शख्सियत : संपूर्ण भूमंडल को ढंक चुकी स्वार्थ की कालिख़

आज संयुक्त परिवारों का दिन-प्रतिदिन विखंडन हो रहा है, समुदाय टूट रहे हैं, समाज कमजोर हो रहा है, जीवन कठिन होता जा रहा है। दूसरी तरफ सोशल मीडिया संबंधों और भावनाओं को निरंतर कमजोर कर रहा है। जब समाज बँटने लगता है तो एक समुदाय ही नहीं, वरन् पूरा देश कमजोर होता है।

शख्सियत : संपूर्ण भूमंडल को ढंक चुकी स्वार्थ की कालिख़

कवयित्री स्वाति स्वर्णकार ’शाश्वत’ का कहना

⚫ नरेंद्र गौड़ 

 ’’वर्तमान समय में मनुष्य का जीवन अत्यंत जटिल होता जा रहा है, ऐसे में दया, ममता, परोपकार, करूणा जैसी सहज मानवीय भावनाएं लगातार कम होती जा रही हैं। हमारे देश ने जहां ’वसुधैव कुटुम्बकम्’ यानी संपूर्ण धरती को अपना कुटुम्ब माना है, वहां भी लोग संकीर्णता के शिकार हो चुके हैं। स्वार्थ की कालिख संपूर्ण भूमंडल को ढ़ंक चुकी है।’’

यह बात कम उम्र के बावजूद पांच सौ से अधिक कविताओं का सृजन कर चुकी कवयित्री स्वाति स्वर्णकार ’शाश्वत’ ने कही। इनका मानना है कि मनुष्य का रोजमर्रा जीवन भौतिक सुख सुविधाओं का ग़़ुलाम हो चुका है, वहीं मानव श्रम कम से कम होने लगा है, अधिकतर काम मशीनों के जरिए हो रहे हैं। पहले जहां खेतों में अनाज बुवाई, निंदाई, कटाई गुड़ाई और उत्पादों को मंडी तक ले जाने का काम मजदूर किया करते थे, आज अधिकांश काम ट्रैक्टर ट्रालियों के जरिए किए जाने लगे हैं। यहां तक कि बैलों की उपयोगिता भी अब नहीं रही है। एआई दस्तक दे चुका, जिसके चलते मनुष्य का जीवन और अधिक रोबोटिक हो जाएगा।

सफलता के बदल चुके मापदंड

 एक सवाल के जवाब में स्वाति जी ने कहा कि आज व्यक्ति की सफलता के मापदंड धन, पद और वैभव हो चुके हैं, भले ही वह व्यक्ति अतीत में अपराधी रह चुका हो। डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरूमीत सिंह ’राम रहीम’ जिसे दुष्कर्म और हत्या के मामलों में बीस साल की सजा हुई है, पैरोल पर 15 वीं बार जेल से बाहर है। कोर्ट ने ’कृपा’ करते हुए इस बार उसे 40 दिन की पैरोल पर रिहा किया है। वहीं उमर खालिद पांच साल से तिहाड़ जेल में बंद है। हजारों लोग बेमौत मारे जाते हैं, लेकिन सत्ता के दलाल चुप्पी साधे रहते हैं। ऐसे अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं, जहां निर्दोष उम्र कैद की सजा भुगत रहे हैं और जिनके हाथ खून से रंगे हैं, सीना ताने घूम ही नहीं रहे है, जनता उनके जयकारे लगा रही है। ऐसे अनगिनत सवाल दिमाग में उठते हैं, एक जगह मैंने लिखा भी है ’अनगिनत सवाल उठते हैं, जिनका कोई उत्तर नहीं, वही सवाल बार-बार मन की शांति को डसते रहते हैं।’

संयुक्त परिवारों का विखंडन

 स्वाति जी का कहना था कि आज संयुक्त परिवारों का दिन-प्रतिदिन विखंडन हो रहा है, समुदाय टूट रहे हैं, समाज कमजोर हो रहा है, जीवन कठिन होता जा रहा है। दूसरी तरफ सोशल मीडिया संबंधों और भावनाओं को निरंतर कमजोर कर रहा है। जब समाज बँटने लगता है तो एक समुदाय ही नहीं, वरन् पूरा देश कमजोर होता है। जाति, पाति, ऊंच-नीच की भावनाएं सामाजिक एकता को तोड़ चुकी हैं। आपसी अविश्वास जन्म ले चुका है, जिससे राष्ट्रीय हितों में कठिनाई उत्पन्न हो रही है। यह विभाजन विकास, न्याय और लोकतंत्र के मार्ग में बाधक है।      

पांच सौ से अधिक कविताओं का सृजन

 कादीपुर (नगरा) छपरा बिहार में श्री रामनाथ प्रसाद एवं श्रीमती सुनैना देवी के घर जन्मी स्वाति जी स्नातक हैं और इन दिनों प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रही हैं। अभी तक  पांच सौ से अधिक कविताएं लिख चुकी हैं। इनका कहना है कि साहित्य के जरिए हम जीवन को आसानी से समझ सकते हैं। इन्हें नहीं पता कि कब और कैसे साहित्य की तरफ खिंचती चली गई। शुरू में तो यह भी पता नहीं था कि साहित्य होता क्या है, लेकिन आज साहित्य इनके जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है, एक ऐसा अंग जो कि हर दिन कुछ न कुछ नया सिखाता है।

स्वाति जी की कविताएं


बीते साल का बही खाता

पुराने साल का 
हिसाब-ए-जिंदगी देख रही हूँ
तमन्नाओं को अपनी 
अब भी अधूरी देख रही हूँ
आज भी उसी मुकाम पर 
जिंदगी ठहरी है
और मैं वक्त़ के साथ
बदलती तारीख़ देख रही हूं। 

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मैं अबला नहीं 

अबला नहीं मैं 
अब तेरी मुँहबोली बातों की
नहीं गुलाम
सबला बन गई नारी 
जरा नज़र डाल, कर सलाम!
तेरी बुद्धि झींगुर-सी
और कहता मुझको अबला?
धरती पर तू आया जब 
तब भी नारी ही थी सबला
निर्भय हूं, नभ चीर दूँ 
पाताल तलक उतर जाऊँ
कमजोर नहीं हूं तेरी 
बेमतलब बातों से घबराऊं
आत्मविश्वासी, समर्पित 
मगर लाचारी नहीं
शिक्षित, विवेकी, तेजस्विनी 
मैं अधिकारी सही
ममतामयी मैं
मैं ही शक्ति की स्वरूपा
जिसका उपवास तू करता 
मैं वही तो नारी रूपा
धन की देवी को पूजता
बुद्धि को भी सरस्वती से मांगता
पर जिस नारी ने जन्म दिया
उसको अबला कह ठगता!

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स्त्री की आवाज़

प्राचीन काल से चली आ रही पीड़ा हूँ
समाज की नजरों में बस एक मीरा हूँ
सहती रही हर प्रहार चुपचाप
फिर भी इस जग में मैं निठल्ली हूँ?
मेरा अस्तित्व क्या है? 
मेरी पहचान कौन?
वो जो तुमने कहा, बस वही?
या वो जो मैंने जिया, महसूस किया
जो मेरे भीतर गूंजती रही 
बताओ, क्या वो भी मैं नहीं?
नारीत्व ओढ़े, भावनाएं समेटे
मौन, चुप्पी, कठपुतली बन जीती रही
तुम्हारे नखरों को सहती
हर रिश्ते को थामे रही
पर खुद के लिए माँगा क्या?
बस इतना सा, एक इज्जत भरा नाम
पर तुमने समझा क्या?
मेरे समर्पण को देखा दुर्बलता
और दिया क्या? धिक्कार, तिरस्कार
जिसे चाहा, वैसे किया इस्तेमाल
मेरे धैर्य, मेरी चेतना 
मेरी शक्ति का क्या?
कह दिया पूजनीय हूँ
मगर समान अधिकार 
वो तो तुमने कब दिया?
सभा में बैठे इतराते हो जैसे 
सब कुछ जानते हो
बेच दिया मेरा अस्तित्व 
झूठी वीरता, खोखला पुरुषार्थ गवां
और तब भी, जब मेरी अग्निपरीक्षा ली गई
तुम रहे असंतुष्ट सदा
सिर्फ झूठी शान में तुमने 
मुझे वन में छोड़ दिया
क्या उस उसूल का, जो पति और 
पिता का धर्म भी निभा न सका
क्या-क्या गिनाऊँ मैं?
हर युग ने, हर मन ने मेरी पीड़ा को 
अनदेखा किया
मैं बहती रही रक्त की धार से
तुम्हें जीवन देती रही सदा
और अंत में उसी पर तुमने 
अनेक सवाल किए?