैं। ऐसी गोष्ठियों और कविता पाठ के आयोजन सोशल मीडिया पर खूब देखे, सुने जा सकते हैं। इन तथाकथित कवियों की भाषा या तो कूट साहित्यिक होती है या वह जो पचास साठ के दशक में प्रचलित थी। जबकि आज के दौर में भाषा आम बोलचाल से बाबस्ता हो चुकी है। कहीं-कहीं यह भाषा पूरी तरह अखबारी भी है। बड़े शहरों के लेखकों का मानना है कि देश की बड़ी आबादी कम पढ़ी लिखी है, ऐसे में हम इन सर्वहारा वर्ग तक अपनी रचनाएं ले जाना चाहते हैं, लेकिन सवाल उठता है कि समाज का यह वर्ग तो ऐसी हैसियत रखता नहीं कि इन ’महापुरूषों’ की महंगी किताबें खरीद सके?
हिंदी में एमए और संस्कृत में शोधकार्य
धनेश्वर जी का जन्म ग्राम थापला, जनपद पौड़ी गढवाल (उत्तराखंड) में श्री राकेश व्दिवेदी और श्रीमती बीना देवी के घर हुआ। इन्होंने आरंभिक शिक्षा गांव के समीप सराईखेत राजकीय प्राथमिक विद्यालय में प्राप्त की और माध्यमिक परीक्षाएं भुवनेश्वरी, चेधार रिठखाल के संस्कृत आवासीय विद्यालय से पास करने के बाद समस्या थी कैसे होगी आगे की पढाई?
साधू संतों के आश्रमों में सेवाकार्य
धनेश्वर जी ने बताया कि पहाड़ों में रहने वाले बहुत से विद्यार्थी साधू संतों के आश्रमों में सेवाकार्य करते हुए पढ़ाई करते हैं, इसलिए वे भी हरिव्दार आ गये और विभिन्न आश्रमों में संतों की सेवा करते हुए उच्च शिक्षा जारी रखी। इसके बदले भोजन और आवास की सुविधा मिलती गई। धनेश्वर जी ने बताया कि हरिव्दार के अनेक आश्रमों में सेवा कार्य करते हुए गुरूकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी के साथ संस्कृत में एमए और उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एमए भी कर लिया।
संस्कृत में शोधकार्य लगभग पूरा
धनेश्वर जी ने कुछ समय देहरादून के एक पब्लिक स्कूल में अध्यापन किया। बाद में हर माह आठ हजार रूपये सरकार से स्काॅलरशिप भी मिलने लगी। आखिर मेहनत रंग लाई और संस्कृत में शोधकार्य के लिए इनका चयन श्री नगर पौड़ी गढ़वाल के हेमवती नंदन बहुगुणा, केंद्रीय विश्वविद्यालय से हो गया। आप दो वर्षों से इसी विश्वविद्यालय के बादशाही थौल (उत्तराखंड) स्थित स्वामी रामतीर्थ परिसर में संस्कृत के शोधछात्र हैं। इन्हें उम्मीद है कि नेट परीक्षा पास करने के बाद किसी कालेज में प्रोफसर नियुक्त हो जाएंगे।
तीन पुस्तकें प्रकाशनाधीन
साहित्य के क्षेत्र में भी इनकी सक्रिय भूमिका रही है। तीन पुस्तकें जिनमें संस्मरण ’वज्रपात’, कविता संग्रह ’मेरे संघर्ष’, संस्कृत से हिन्दी में अनुदित उपन्यास ’दामिनी’ का प्रकाशन शीघ्र होने जा रहा है। आपके दो दर्जन से अधिक लेख एवं कविताएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। इसके अलावा “सृजन के अंकुर” साहित्यिक ई-पत्रिका का सम्पादन कर चुके हैं। आप ’चित् तरंगिणी’ त्रैमासिक पत्रिका के सम्पादक सदस्य रहे हैं। दो अंतरराष्ट्रीय, दस राष्ट्रीय सेमिनारों एवं छह राष्ट्रीय कार्यशालाओं में सहभागिता की है, इनके अनेक शोधपत्र प्रकाशित हो चुके हैं। विभिन्न पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है, जिनमें भाऊराव देवरस सेवा न्यास (लखनऊ) द्वारा ’बाल कवि सम्मान’ (2018), हरिव्दार के दीपशिखा साहित्यिक मंच द्वारा युवा प्रतिभा ’दीपशिखा सम्मान’ (2019) आदि शामिल हैं।
धनेश्वर जी की कविताएं
इंसानियत खो देगा मेरा गांव
शहर से दूर पहाड़ में गाँव है मेरा
अनेक संघर्षों से जीता गाँव है मेरा
नहीं हैं ऊँची इमारतें और शोर वहाँ
छोटे- छोटे घरों से बना गाँव है मेरा
सरल सीधा सच्चा भोलापन मिलता
दरिंदगी नफरतों से दूर गाँव है मेरा
धरती चीरकर भाग्य आजमाता
रात चैन की नींद सोता गाँव है मेरा
फ्रिज स्विमिंगपुल नहीं
शुद्ध नदियों में नहाता गाँव है मेरा
धर्मों की सियासत मार काट से दूर
सुख दुख में साथ रहता गाँव है मेरा
शौर्य साहस और वीरता रक्त में भरी
जंगल बाघ भालू के बीच गाँव है मेरा
स्कूल मंदिर सुंदर जंगल सब हैं
पुलिस स्टेशन के बिना गांव है मेरा
न पार्क मॉल न होटल है कोई
सुंदर पहाड़ियों से घिरा गाँव है मेरा
सुना है अब सड़क आ रही वहाँ
चहल पहल में अब होगा गाँव है मेरा
सब बदल जाएगा शहर की तरह
इंसानियत खोने वाला गाँव है मेरा।
अब दौड़कर भूखे दरिंदे आएंगे
आग में जलेगा फिर गांव है मेरा
शहर की हवा का रुख उधर चला
अब संकट में दिख रहा गांव है मेरा
शोर होगा हवा पानी सब खराब
बर्बाद होते मुझे दिखता गांव है मेरा।
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एकांतवास में चलते हैं
कहीं दूर एकांतवास चलते हैं
यहाँ कर्कश स्वर बहुत चुभते हैं
शांत स्वच्छ परिवेश होगा
निज देश में स्वप्न कुछ बुनते हैं
कोयल के मधुर गीत गुंजित होंगे
कोलाहल रहित निर्जन वन में
पक्षियों का करलव निनाद स्वर
प्रणय का मधुर संगीत रचेंगे
न होगा कपटी जन अरु मन
न आएगा बीच मीत-प्रीत कोई
सेवा भक्ति से मैं पूजा करूँगा प्रिये
न रह जाएगी हार जीत कोई
निज ही होगा राज्य हमारा
राजी काजी भी होंगे सभी
सत्ता सदा हाथों में हमारे
जहा न होगा दोषी कोई
मैं नृप नृजन हो जाऊँगा
तुम वन सृजन हो जाना
बहाना तु प्रेम की धारा
श्वास से श्वास प्यास बुझाना
झुलसती भू घाम तप्त हो अगर
स्थिर घनघोर तरु मैं हो जाऊँगा
प्रतिच्छण प्रेमालाप निजालय
तुम संग प्रेम की धार बहाऊं।

Hemant Bhatt