विचार सरोकार : जीएसटी सुधारों के बीच उपभोक्ताओं पर बढ़ता बोझ, बाढ़, खाद्य संकट और क्लाइमेट चेंज की चुनौतियां
जीएसटी सुधार निश्चित रूप से एक कदम आगे हैं, लेकिन टेलीकॉम, एफएमसीजी, बाढ़-प्रभावित फसलें और क्लाइमेट चेंज की चुनौतियां उपभोक्ताओं की जेब पर असर डाल रही हैं। सरकार को विवादास्पद प्रयोगों पर वैश्विक सहमति बनानी चाहिए। अन्यथा, ये सुधार सिर्फ कागजी रह जाएंगे।
⚫ ब्रजेश कुमार त्रिवेदी
केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में घोषित जीएसटी सुधारों को 'जीएसटी 2.0' के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, जो आम आदमी को राहत देने का दावा करता है। 3-4 सितंबर को हुई 56वीं जीएसटी काउंसिल बैठक में 12% और 28% स्लैब को समाप्त कर मुख्य रूप से 5% और 18% स्लैब लागू किए गए, साथ ही 40% का नया 'डी-मेरिट' रेट सिन गुड्स के लिए पेश किया गया। ये बदलाव 22 सितंबर से प्रभावी होंगे और लगभग 400 वस्तुओं पर कर दरों में कमी आएगी। हालांकि, टेलीकॉम और एफएमसीजी सेक्टर में कीमतों की बढ़ोतरी और 'श्रिंकफ्लेशन' की समस्या से उपभोक्ताओं पर बोझ बढ़ रहा है, जो इन सुधारों के लाभ को कमजोर कर सकता है। इसके अलावा, पूरे भारत में बाढ़ और क्लाइमेट चेंज के कारण खाद्य वस्तुओं का संकट गहरा रहा है, जो कीमतों को और ऊंचा धकेल सकता है।

⚫ जीएसटी सुधार : राहत या सिर्फ दिखावा..?
जीएसटी काउंसिल ने आवश्यक वस्तुओं पर 5% 'मेरिट रेट' और अधिकांश अन्य पर 18% 'स्टैंडर्ड रेट' लागू किया है। इससे छोटी कारें, बस, ट्रक, फुटवियर, इलेक्ट्रॉनिक्स (जैसे टीवी, एसी, लैपटॉप) और घरेलू सामान 28% से 18% या उससे कम पर आ जाएंगे, जिससे कीमतें 10-15% तक घट सकती हैं। वहीं, तंबाकू, पान मसाला और लग्जरी कारों जैसे सिन गुड्स पर 40% रेट लगेगा। सरकार का अनुमान है कि इससे जीडीपी ग्रोथ 0.5-1% बढ़ सकती है, लेकिन राजस्व में ₹48,000 करोड़ का नुकसान होगा, जिसकी भरपाई बढ़ते उपभोग से की जाएगी। विशेषज्ञों का कहना है कि ये सुधार अमेरिकी टैरिफ के प्रभाव को बैलेंस करने के लिए हैं, लेकिन छोटे व्यवसायों पर अनुपालन का बोझ अभी भी बना हुआ है।
⚫ टेलीकॉम सेक्टर: कीमतों में लगातार बढ़ोतरी...
टेलीकॉम कंपनियां (जियो, एयरटेल, वोडाफोन आइडिया) 2025 के अंत तक 10-12% टैरिफ हाइक की तैयारी में हैं, खासकर मिड और हाई-पेइंग यूजर्स के लिए। 2024 में पहले ही 11-23% बढ़ोतरी हुई थी, और अब अक्टूबर 2025 से जनवरी 2026 तक अगला दौर संभावित है। उदाहरण के लिए, 2019 में 84 दिनों का रिचार्ज ₹299-₹598 में उपलब्ध था, जो अब ₹719-₹999 तक पहुंच गया है। कंपनियां 5G इंफ्रास्ट्रक्चर लागत और ARPU (औसत राजस्व प्रति यूजर) बढ़ाने का हवाला देती हैं, लेकिन TRAI की 'फोरबेयरेंस पॉलिसी' के तहत सरकार हस्तक्षेप नहीं कर रही। इससे टेलीकॉम राजस्व 12-14% बढ़ सकता है, लेकिन आम उपभोक्ता के लिए मोबाइल बिल्स महंगे हो रहे हैं।
⚫ एफएमसीजी सेक्टर में 'श्रिंकफ्लेशन' की मार और आज की कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना..
एफएमसीजी कंपनियां (जैसे ब्रिटानिया, पारले, आईटीसी) बढ़ती लागत (पाम ऑयल, गेहूं आदि में 3-5% वृद्धि) से निपटने के लिए 'श्रिंकफ्लेशन' का सहारा ले रही हैं—पैक साइज कम करना लेकिन कीमत वही रखना। 2025 में खाद्य वृद्धि 4.9% तक धीमी हो गई है, और उपभोक्ता छोटे पैक्स (₹5-₹10) की ओर शिफ्ट हो रहे हैं। उदाहरण: स्नैक्स पैक्स 90 ग्राम से 70 ग्राम हो गए, लेकिन कीमत ₹10 ही। ग्रामीण मांग बढ़ रही है (6% वृद्धि), लेकिन शहरी क्षेत्रों में स्लोडाउन है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2025 में एफएमसीजी ग्रोथ 14-15% तक पहुंच सकती है, लेकिन श्रिंकफ्लेशन जारी रहेगा यदि मुद्रास्फीति नियंत्रित नहीं हुई।
⚫ हालांकि, आज की तारीख (6 सितंबर 2025) में पूरे भारत में बाढ़ की आंधी ने स्थिति को और बिगाड़ दिया है। पंजाब, हरियाणा और उत्तर भारत में भारी वर्षा से सोयाबीन, मूंगफली, चावल और अन्य फसलें बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। पंजाब में 150,000 हेक्टेयर कृषि भूमि डूबी हुई है, जिससे बासमती चावल का उत्पादन 20-25% गिर सकता है। चावल की कीमतें ₹50 प्रति किलो से ऊपर जाने की संभावना है, क्योंकि बाढ़ ने फसल को नष्ट कर दिया। सोयाबीन उत्पादन 15% कम होने का अनुमान है, जिससे तेल की कमी और कीमतें बढ़ेंगी। मूंगफली और अन्य तिलहन भी प्रभावित हैं, जिससे खाद्य वस्तुओं का संकट गहरा रहा है। ये प्राकृतिक आपदाएं जीएसटी राहत के लाभ को निगल सकती हैं, क्योंकि उत्पादन लागत बढ़ने से एफएमसीजी कीमतें 10-20% ऊंची हो सकती हैं।
⚫ अंतरराष्ट्रीय आयात और क्लाइमेट चेंज का साया
अमेरिका दूध उत्पादों के निर्यात पर जोर दे रहा है, लेकिन भारत पाम ऑयल की मांग कर रहा है, जो मुख्य रूप से इंडोनेशिया और मलेशिया से आता है (2025 में भारत का आयात $8.7 बिलियन)। अमेरिकी दूध आयात बढ़ाने की सलाह दी जा रही है, लेकिन पाम ऑयल की कमी से खाना पकाने के तेल की कीमतें प्रभावित होंगी। दूसरी ओर, क्लाइमेट चेंज के नाम पर 'सोलर जियोइंजीनियरिंग' (सूर्य की किरणों को प्रतिबिंबित करने वाली तकनीक) पर बहस तेज हो रही है। बिल गेट्स द्वारा फंडेड हार्वर्ड का SCoPEx प्रोजेक्ट 2025 में अमेरिका में ट्रायल कर रहा है, जहां स्ट्रेटोस्फियर में सल्फर डाइऑक्साइड या कैल्शियम कार्बोनेट छिड़ककर तापमान कम करने की कोशिश हो रही है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि ये प्रयोग मौसम पैटर्न बदल सकते हैं, जिससे बाढ़ जैसी आपदाएं बढ़ेंगी। 2025 में यूएस और यूके में फील्ड ट्रायल्स शुरू हो चुके हैं, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि ये 'जोखिम भरी दवा' हैं, जो उत्सर्जन कम करने के बजाय नई समस्याएं पैदा कर सकती हैं।
⚫ निष्कर्ष : सरकार को सख्त कदम उठाने की जरूरत
जीएसटी सुधार निश्चित रूप से एक कदम आगे हैं, लेकिन टेलीकॉम, एफएमसीजी, बाढ़-प्रभावित फसलें और क्लाइमेट चेंज की चुनौतियां उपभोक्ताओं की जेब पर असर डाल रही हैं। सरकार को TRAI, उपभोक्ता संरक्षण कानूनों और कृषि सहायता के माध्यम से हस्तक्षेप करना चाहिए, साथ ही जियोइंजीनियरिंग जैसे विवादास्पद प्रयोगों पर वैश्विक सहमति बनानी चाहिए। अन्यथा, ये सुधार सिर्फ कागजी रह जाएंगे।

⚫ ब्रजेश कुमार त्रिवेदी
Hemant Bhatt