शख़्सियत : सोशल मीडिया के जरिए लुगदी साहित्य का हो रहा आदान-प्रदान
साहित्य पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है समय-समय पर समाज के कानों तक वह बात पहुंचाने की जो वह सुनना नहीं चाहता। इसलिए लिखा जाना जरूरी है। जो घर परिवार सम्भाल रही हैं वे महिलाएं आम नहीं हो सकती हैं, वे बेहद खास हैं। घर सम्भालते हुए लिखते रहना मेरे लिए यूं है मानों पानी में रहकर तैरते रहना।
⚫ कवयित्री प्रगति बच्छावत का कहना
⚫ नरेंद्र गौड़
‘फेसबुक वाटस एप, इंस्ट्राग्राम सहित सोशल मीडिया के अन्य प्लेट फार्म ने कविता, कहानी और आलेख लिखना हालांकि आसान अवश्य कर दिया है, लेकिन इसके चलते अधिकांश गुगदी साहित्य का आदान प्रदान हो रहा है।’

यह बात आधुनिक कविता की सशक्त हस्ताक्षर प्रगति बच्छावत ने कही। इनका कहना था कि जिस प्रकार खोटी मुद्रा अच्छी और टकसाली मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है, ठीक उसी तरह अच्छे और सार्थक लेखन के बजाये घटिया रचनाएं प्रचलन में आ रही हैं और बेहतरीन रचनाएं चलन से बाहर हो रही हैं। पाठक बाजारू साहित्य पढ़ रहा है, वहीं सोशल मीडिया के कारण लोग रातों रात कवि, कथाकार, गीतकार और उपन्यासकार बन रहे है। अपनी लिखी रचनाएं मित्र मंडल, रिश्तेदारों में प्रसारित कर श्रेष्ठ लेखक होने का भ्रम पाला जा रहा है।

जनता की पक्षधर कविताओं का भविष्य उज्वल
एक सवाल के जवाब में प्रगति बच्छावत ने कहा कि कला और कविता के आपसी रिश्तों के रोयें रेशे और अधिक खोले जा सकते हैं ,किंतु इसका आधार इन्हें सरल बनाना ही होना चाहिए। आज जब अमेरिका के बच्चे भी युध्द के विरोध में व शांति के लिए चित्र बना रहे हैं तो जनता की पक्षधर कलाओं का भविष्य निश्चित ही उज्वल है। आवश्यक्ता तो कला को जनता के बीच ले जाने और जनता के सौंदर्य चेतना के विकास की है। व्यवस्था के प्रचार माध्यमों व्दारा फैलाई जा रही ’अपसंस्कृति’ ने इस कार्य को एक बड़ी चुनौति का रूप दे दिया है।
प्रकृति और श्रम एक दूसरे के पूरक
प्रकृति और श्रम के बारे में पूछे सवाल के जवाब में प्रगति का कहना था प्रकृति और श्रम एक दूसरे के पूरक तत्व हैं। यह आज के जन-जीवन से जुड़े कलाकार की मूलदृष्टि है। श्रेष्ठ कविता के बारे में प्रगति का कहना था कि ऐसी कविता की एक पहचान यह भी है कि यह हमें एक से अधिक बार पढ़े जाने के लिए आकर्षित करती है। दूसरी बार पढ़े जाने पर हमें कविता का और विशद् अर्थ मिलता है। कविता में ऐसा बहुत कुछ होता है जो प्रत्यक्षतः कहा गया नहीं होता किंतु यही महत्वपूर्ण भी होता है। कई बार इस अनकहे को समझने के लिए हम कविता में पुनः झांकते हैं। कविता को सम्पूर्णत्व में ग्रहण करने पर हमें इसमें निहित संदेश का आभास होता है।
कविता के करीब आने लगे हैं पाठक
एक सवाल के जवाब में प्रगति का कहना था कि अब पाठक कविता के करीब आने लगे हैं। नवोदित कवियों ने भी खूबसरत काम किया है। मीडिया ने कविता लिखना और पहुंचाना दोनों आसान कर दिया है। लेकिन अपने नाम के आगे लेखक लिखा जाना फैशन का हिस्सा अवश्य बनता जा रहा है। एक अन्य सवाल के जवाब में इनका कहना था कि साहित्य अंतर्मन का आईना है और समाज के लिए वो दर्पण जिसमें झांक पाना आसान नहीं है। यह दुखद बात है कि अब तक इस कला को वह दर्जा नहीं मिल पाया जिससे आजीविका चल सके। साहित्य पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है समय-समय पर समाज के कानों तक वह बात पहुंचाने की जो वह सुनना नहीं चाहता। इसलिए लिखा जाना जरूरी है। जो घर परिवार सम्भाल रही हैं वे महिलाएं आम नहीं हो सकती हैं, वे बेहद खास हैं। घर सम्भालते हुए लिखते रहना मेरे लिए यूं है मानों पानी में रहकर तैरते रहना।
अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन
हिंगोली महाराष्ट्र में जन्मीं प्रगति ने लिखने की शुरुवात आठ वर्ष के आयु से कर दी थी। मराठी मीडियम स्कूल से पढ़ी हुई प्रगति की आरंभिक रचनाएं हिंदी के साथ मराठी भाषा में भी हैं। साथ ही शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ग्रहण कर चुकी प्रगति कुशल गायिका भी हैं। आप कथाकारिता के लाइव शो करती हैं। प्रगति हिंदी अनुवादक भी हैं। इनकी अनुवादित किताब ’पराक्रम और परंपरा’ ऑनलाइन उपलब्ध है। ’मौन सीता की रामायण’ इनका पहला कविता संकलन प्रकाशित है। वर्ष 2020 में ’विमेंस वेब’ नामक ’ई पत्रिका’ में इनके बीस आलेख छपे हैं। वर्ष 2021 में कैप्टन प्रताप सिंह मेहता द्वारा लिखी गई किताब ’गन्स एण्ड ग्लोरिस’ का आपने हिंदी में अनुवाद किया है। यह पुस्तक ’पराक्रम एवं परंपरा’’ नाम से प्रकाशित है एवं अमेजॉन पर उपलब्ध है। वर्ष 2021 में ईएसएन पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित कविता संग्रह ’1111 पोएम्स इन ए बुक ऑफ लंदन बुक ऑफ रिकॉर्ड्स’ में इनकी कविता शामिल है। इसके साथ ही वर्ष 2022 में ईएसएन पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित ’7575 पोएम्स इन ए बुक ऑफ इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स’ में इनकी बीस कविताएं बहुत चर्चित हुई हैं। वर्ष 2023 में ’बोल के लब आजाद’ एवं ’शब्दहार’ द्वारा प्रकाशित ई मासिका ’निर्झरा’ में इनकी लघुकथा प्रकाशित है। प्रगति अपनी कविताओं को ओपन माइक के जरिए भी प्रस्तुत करती रही हैं।
पिता जी से मिली लिखने की प्रेरणा
प्रगति ने बताया कि इनके पिता कवि थे और लिखने की प्रेरणा उन्हीं से मिली। इसके अलावा इनकी भाई साहब भी लेखक हैं जिन्होंने मैनजमेंट को लेकर कई किताबें लिखी हैं। मराठी लेखक पु.ल. देशपांडे, रंजीत देसाई, शांता शेळके, कुसुमाग्रज, मुक्तिबोध, सुभद्राकुमारी चैहान, माखनलाल चतुर्वेदी, नरेश सक्सेना, विनोद कुमार शुक्ल, बाबुशा कोहली इनके प्रिय रचनाकार हैं।
प्रगति बच्छावत की कविताएं
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ईश्वर की भाषा
कहते हैं आप का सोचा
ब्रह्माण्ड में दर्ज हो रहा है
कितनी कविताएं , कुछ किरदार
वो मिटती सी साफ सुथरी यादें
वो साफ- साफ सी मलीन नीयतें
क्या सब दर्ज हो रहा है कहीं पर?
कहां? और जो हो रहा दर्ज
वह कौन जाहिर करेगा?
कैसे सामने आएगा?
कौन कहेगा? कैसे लिखा जाएगा?
भाषा कौन सी है ब्रह्माण्ड की?
ईश्वर की? वो हिंदी में
सोचा क्या मराठी में रिहा होगा ?
या मराठी का लिखा, तेलुगु में दर्ज होगा?
या फिर तमिल का हिंदी में?
मेरा सोचा, मेरी भाषा, मेरा कहा, मेरा सच
सब झूठ बन कर किसी और भाषा में
न जाने कहां दर्ज हो रहा है ?
लेकिन कहीं तो हो रहा है
हां ! आप ने सही सोचा
वहीं तो हो रहा है !!
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परम प्रेम
वह ख़त लिखा ही न मैंने
जो लिखना था तुम्हें
कई बार, कितने ही अरसे से
ख़त में जो लिखनी थीं
वे कही ,सुनी सारी बातें
लिख ही न पाई कभी
जो हौले हौले धुंधली पड़ गईं
मेरी स्मृति की स्मृति में
कलम हाथों में लिये
मुंह तकती हूं कागज का
और सोचती हूं
यह क्या है जो मेरे
और इस खत के आड़े खड़ा है?
शायद आत्मसम्मान
या शायद अहंकार
खत लिखना चाहती हूं
ताकि लिखते लिखते
यह दोनों ही उस कागज में
विलीन हो जाएं
और रह जाए केवल प्रेम !
परम प्रेम !!
मैं वह खत लिखना चाहती हूं!
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पता नहीं क्या?
उसने लिखी कविता
पढ़ी नज्म़ गाई ठुमरी
बजाया सितार
मुशायरों में वह जाता रहा
कवियों की सभा में आता रहा
गाने की महफिल में
कभी यमन तो कभी
मल्हार भी गाता रहा
तालियां गूंजीं
वाहवाही हुई
वो ’पंडित’ कहलाया
कभी ’कविराज’ सरमाया
मैं इंतजार में हूं
किसी दिन
’विदुषी’ हो जाऊंगी
या शायद
’कविरानी’ कहलाऊंगी
’कवयित्री’ और ’श्रीमती’
अब मुझे देखते हैं
अपनी आंखों में
अनगिनत प्रश्न लिए हुए
मैं कोई भी नहीं होना चाहती
मैं कोई तो होना चाहती हूं
पता नहीं क्या ?
पता नहीं कौन ?
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दीमक का आत्मसम्मान
किसी दिन कोई दीमक
रेंगती सी आई
मेरी किताबों पर और लौट गई
यह सोचकर कि
जिसे पहले ही अल्फाज खा चुके हों
उस झूठन को अब खा कर
हासिल भी क्या होना है?
दीमक का भी अपना
आत्मसम्मान है
अब वो मेरी किताबों को
बस! सूंघ कर लौट जाती है।
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रूमी का मैदान
यह शब्द पढ़े पहले भी हैं
यह नाद सुना पहले भी है
इस प्रतीक्षा में कुछ नव नहीं
इस ध्वनि में वो कलरव नहीं
सवेरा वही होने को है
फिर रात वही सोने को है
वह मैदान काल्पनिक रहा होगा
’रूमी’ को भी न मिला होगा।
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एक कप बारिश
एक कप में भर ली बारिश
एक कप में यादें तेरी
थामा कस के हाथों से यूं
थोड़ी यादें, बाकी साजिश
इस साजिश में हाथ न तेरा
तेरी यादें, मेरी बंदिश
बंदिश का हर सुर था मेरा
तेरी खुशियां, मेरी रंजिश
इस रंजिश में दिल भी टूटा
तेरा जाना, मेरी कोशिश
कोशिश कर के हारी अब मैं
अब के फिर से रोई बारिश

Hemant Bhatt