मेरी नजर से : ...पर मेरी मिट्टी पर कोई पराया झंडा नहीं फहरेगा”
रानी अब्बक्का का अडिग आत्मबल, उनके विचारों की दृढ़ता और स्वाधीनता के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता दर्शकों को भीतर तक झकझोर देती है।
⚫ नाटक “रानी अब्बक्का – ट्रिब्यूट टू द फियरलेस क्वीन” का मंचन
⚫ ऋतेश पंवार
“उल्लाल की धरती पर जन्मी हूँ,
यहाँ झुकना नहीं—लड़ना सिखाया जाता है।
यदि मेरे प्राण जाएँ, तो जाएँ,
पर मेरी मिट्टी पर कोई पराया झंडा नहीं फहरेगा।”
यह ललकार मालवा मीडिया फेस्ट में गूँजी, जब जयपुर के नाट्य समूह “युवतरंग संस्कृत थिएटर” द्वारा प्रस्तुत नाटक “रानी अब्बक्का – ट्रिब्यूट टू द फियरलेस क्वीन” का मंचन हुआ।
दीपक भारद्वाज द्वारा लिखित एवं निर्देशित इस नाटक में ऐतिहासिक तथ्यों और रंगमंचीय प्रस्तुति के बीच संतुलन साधने का सफल प्रयास दिखाई देता है। संवादों में ओज और भावनात्मक गहराई स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। विशेष रूप से कारागार का दृश्य अत्यंत प्रभावशाली रहा, जहाँ रानी अब्बक्का का अडिग आत्मबल, उनके विचारों की दृढ़ता और स्वाधीनता के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता दर्शकों को भीतर तक झकझोर देती है।

यह दृश्य नाटक का भावनात्मक उत्कर्ष कहा जा सकता है। वहीं रानी अब्बक्का और उनके पति लक्ष्मप्पा अरसा के मध्य संवाद दृश्य दर्शकों को गहराई से प्रभावित करता है। इस दृश्य में व्यक्तिगत संबंधों, राजनीतिक दबावों और राष्ट्रधर्म के बीच के द्वंद्व को अत्यंत सूक्ष्मता और संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया गया है। कलाकारों का संयमित एवं सधा हुआ अभिनय इस दृश्य को विशेष रूप से प्रभावशाली बनाता है।

इस ऐतिहासिक नाटक में रानी अब्बक्का के अदम्य साहस और संघर्ष को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया गया, जो इतिहास के पृष्ठों से उठकर मंच पर साकार होता प्रतीत हुआ। यह प्रस्तुति केवल एक ऐतिहासिक आख्यान नहीं रही, बल्कि रंगमंच के माध्यम से उन स्वर्णिम पन्नों को पुनर्जीवित करने का सशक्त प्रयास सिद्ध हुई, जिनमें साहस, स्वाभिमान और नारी नेतृत्व की अमिट छाप अंकित है। जयपुर के इस नाट्य समूह द्वारा प्रस्तुत यह नाटक उल्लाल की वीर रानी अब्बक्का के संघर्षपूर्ण जीवन और विदेशी आक्रांताओं के विरुद्ध उनके निर्भीक प्रतिरोध को केंद्र में रखता है।

मंच सज्जा, वेशभूषा एवं प्रकाश संयोजन ने ऐतिहासिक वातावरण रचने में सार्थक भूमिका निभाई। पार्श्व संगीत के साथ एल.ई.डी. स्क्रीन पर दृश्यों का संयोजन नाट्य प्रवाह को बाधित किए बिना दृश्यात्मक गंभीरता और भावनात्मक प्रभाव को और अधिक सशक्त बनाता है। समूह अभिनय में मंचीय अनुशासन और सामूहिक ऊर्जा स्पष्ट दिखाई दी, जिसने प्रस्तुति को विश्वसनीयता प्रदान की।
नाट्य मंचन के अवसर पर शहर के वरिष्ठ रंगकर्मियों की गरिमामयी उपस्थिति जिनमें कैलाश व्यास, प्रो. रतन चौहान तथा ओमप्रकाश मिश्र जैसी विभूतियाँ सम्मिलित रही। इन्होंने आयोजन को विशेष महत्व प्रदान किया। खुले वातावरण में सर्दी की ठिठुरन तथा मंचन के दौरान माइक से जुड़ी कुछ तकनीकी सीमाओं के कारण दर्शक-दीर्घा में हल्की-सी असहजता अवश्य दिखाई दी, किंतु इसका प्रभाव मंच पर प्रस्तुत सशक्त अभिनय और प्रभावी संवाद शैली पर नहीं पड़ा।

अंततः यह कहा जा सकता है कि “रानी अब्बक्का – ट्रिब्यूट टू द फियरलेस क्वीन” रतलाम में लंबे अंतराल के बाद देखने को मिली एक ऐसी सुखद और सार्थक रंगानुभूति रही, जिसने दर्शकों को केवल मनोरंजन ही नहीं दिया, बल्कि इतिहास, स्वाभिमान और साहस पर चिंतन के लिए भी प्रेरित किया। यह मंचन सिद्ध करता है कि यदि प्रस्तुति में शोध, संवेदना और प्रतिबद्धता हो, तो सीमित संसाधनों के बावजूद भी रंगमंच प्रभावशाली और स्मरणीय बन सकता है।
⚫ प्रस्तुति : ऋतेश पंवार
Hemant Bhatt