धर्म संस्कृति : बंगाली समाज का सार्वजनिक श्री दुर्गा पूजा महोत्सव शुरू, महा अष्टमी पर होगी संधि पूजा
5 दिवसीय पूजा में अष्टमी की संधि पूजा और विजयादशमी पर दर्पण विसर्जन और सिंदूर खेला बंगाली समाज की पूजा का विशेष आकर्षण होता है।
⚫ 52 साल से हो रहा है परंपरा का निर्वहन
⚫ जवाहर नगर स्थित श्री रामकृष्ण विवेकानंद आश्रम पर आयोजन
हरमुद्दा
रतलाम, 30 सितंबर। शहर में बंगाली समाज का 52 वां श्री दुर्गा महोत्सव सप्तमी से शुरू हुआ। दुर्गा अष्टमी 30 सितंबर मंगलवार को दोपहर में संधि पूजा का आयोजन किया जाएगा। श्रीरामकृष्ण विवेकानंद आश्रम जवाहन नगर में उत्सव मनाया जा रहा है।

समाज के विवेकानंद चौधरी ने बताया कि श्री दुर्गा पूजा का शुभारंभ 28 सितंबर को देवी बोधन एवं कल्पारंभ के साथ हुआ। आमंत्रण, अधिवास एवं घट स्थापना के पश्चात विधिवत दुर्गा पूजा उत्सव प्रारम्भ हो गई। नव दिवसीय नवरात्रि साधना की तुलना में बंगाली समाज की दुर्गा पूजा षष्टी तिथि से प्रारंभ होकर विजयदशमी तक पांच दिनों के लिए होती है।

संधि पूजा होगी मंगलवार दोपहर में
मंगलवार 30 सितंबर को दोपहर संधि पूजा की जाएगी। इस बार दोपहर 01:21 से दोपहर 02:09 तक की जाएगी। यह पूजा अष्टमी और नवमी तिथि के संधि काल के समय की जाती है इसलिए संधि पूजा के नाम से प्रसिद्ध है। इस पूजा में विशेष रूप से 108 दीपक और 108 कमल के फूलों से मां दुर्गा की पूजा की जाती है और यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है क्योंकि शक्तिस्वरूपा माँ ने चण्ड और मुण्ड नामक राक्षस का वध किया था। भगवान राम ने भी रावण को हराने के लिए माँ से शक्ति प्राप्ति के लिए इसी समय पूजा की थी।
बंगाली समाज के लिए गौरव का विषय
बंगाल में दुर्गा पूजा उत्सव बंगालियों के श्रद्धा समर्पण एवं गौरव का विषय होता है। हर बंगाली व्यक्ति इस बात के लिए अवश्य प्रयत्न करता है कि वह जहां भी रहे वहां उसकी इष्ट देवी मां दुर्गा की आराधना और उपासना का अवसर अवश्य मिले। दैवीय शक्ति की प्रतीक माँ दुर्गा के आसुरी शक्ति के प्रतीक महिषासुर पर विजय के रूप यह पूजा सनातन संस्कृति का संदेश देती है। भगवान श्रीराम द्वारा रावण पर विजय प्राप्त करने हेतु किया गया अकाल देवी बोधन इस पूजा को विशेष महत्व दर्शाता है। मात्र गिनती के परिवार होने के बावजूद भी रतलाम का बंगाली समाज, अपने इस परंपरागत गौरव एवं गरिमा को बनाए रखते हुए, निरंतर एवं निर्बाध श्रीसार्वजनिक दुर्गा पूजा का आयोजन करता आ रहा हैं। वर्ष 1974 में प्रारंभ हुई बंगाली समाज रतलाम की श्रीसार्वजनिक दुर्गा पूजा महोत्सव का इस वर्ष सफलतापूर्वक 52 वां वर्ष है।
मां दुर्गा आती है पांच दिवसीय मायका प्रवास पर
इस पूजा में यह माना जाता है कि कैलाशवासिनी देवी मां दुर्गा ससुराल से अपने मायके पांच दिवसीय प्रवास के लिए पधारी हैं, इसलिए उनके आगमन एवं प्रस्थान के समय समाज की महिलाएं विशेष रूप से पूजा अर्चना करती है। इस दौरान शंखध्वनि, ढाक और ढोल और "बोलो बोलो दुर्गा माइ की जय" के उद्घोष के साथ इस पूजा उत्सव का रूप ले लेती है। 5 दिवसीय पूजा में सुबह शाम आरती पूजा पुष्पांजलि का विशेष क्रम रहता है। अष्टमी की संधि पूजा और विजयादशमी पर दर्पण विसर्जन और सिंदूर खेला बंगाली समाज की पूजा का विशेष आकर्षण होता है। बंगाल की यह प्रसिद्ध एवं दर्शनीय पूजा को रतलाम में भी यथासंभव प्रस्तुत करने का प्रयास किया जाता है।
रतलाम शहर में है 20 से 25 परिवार बंगाली समाज के
रतलाम में बंगाली समाज के स्थायी निवासी परिवार मात्र 20 - 25 ही है लेकिन अस्थायी बंगालियों एवं माँ दुर्गा के आराधकों के साथ मिलकर पूरे उत्साह और उमंग के साथ पूजा का आयोजन किया जाता है। 1974 में कालिका माता मंदिर प्रांगण में प्रारम्भ हुई बंगाली समाज की दुर्गा पूजा, बाद में मोंटेसरी स्कूल प्रांगण तथा वर्तमान में श्रीरामकृष्ण विवेकानंद आश्रम जवाहन नगर में हो रही है।
बंगाल से आए कलाकार ने बनाई प्रतिमा, पुरोहित जी भी आए बाहर से

प्रतिकूल परिस्थितियों में भी बंगाली समाज के सदस्यों ने इस पूजा को निर्बाध जारी रखा है। बंगाल से आए मूर्तिकार द्वारा महिषासुर मर्दिनी माँ दुर्गा एवं उनके परिवार की आकर्षक प्रतिमा का निर्माण करवाया गया। जिसमें शक्तिस्वरूपा माँ दुर्गा, समृद्धी की देवी माँ लक्ष्मी, ज्ञान की देवी माँ सरस्वती, सदबुद्धि के देवता श्री गणेश तथा सार्थक शौर्य के प्रतीक श्री कार्तिकेय की प्रतिमा का निर्माण कर पूजा अर्चना की जाती है। वहीं पुरोहितजी को भी दुर्गा पूजा के लिए विशेष रूप से बाहर से आमंत्रित किया जाता है। आयोजक बंगाली समाज रतलाम ने रतलाम की धर्मप्रेमी जनता को शक्ति के आराधना पर्व पर माँ दुर्गा पूजा उत्सव हेतु आमंत्रित किया है।
केले के पौधे की पूजा होती है श्री गणेश जी की पत्नी के रूप में
बंगाली समाज की सप्तमी पूजा में मात्र कालरात्रि रूप शक्ति स्वरूपा माता ही नहीं अपितु केले के पौधे की भी भगवान गणेश की पत्नी के रूप में पूजा की जाती है। इसमें केले के पौधे के साथ बेल की लकड़ी, अपराजिता और अशोक की डाल और धान के गुच्छे को सजाकर उसे बंगाली साड़ी पहनाया जाती है। उसके बाद समाज की महिलाएं गाजे-बाजे के साथ केले रूपी गणेश बहू को स्नान कराते है। तत्पश्चात उसे गणेश जी के समीप रखा जाता है। बंगाली समाज की दुर्गा पूजा में इस केले के पौधे को गणेश की पत्नी का स्वरूप मानकर पूजा किया जाता है।
Hemant Bhatt