वसंत पंचमी के दिन महाराजा रतनसिंह ने की थी रतलाम राज्य की स्थापना
वसंत पंचमी का दिन रतलाम राज्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, इसी दिन सन् 1652 मेें इसकी स्थापना महाराजा रतनसिंह जी राठौड़ ने की थी, जो कि जोधपुर के राजा महेशदास जी के सुपुत्र थे। महाराज सज्जनसिंह के कार्यकाल में रतलाम ने खूब उन्नति की। रतलाम को आधुनिक स्वरूप दिया।
⚫ नरेंद्र गौड़
वसंत पंचमी का दिन रतलाम राज्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, इसी दिन सन् 1652 मेें इसकी स्थापना महाराजा रतनसिंह जी राठौड़ ने की थी, जो कि जोधपुर के राजा महेशदास जी के सुपुत्र थे।
रतनसिंह जी ने बचाई शाहजहां की जान
कहा जाता है कि आगरा महल के बगीचे में मुगल बादशाह शाहजहां के 50 वें जन्मदिन का जश्न धूमधाम से मनाया जा रहा था, तभी हाथियों के युध्द में एक हाथी मदमस्त हो कर बिगड़ गया। तब वहां मौजूद युवा रतनसिंह ने अत्यंत वीरता का प्रदर्शन करते हुए अपनी कटार से हाथी को काबू में कर लिया और शाहजहां की जान बचाई। जिससे प्रसन्न होकर शाहजहां ने रतनसिंह को राजपूताना के दक्षिण पश्चिमी जिलों का बड़ा भूभाग जागीर में प्रदान किया था।
13 तोपों की सलामी
महाराजा रतनसिंह जी को मुगलों के समय 13 तोपों की सलामी दी जाती थी और वह तीन हजार घुड़सवारों के सेनापति थे। उन्हें चैर (याक की पूंछ) मोरचल (मोरपंख), सूरजमुखी (पंखों पर सूर्य और चंद्रमा), माही (मछली का प्रतीक चिंह) प्रदान कर सम्मानित किया गया था। उस समय मालगुजारी से रतलाम राज्य की कुल आय 53,000,000 रूपए थी और कुल रकबा 2,336 वर्ग किमी था।
शाहजहां का खास उद्देश्य
शाहजहां ने रतनसिंह जी को यह भूभाग एक खास उद्देश्य से दिया था, क्योंकि यह दक्षिण में गुजरात के सूबेदार मुराद और औरंगजेब के विरूध्द एक सुरक्षा कवच का काम करता था। सन् 1658 में शाहजहां की मृत्यु की झूठी अफवाह के चलते उसके पुत्रों के बीच उत्तराधिकार को लेकर युध्द शुरू हो गया। दाराशिकोह ने जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह के नेतृत्व में राजपूतों और मुगलों की संयुक्त सेना को औरंगजेब के खिलाफ लड़ने को भेजा।
तलवारों के लगे 80 घाव
राठौर वंश के मुखिया होने के कारण महाराजा रतनसिंह को राजसेना की कमान सौंपी गई थी। फतेहाबाद के निकट धरमत में औरंगजेब की सेना के साथ भीषण युध्द हुआ, लेकिन मुस्लिम सेनापतियों की दगाबाजी के कारण औरंगजेब की सेना भारी पड़ी। इस युध्द में महाराजा रतनसिंह के शरीर पर तलवारों के 80 घाव लगे थेे, उन्होंने वीरगति प्राप्त की। उनकी महारानी सुखरूपदे कंवर सती हो गई। आज भी धरमत में उनकी समाधि देखी जा सकती है।
महाराजा सज्जनसिंह जी ने दिया रतलाम को आधुनिक रूप

रतलाम को आधुनिक रूप महाराजा सज्जनसिंह ने दिया। उन्होंने 13 जनवरी 1893 से 3 फरवरी 1947 तक शासन किया, जो कि ब्रिटिश शासन से भारत की स्वतंत्रता से छह महीने पहले का समय था। उनकी मृत्यु 67 वर्ष की उम्र में हुई। अंग्रेजों ने उन्हें अनेक खिताबों से नवाजा था। वह मात्र 13 वर्ष की उम्र में रतलाम राज्य के महाराजा बने थे। उन्होंने इंदौर के डेली काॅलेज और अजमेर के मेयो काॅलेज से शिक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने देहरादून स्थित इंपीरियल कैडेट कोर में सेवा की और 1898 में बालिग होने तक एक रीजेंसी के तहत शासन किया। 1908 में ब्रिटिश भारतीय सेना में मानद कप्तान के रूप में कमीशन प्राप्त करने के बाद 1911 में उन्हें मेजर के पद पर पदोन्नत किया गया। उन्होंने प्रथम विश्वयुध्द में 1914 से 1915 तक पश्चिमी मोर्चे पर लड़ाई में भाग लिया। उन्हें वीरता के लिए सम्मानित किया गया और 1916 में लेफ्टिनेंट कर्नल और 1918 में कर्नल के पद पर पदोन्नत किया गया। महाराज सज्जनसिंह के कार्यकाल में रतलाम ने खूब उन्नति की। देश को मिली आजादी के परिणाम स्वरूप 15 जून 1948 को रतलाम राज्य को भारतीय संघ में शामिल होने सम्बंधी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किये गए। उस समय रतलाम के 15 वें राजा लोकेंद्रसिंह बहादुर थे।
Hemant Bhatt