विचार सरोकार : आंखें केवल दृश्य नहीं देखतीं, वे पढ़ती लेती है भावनाएं
जो लोग सब जानकर भी चुप रहते हैं, वे भीतर से बेहद मजबूत होते हैं। उनकी चुप्पी में एक गूंज होती है-जो सीधे दिल तक पहुंचती है। यह लेख उन सभी संवेदनशील आत्माओं को समर्पित है जो हर बात समझने की कला रखते हैं, लेकिन हर बार उसे शब्दों में नहीं ढालते।
⚫ त्रिभुवनेश भारद्वाज
कुछ लोग ऐसे होते हैं जो किसी भी कमरे में प्रवेश करते ही उसकी ऊर्जा को पढ़ लेते हैं। चेहरे की मुस्कानें उन्हें पूरी सच्चाई नहीं बता सकतीं, लेकिन एक उठी हुई भौंह, थोड़ी देर की चुप्पी, या एक बदली हुई नजर की दिशा उनके लिए बहुत कुछ कह जाती है। इन लोगों की आंखें केवल दृश्य नहीं देखतीं, वे भावनाएं पढ़ती हैं।उनकी संवेदनशीलता सतही नहीं होती, बल्कि भीतर तक समाई होती है। और यह सजगता, यह हर बात को महसूस कर लेने की ताकत, अक्सर उन्हें अकेला कर देती है।

ऐसे व्यक्ति समाज में प्रायः शांत माने जाते हैं। वे हर समय कुछ बोलते नहीं, हर विषय में हस्तक्षेप नहीं करते, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि वे अनजान हैं। उनके भीतर एक निरंतर मंथन चलता रहता है। हर छोटी-बड़ी बात, हर व्यवहार, हर शब्द को वे भीतर सहेजते जाते हैं। वे प्रश्न करते हैं, उत्तर तलाशते हैं, पर यह सब भीतर ही भीतर चलता है। उनके बाहर की दुनिया शांत होती है, लेकिन उनके भीतर भावनाओं की एक गहराई होती है। और कई बार वह गहराई एक महासागर जैसी बन जाती है, जो केवल स्वयं उन्हें ही दिखाई देता है।
चुप्पी उनके लिए एक ढाल होती है- एक सुरक्षा कवच। यह वह माध्यम होता है जिससे वे अनावश्यक संघर्षों से खुद को बचाते हैं। यह चुप रहना कमजोरी नहीं होता, बल्कि यह एक निर्णय होता है। वे जानते हैं कि हर बात को कहना आवश्यक नहीं, और हर सच को सामने लाना भी कभी-कभी रिश्तों के लिए नुकसानदायक हो सकता है। वे मौन रहते हैं क्योंकि उन्होंने देख लिया है कि बोलना हर बार समाधान नहीं लाता-कई बार वह और अधिक जटिलताएं खड़ी कर देता है।
लेकिन इस मौन का एक पक्ष और भी है-वह है मन का बोझ। जब व्यक्ति बहुत कुछ समझता है और फिर भी प्रतिक्रिया नहीं देता, तब वह भावना भीतर जड़ें जमा लेती है। यह भावना धीरे-धीरे व्यक्ति के आत्मविश्वास, उसकी सहजता और उसकी मानसिक शांति को प्रभावित करने लगती है। सजगता का यह वरदान तब एक बोझ में बदलने लगता है, जब व्यक्ति के भीतर कई अनकही बातें जमा होने लगती हैं। ऐसे लोग अक्सर खुद को “बहुत सोचने वाला”, “बहुत महसूस करने वाला” या “कहीं ज़्यादा समझदार” मानते हैं- और यही समझ उन्हें सबसे ज़्यादा भीतर से तोड़ती है।
मनोविज्ञान इस स्थिति को “अति-जागरूकता” कहता है। यह वह अवस्था होती है जिसमें व्यक्ति अपने आसपास की हर हलचल को अत्यधिक गंभीरता से लेता है। वह जो महसूस करता है, वह सतही नहीं होता-और इसलिए उसे झटक पाना या भूल पाना उसके लिए कठिन हो जाता है। वे क्षण जिन्हें दूसरे लोग सामान्य मानकर आगे बढ़ जाते हैं, वही क्षण ऐसे व्यक्तियों के लिए आत्मचिंतन का विषय बन जाते हैं।
परंतु इन सबके बावजूद, इस सजग मौन में एक गरिमा होती है। यह दर्शाता है कि व्यक्ति में संयम है, समझ है, और यह विवेक भी कि कब क्या कहना है। यह मौन केवल संवाद की अनुपस्थिति नहीं, यह एक गूढ़ संवाद है-स्वयं से, परिस्थितियों से, और कभी-कभी उन लोगों से भी जिनसे कुछ कहने की कोई आशा नहीं बचती।
जो लोग सब जानकर भी चुप रहते हैं, वे भीतर से बेहद मजबूत होते हैं। उनकी चुप्पी में एक गूंज होती है-जो सीधे दिल तक पहुंचती है। यह लेख उन सभी संवेदनशील आत्माओं को समर्पित है जो हर बात समझने की कला रखते हैं, लेकिन हर बार उसे शब्दों में नहीं ढालते। जो मौन रहते हैं, पर अंदर से हर बात दर्ज रखते हैं। जिनकी आंखें देखती हैं-और दिल सब महसूस करता है।

Hemant Bhatt