धर्म संस्कृति : जिसके बिना चले नहीं और जिसके बिना आत्मज्ञान हो, वह है व्यसन 

धर्म संस्कृति : जिसके बिना चले नहीं और जिसके बिना आत्मज्ञान हो, वह है व्यसन 

साध्वी श्री शाश्वतप्रियाश्रीजी म.सा. ने कहा

हरमुद्दा
रतलाम,16 जुलाई । जिसके बिना शांति का एहसास नहीं होता, जिसके बिना इस स्फूर्ति का एहसास नहीं होता, जिसके बिना फ्रेशनेस नहीं लगती है, जिसके बिना चले न, वह व्यसन ही होता है। मेंटली प्रिपेयर रहते हैं तो परिस्थितियां पीड़ा नहीं देती है। सिद्धि तप करने का जो ठान लेता है, उसे 45 दिन चाय सहित कोई व्यसन परेशान नहीं करता है।


उक्त उद्गार साध्वी श्री शाश्वतप्रियाश्रीजी म.सा. ने नीमवाला उपाश्रय में चल रहे प्रवचन में व्यक्त किए। साध्वीजी आदि ठाणा की निश्रा में यहां प्रतिदिन प्रवचन चल रहे है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रावक- श्राविकाएं उपस्थित हो रहे हैं। बुधवार को प्रवचन में साध्वीजी ने व्यसन को परिभाषित करते हुए कहा कि जिसके बिना तुमको चले नहीं, जिसके बिना तुम्हें आत्मज्ञान हो वह व्यसन के तौर पर गिना जाता है। जो आपकी बर्बादी का निमित्त बन जाए, जिसके बिना तुम शांति की सांस नहीं ले पाओ, एहसास नहीं कर पाओ वह व्यसन के तौर पर देखा जाता है। जिनशासन में सात व्यसन कहे गए है। जुआ जो पत्ते से खेला जाता है, लेकिन वर्तमान में शेयर बाजार भी जुआ ही है। इसके परिणाम पूरे परिवार को भुगतने पड़ते हैं। बिना पुरुषार्थ संपत्ति टिकती नहीं है।
उन्होंने कहा कि चाहे बेटा हो, चाहे बेटी हो, चाहे श्रावक हो, चाहे श्राविका हो सब कमाओ और सब पुरुषार्थ कर अपना खर्चा निकालो। शास्त्रकारों ने चोरी को भी व्यसन कहा है। इससे भी सबको बचना चाहिए।