शख्सियत : संस्कृत दुनिया की सबसे समृध्द भाषा लेकिन, उपेक्षा की शिकार
सम्राट अशोक के शासन काल में यह अस्तित्व में नहीं थी, उस समय ’ब्राम्ही लिपि’ चलती थी। उनके शासन के बरसों बाद संस्कृत अस्तित्व में आई। भारत की प्राचीनतम भाषा सिंधु लिपि है, जिसे आज तक पढ़ा नहीं जा सका।
⚫ कवयित्री डाॅ. सुषमा श्रीवास्तव का कहना
⚫ नरेंद्र गौड़
संस्कृत तमाम भारतीय भाषाओं की जननी है, वहीं यह दुनिया की सबसे समृध्द भाषा भी है। बावजूद इसके इस प्राचीन शास्त्रीय भाषा को ऐतिहासिक, सामाजिक और शैक्षणिक कारणों से हमारे देश में उपेक्षा की शिकार होना पड़ रहा है। इस भाषा का महत्व कम किए जाने की वजह से युवापीढ़ी में इसके अध्यययन को लेकर रुचि कम हुई है। स्कूलों में संस्कृत की स्थिति बहुत दयनीय है, बुनियादी सुविधाओं का अभाव है एवं पढ़ाने के लिए योग्य शिक्षक नहीं मिलते हैं।’

यह बात कवयित्री तथा संस्कृत में पीएचडी कर चुकी अध्यापिका डाॅ. सुषमा श्रीवास्तव ने कही। इनका कहना था कि भारत की ऐसी कोई भाषा ऐसी नहीं है जिसके मूल में संस्कृत नहीं हो, लेकिन खेद और चिंता की बात है कि हमारे देश में संस्कृत उपेक्षित है, वहीं विदेशों के अनेक विश्वविद्यालयों में संस्कृत ऐच्छिक विषय के रूप में पढ़ाई जा रही है। मैक्समूलर जर्मनी के निवासी थे, लेकिन वह संस्कृत के विव्दान थे। इसी प्रकार डाॅ. कामिल बुल्के बेल्जियम से भारत आये थे, वह मिशनरी पादरी थे, उन्हें संस्कृत और हिंदी का प्रकांड पंडित माना जाता था। इतना ही नहीं, उन्होंने ’हिंदी शब्दकोश’ तैयार किया जिसे देश का सर्वश्रेष्ठ शब्दकोश माना जाता है। इन तमाम बातों के बावजूद संस्कृत हमारे देश में उपेक्षित है।
संस्कृत भाषा उपेक्षित क्यों?
यह पूछे जाने पर कि ‘संस्कृत की उपेक्षा के प्रमुख कारण क्या हैं?’ इस पर सुषमा जी ने कहा कि संस्कृत में जो बोला जाता है, वहीं लिखा जाता है। इसमें शब्द क्रम में परिवर्तन करने से अर्थ भिन्न नहीं हो जाता है। सुषमा जी ने बताया कि महर्षि पाणिनि को संस्कृत का पिता माना जाता है। उन्होंने इस भाषा को व्याकरण सम्मत रूप दिया जिसके लिए ’अष्टाध्यायी’ नाम ग्रंथ की रचना की। पाणिनि का यह व्याकरण ग्रंथ आठ अध्यायों में विभाजित है और इसमें लगभग चार हजार सूत्र हैं।
संस्कृत पवित्र एवं विकसित भाषा है
एक सवाल के जवाब में डाॅ. सुषमा ने बताया कि संस्कृत का मतलब है, अच्छी तरह से ’परिष्कृत’ या ’सुसंस्कारित’ तरीके से बनाया गया। यह पवित्र तथा विकसित भाषा है। इसका जन्म इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार से हुआ है और वैदिक संस्कृत से विकसित होकर पाणिनि के व्याकरण व्दारा इसे व्यवस्थित रूप दिया गया।
संस्कृत का दूसरा नाम देववाणी
डाॅ. सुषमा ने बताया कि संस्कृत को देववाणी भी कहा गया है, अर्थात देवी देवता, ऋषि, मुनि यही भाषा बोला करते थे, लेकिन इस भाषा का उच्चारण कठिन होने के कारण आम जनता में लोकप्रिय नहीं हो सकी। गीता, पुराण, महाभारत, रामायण इसी भाषा में लिखे गये हैं। वहीं धार्मिक ग्रंथों की भी भाषा संस्कृत है। यह भी उल्लेखनीय है कि यह भाषा आरंभ में लिखित रूप में नहीं थी और इसे कंठस्थ किया जाता था, इसका लिखित रूप बरसों बाद आया। सम्राट अशोक के शासन काल में यह अस्तित्व में नहीं थी, उस समय ’ब्राह्मी लिपि’ चलती थी। उनके शासन के बरसों बाद संस्कृत अस्तित्व में आई। भारत की प्राचीनतम भाषा सिंधु लिपि है, जिसे आज तक पढ़ा नहीं जा सका।
गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकार्ड में दर्ज संस्कृत का लम्बा शब्द
सुषमा जी ने बताया कि संस्कृत का सबसे लम्बा शब्द ’वरदम्बिका परिणय चम्पू’ नामक ग्रंथ से लिया गया है जिसमें 195 अक्षरों का एक शब्द है। जिसमें प्यासे यात्रियों को शीतलता प्रदान करने वाली लड़कियों का वर्णन है। यहां उल्लेखनीय है कि सबसे लम्बे शब्द के रूप में यह बात ’गिनीज बुक आॅफ वल्र्ड रिकार्ड’ में भी दर्ज है। संस्कृत भाषा में 102.78 अरब शब्द हैं, यह संख्या अधिक भी हो सकती है, क्योंकि एक शब्द के कई रूप होते हैं, जैसे कि एक शब्द के असंख्य पर्यायवाची शब्द हैं और एक ही शब्द को कई तरह से बनाया जा सकता है। कहना न होगा कि यह दुनिया की सबसे समृध्द भाषा है। संस्कृत में 42 अक्षर माने जाते हैं, यानी 13 स्वर तथा 33 व्यंजन, लेकिन पाणिनी शिक्षा के अनुसार 63 अक्षर माने जाते हैं जिनमें अयोगवाह (अनुस्वार, विसर्ग आदि) और कुछ अन्य वर्ण शामिल हैं।
बचपन से लिखने का शौक
दयालपुर जिला बाराबंकी (उप्र) में श्री कमलाप्रसाद जी तथा श्रीमती रामा देवी के घर जन्मी सुषमा जी को बचपन से लिखने का शौक रहा है। आपने संस्कृत में पीएचडी किया है। इन दिनों लखनऊ की एक शिक्षण संस्था में संस्कृत की अध्यापिका हैं। इनकी रूचि साहित्य पठन पाठन एवं लेखन में है। इनका कविता संकलन ’मैं स्त्री हूं’ सुधि पाठकों में बहुत सराहा गया है। ’नवदीप के रचनाकार’ नामक एकल संकलन में भी इनकी कई कविताएं संकलित हैं। इसके अलावा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में इनकी कविताएं एवं लघुकथाएं प्रकाशित होती रही हैं। इन्हें यूपी महोत्सव सम्मान, काव्य मंजूषा सम्मान, रूबरू साहित्य सम्मान से नवाजा जा चुका है। आपका रचना पाठ ’अखिल भारतीय सर्वभाषा संस्कृति समन्वय समिति’, ’उत्तर प्रदेश महोत्सव मंच’, ’काव्य मंजूषा मंच’, ’कविता प्रभा राष्ट्रीय साहित्यिक समूह’ तथा ’उत्तराखंड महोत्सव’ आदि महत्वपूर्ण मंचों से हो चुका हैं।
डाॅ. सुषमा की कविताएं
काश! लौट आये बचपन
चलो बचपन फिर जी लें आज
नहीं कोई चिंता ना कोई काज
चलो बचपन फिर जी लें आज
माता-पिता की प्यार भरी
झिड़की प्यारी लगती थी
सारी दुनिया सारी जागीर
अपनी ही तो लगती थी
मन को नहीं चुभा करती थी
जब अपनों की बात
माँ की गोद में नींद भरी
आंखों में सपने आते थे
होठों पर मुस्कान थिरकती
पल में दुख मिट जाते थे
ना तो कोई द्वेष और ईष्र्या
ना तो था प्रतिवाद
अतुलनीय यह बाल अवस्था
केवल सच्चाई और सरलता
दादी नानी के प्यार भरे
में खेल रही चंचलता
मां के हाथों की रोटी में
मिलता था मीठा स्वाद
इतनी दूर निकल आए हैं
छोड़ गली उस बचपन की
सब कुछ पाया फिर भी अधूरी
यादें झूले सावन की
जिनके संग बीता बचपन
अब उनकी केवल याद
बूढ़ा हो गया पेड़ नीम का
फिर भी हाथ फैलाए हैं
एक आस और एक उम्मीद
मन में अब भी जगाए है
चलो मिलकर हम फिर से
बैठे उसकी ठंडी छांव।
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माँ के लिए
हे मातृ शक्ति तुम्हें प्रणाम!
तेरे चरणों में चारों धाम
तन मन में उर में बसती
दुःख सहकर भी हँसती रहती
तू जीवन के दुख आतप में
छाया बनकर हरदम रहती
इस विश्व में ईश्वर आ न सका
मां इसीलिए तुम आई हो
जब आंख खुली तुम्हें देखा
तुम जीवन की गहराई हो
जीवन में उदासी की चादर
जब कभी मुझे ढ़ंक लेती है
स्पर्श तुम्हारे हाथों का
एक आत्म शक्ति दे देती है
मेरे तन का एक-एक रोआं
उऋण न कभी हो पाएगा
तेरा वरदहस्त यह बना रहे
मेरा जन्म सफल हो जाएगा
मेरे जीवन का एहसास हो माँ
मधुमय जल की एक प्यास हो माँ
बिखरे कण की एक आस हो माँ
मुश्किल करती है आसान हो माँ
तीर्थ के पावन जल जैसा
आंचल की हरदम चाह है माँ
तेरे चरणों में जीवन अर्पित
मेरे दिल के उद्गार है माँ।
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तिरंगा पहने आये
घनघोर अंधेरी रात में
आशा का दीया जलाए
शायद वे लौट आएं
शायद वे लौट आएं
सरहद पर उनके नाम का
डंका बज रहा है
वे जागते हैं दिन रात
और देश सो रहा है
उनकी ही हिम्मत से
यह देश मुस्कराए
जीवन पूरी तपस्या
जीवन का लक्ष्य एक है
होता है कोई बिरला
होते नहीं अनेक!
सर्दी की सर्द रातें
गर्मी के लू थपेड़े
चलता ही जा रहा है
चाहे बरसते ओले
रुकते नहीं कदम
एक बार जो उठाए
दुश्मन खड़ा है तनकर
लेकिन पर पीठ न दिखाते
मार कर मरूंगा
हंसते मुस्कुराते
भारती का वंदन
जय- जय तिरंगा गाएं
छोड़ा मां बहन को
और आधी जिंदगी को
नन्ही कली चमन की
खुशबू जो उपवन की
सब कुछ देकर वतन को
पहने तिरंगा आए।

Hemant Bhatt