आज का दिन रियासतकालीन रतलाम के प्रथम राज्य के अंत का दिन
रतलाम के इतिहास में एक काला दिन साबित हुआ। इसी दिन रतलाम के प्रथम राज्य का अंत हो गया था। इसलिए रियासतकाल में आज का दिन रतलाम के प्रथम राज्य के लिए अशुभकारी और दुर्भाग्यपूर्ण रहा।
⚫ नरेंद्र सिंह पंवार, इतिहासविद
भारतीय तिथि त्यौहार के मान से तो आज का दिन "बछ बारस" बहुत ही पवित्र माना गया है। भगवान श्रीकृष्ण को गाय और बछड़े से बहुत प्रेम था। इस कारण से इस दिन गाय और बछड़े की पूजा की जाती है। लेकिन रतलाम के इतिहास में आज का दिन बहुत ही दुःखद और दुर्भाग्यपूर्ण रहा है। यह दिन क्यों दुःखद और दुर्भाग्यपूर्ण रहा, पढ़िए इतिहासविद नरेन्द्रसिंह पॅंवार (गढ़ी भैंसोला) के इस लेख में।

आज का दिन वैसे तो गाय और बछड़े के पूजने का दिन है। इस दिन महिलाएं गाय और बछड़े की पूजा करती है और घर में मक्का की रोटी बनाई जाती है । लेकिन यह दिन रतलाम के इतिहास में एक काला दिन साबित हुआ। इसी दिन रतलाम के प्रथम राज्य का अंत हो गया था। इसलिए रियासतकाल में आज का दिन रतलाम के प्रथम राज्य के लिए अशुभकारी और दुर्भाग्यपूर्ण रहा।

घटना इस प्रकार है, राजा शिवसिंह की निःसंतान मृत्यु के बाद रतलाम राज्य की बागडोर संभालने वाले केशवदासजी का जन्म 1674 ई. में हुआ था। जिस समय शिवसिंहजी की मृत्यु हुई उस समय केशवदासजी की उम्र केवल 16 वर्ष की थी और उस समय भी वे भी दक्षिण के युद्ध क्षेत्र में ही व्यस्त थे। ऐसी स्थिति में केशवदासजी का वहीं पर राजतिलक हुआ। केशवदासजी बचपन से ही वीर, साहसी और स्वतंत्र प्रवृत्ति के थे। वे स्वतंत्र रुप से जीविकोपार्जन के लिए पिता रतनसिंहजी की मृत्यु के बाद 9-10 वर्ष की उम्र में रतलाम से प्रस्थान कर गए थे। रतलाम की राज्यगद्दी संभालने के बाद केशवदासजी को रतलाम आने का अवसर ही प्राप्त नहीं हुआ। वे अपने राज्य से दूर दक्षिण में ही युद्ध में व्यस्त रहे। परिणामतः पहले से ही जर्जर व्यवस्था और अधिक भयावह होती गई। इस समय भी राज्य की व्यवस्था संचौरा चौहान पृथ्वीराज के जिम्में थी। ऐसी स्थिति में भी हिन्दू राजाओं को भारीभरकम 'कर' शाही दरबार में चुकाना पड़ता था, उन्हें किसी भी प्रकार की रियायत नहीं प्रदान की जाती थी। ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों में आर्थिक रूप से जर्जर रतलाम राज्य के लिए किसी भी प्रकार से कर चुकाना असंभव था, फिर भी सन् 1694 ई. में जजिया कर वसूलने के लिए शाही दरबार की ओर से अमीन नसिरुद्दीन पठान रतलाम आया, यह किसी भी स्थिति में 'कर' लिए बिना टलने वाला नहीं था। वह तीन दिन तक लगातार प्रयास करने के बाद भी 'कर' वसूलने में कामयाब नहीं हुआ तो खीजकर उसने चौथे दिन पानी भरने जा रही राजघराने की दासियों के पानी के घड़े छिनवाकर मंगवा लिए। जब दासियों ने जाकर इस घटना का वर्णन रानियों के समक्ष किया तो रानियों ने पृथ्वीराज चौहान और सांचौरा मानसिंह के ज्येष्ठ पुत्र सुलतानसिंह जो कि उस समय राज्य व्यवस्था देख रहे थे, को उचित प्रबंध करने के लिए कहा। ये दोनों राजपूत योद्धा इस अमानवीय हरकत के कारण क्रोध से उबल पड़े और अपने राजपूत साथियों को साथ लेकर उस चल दिए जहां अमीन नसिरुद्दीन था। अमीन नसिरुद्दीन महल के दरवाजे के समीप ही था,जैसे ही वह घोड़े पर बैठकर जाने ही वाला था, पृथ्वीराज ने लपककर तलवार से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। नसिरुद्दीन का सिर यहीं गिर गया किंतु धड़ आगे जाकर कुछ दूरी पर गिरा, जहाँ बाद में कब्रें बनवा दी गई थी। नसिरुद्दीन के कुछ साथी भी यहीं मारे गए थे और कुछ जान बचाकर भाग खड़े हुए थे।
जिस समय यह घटना घटी तब केशवदास अपने सैनिकों के साथ शाही दरबार में ही थे। औरंगजेब उस समय बीजापुर से कोई 32 मिल दक्षिण-पश्चिम में कृष्णा नदी के किनारे गलगला नामक स्थान पर डेरा डाले हुआ था। इस समय औरंगजेब, केशवदास से प्रसन्न था, संभवतः मानवृद्धि करने की सोच भी रहा था। इसलिए 18 जून 1664 ई. को उसने केशवदासजी के मनसब का संपूर्ण ब्यौरा मांगा था। लेकिन हाय रे दुर्भाग्य इस बार फिर केशवदास भाग्य से हार गया, दूसरे ही दिन औरंगजेब को अमीन जजिया नसीरुद्दीन के मारे जाने का समाचार प्राप्त हुआ। औरंगजेब इस प्रकार के कृत्य को सुनकर आगबबूला हो गया। उसने तत्काल ही केशवदासजी को रतलाम राज्य की जागीर से अलग कर दिया तथा अपने पुत्र शाहजादा आजम ( मालवा का सुबेदार भी था ) को रतलाम परगना सौंप दिया, ताकि वह रतलाम जाकर सबक सीखा सके।
इस घटना से जहाँ केशवदास को अपने राज्य से हाथ धोना पड़ा, वहीं उनके मनसब में भी अत्यधिक कटौती कर दी गई, फिर भी मजबूरी या विवशता के चलते उन्होंने किसी प्रकार का प्रतिकार न कर चुपचाप नियति के खेल देखते रहे। औरंगजेब ने उन्हें शाही सैनिकों के साथ गलगला से वांडीवाश की ओर रवाना कर दिया। रतलाम राज्य की जब्ती की सूचना जब अगस्त 1694 ई. में रतलाम पहुँची तो संपूर्ण राज्य में शोक की लहर दौड़ गई। किसी को भी यह अंदेशा नहीं था कि क्षणिक आवेश का इतना गंभीर परिणाम भुगतना पडेगा। बताया जाता है कि इस सूचना के उपरांत वे सभी संगी-साथी जो वीर रतनसिंह के साथ जालौर से रतलाम आए थे, राज्य परिवार के साथ ही रतलाम छोड़ने की तैयारी करने लगे।
इसी दौरान 14-15 अगस्त 1694 ई. को शाहजादा आजम के कर्मचारी रतलाम पर कब्जा करने के लिए आ गए। वे राज परिवार पर शीघ्रातिशीघ्र रतलाम छोड़ने के लिए हर प्रकार से दबाव बनाने लगे। अचानक आई स्थिति से सभी विचलित हो गए, आखिर जाऐं तो कहाँ जाएं ? इसी सोच-विचार में तीन-चार दिन बीत गए। 18 अगस्त 1694के दिन भाद्रपद कृष्ण 12 थी। इस तिथि को वत्स पूजा की जाती है। प्रातः काल की शुभवेला में राज्य परिवार की स्त्रियां, गाय और बछड़ों की पूजा के लिए तैयार हो रही थी, कि आजम के कर्मचारियों को इतना भी धैर्य नहीं था कि वे रानियों को पूजा भी करने दे। अपनी धर्मान्धता और सता के नशे में चूर कर्मचारियों ने रानियों को महल से निकालना प्रारंभ कर दिया पूजा की शुभ बेला उनके लिए विदाई की घड़ियां बन गई।
सोलह श्रृंगार से सुसज्जित रानियां अपने प्रियतम से हजारों मिल दूर बेबस और लाचार महलों को छोड़कर संगी- साथियों के साथ अनजानी राहों पर निकल पड़ी। किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि जिस रतलाम राज्य की नींव वीर रतनसिहजी ने 1652 में डाली थी, उसका अंत इतनी जल्दी केव 38 वर्ष उपरांत इस दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से हो जाएगा किंतु होनी और अनहोनी विधाता के हाथ में होती है। केशवदासजी से रतलाम का परगना छिनने के बाद सात आठ वर्षों तक यह खालसा ही रहा। रतलाम के राजमहलों को त्यागकर केशवदासजी की रानियां, संगी-साथी, इधर उधर भटकते रहे, वे निश्चित नहीं कर पा रहे थे कि कहाँ ठौर-ठिकाना पाया जाए ? अन्ततः 14 जनवरी 1696 ई. को राजपरिवार सीतामऊ पहुँच गया। जहाँ पूर्व से ही वेशवदासजी के काका करणसिंह और तेजसिंह की जागीर थी।
दूसरी और केशवदास के भाग्य ने पुनः पलटा खाया। उसने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी धैर्य नहीं खोया और लगातार शाही सेना में रहकर अपने कर्तव्य को निभाता रहा। एक बार पुनः केशवदासजी का मनसब बढ़ा दिया गया। मनसब के अनुरुप उन्हें नई जागीर प्रदान की गई जो कि धार राज्य के अंतर्गत बगड़ी और वाकली गांव तथा मंदसौर के अंतर्गत नाहरगढ़ थी। इस नवीन व्यवस्था को चलाने के लिए केशवदासजी ने व्यास प्रतापसिंह की अपना प्रधानमंत्री नियुक्त किया। नाहरगढ़ का परगना प्राप्त हो जाने के बाद भी केशवदासजी का परिवार सीतामऊ में ही बना रहा। कहते है परिस्थितियों वीर पुरुष को आजमाती है। ऐसी परिस्थितियों में केशवदासजी राजा से एक मामूली मनसबदार बन गए थे, लेकिन फिर भी धैर्य नहीं खोया और लगातार कर्म करते रहे। सन् 1696 में केशवदासजी के भाग्य का सितारा पुनः बुलंदी पर था । 3 सितंबर 1996 को प्राप्त किया।
किशनगढ़ राज्य के शासक मानसिंह राठौड़ के माध्य ने केशदासजी के माध्यम से औरंगजेब तक मनसब में वृद्धि हेतु अर्जी पहुंचाई । मानसिंह राठौड़ की सिफारिश पर औरंगजेब ने केशवदासजी का मनसब में वृद्धि कर दी, अब केशवदासजी का मनसब 'पाँच सदी जात और चार सौ सवारों का हो गया। मनसब बढ़ने पर जागीर में भी वृद्धि हुई जिसके तहत उन्हें सीतामऊ जागीर में मिला।
अपनी नयी जागीर की शासन व्यवस्था और प्रबंध को संचालन करने में केशवदासजी ने अत्यधिक बुद्धिमानी से काम लिया । अपने वतन से हजारों मिल दूर होने पर भी प्रधानमंत्री प्रतापसिंह व्यास को आवश्यक दिशा-निर्देश देते रहते थे। जागीर के प्रबंध कार्य में कुशालसिंह राठौड और मेहता हीराचंद का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। बाल्यकाल से गृह त्यागना अपने वतन हजारों मील दूर रहते हुए राजा से रंक बनना एक साधारण व्यक्ति को के तोड़ सकता है, किंतु केशवदासजी ने तब भी हिम्मत नहीं हारी औ अपने पराक्रम से औरंगजेब जैसे कट्टरपंथी को भी झुकने पर मजबूर कर दिया।
शूरवीरों को सरलता से कुछ भी नहीं रतलाम का जो राज्य उन्हें वंशानुगत प्राप्त हुआ था उसने एक दिन भी उन्होंने व्यतीत नहीं किया था। केशवदासजी ने सीतामऊ को नवीन राज्य का दर्जा दिलवाया और सीतामऊ राज्य के प्रथम शासक होने गौरव दिलाया।

Hemant Bhatt