विचार सरोकर : अनूठी धरोहर, बैंड स्टेंड गुलाब चक्कर का रोचक इतिहास

राजा ने अपनी प्रिय बेटी गुलाब कुंवर को समर्पित करते हुए इसका नाम "गुलाब चक्कर" रखा। यहां जो आता मंत्रमुग्ध हो जाता। महकदार गुलाबों की कई किस्में और अंगूर, चमेली की बेलें आच्छादित थी। रंग बिरंगी चिड़ियाओं का छोटा चिड़िया घर था। हरियाली और जगमग केंडिल रोशनी के साथ शाम को रियासत कालीन बैंड की धुन 100 मीटर के दायरे में फैले बाग में गूंजती तो लोग झूम उठते।

विचार सरोकर : अनूठी धरोहर, बैंड स्टेंड गुलाब चक्कर का रोचक इतिहास

डॉ. प्रदीपसिंह राव, वरिष्ठ इतिहासकार

रतलाम में ऐतिहासिक धरोहरों की कमी नहीं है लेकिन अनेक पुरातात्विक स्थानों, वस्तुओं की किसी ने सुध न ली और उचित संरक्षण के अभाव में ये नायाब विरासतें काल के गाल में समाती जा रही हैं। 

रतलाम का सिटी हार्ट, गुलाब चक्कर 146 वर्ष पहले महाराजा रणजीत सिंह (1861-1893) ने 1879 में मुंशी शाहमत अली (1864-80) के कार्यकाल में बना था। राजा ने अपनी प्रिय बेटी गुलाब कुंवर को समर्पित करते हुए इसका नाम "गुलाब चक्कर" रखा। यहां जो आता मंत्रमुग्ध हो जाता। महकदार गुलाबों की कई किस्में और अंगूर, चमेली की बेलें आच्छादित थी। रंग बिरंगी चिड़ियाओं का छोटा चिड़िया घर था। हरियाली और जगमग केंडिल रोशनी के साथ शाम को रियासत कालीन बैंड की धुन 100 मीटर के दायरे में फैले बाग में गूंजती तो लोग झूम उठते।

बैंड की धुन पर खेलते थे टेनिस

उधर राजा हरबर्ट विलास रामबाग के कोर्ट में टेनिस भी दरबारी बैंड की धुन पर खेलते थे, क्या वैभव था। बैंड स्टैंड के नाम से भी यह प्रसिद्ध था। गुलाब चक्कर परिसर में जिले की झर, रिंगनोद व राजपुरा की खुदाई से निकली छठवीं और 11वीं शताब्दी की अर्वाचीन प्रतिमाएं शोभा बढ़ाती थीं।इटेलियन स्टाइल का गुंबद इसका प्रमुख सौंदर्य है। 

बदलते रहे और बढ़ती रही कलेक्टरों की रुचि

कई सालों तक यह धरोहर अपेक्षित रही। कलेक्टर परिसर में होते हुए, कबाड़ खाना बनी रही। सबसे पहले 2005 में तत्कालीन कलेक्टर दीप्ति गौड़ मुखर्जी ने एक स्टोर रूम में बंद नीचे पड़ी मूर्तियों को प्लेटफॉर्म पर लगवाया। फिर 2016 में कलेक्टर बी चंद्रशेखर ने कायाकल्प कर आम जनता के लिए खुलवाया।

आगे 2021से निरंतर रख-रखाव चलता आया, लेकिन इसके प्राचीन वैभव को  लौटाने में कलेक्टर राजेश बाथम की अहम भूमिका रही है जिन्होंने जिला पुरातत्व, पर्यटन संस्कृति  मध्य प्रदेश शासन और जन सहयोग से इस समृद्ध विरासत को पुनर्जीवन दिया। अब यहां सु मधुर संगीत सभाएं, तराने, गीत ग़ज़ल, गूंज रहे हैं। सांस्कृतिक गोष्ठियां हो रही हैं।

पहलवान की छाती से गिरा जब भारी पत्थर...

खेलों के शौकीन राजा सज्जन सिंह ने 29 अक्टूबर 1900 को पंजाब के प्रसिद्ध पहलवान गुलाम मोहम्मद को बुलवाया जो छाती पर साढ़े चार क्विंटल वजन का गोल पत्थर रख कर रंजीत विलास पैलेस से गुलाब चक्कर, राम बाग तक पैदल चलने का प्रदर्शन कर रहे थे।लेकिन श्री कालिका माता मंदिर के मुख्य द्वार के कुछ पहले ही वो गोल पत्थर उनकी छाती से गिर गया। कई वर्षों तक वह पत्थर वही पड़ा रहा। बाद में उसे क्रेन से गुलाब चक्कर मे रखवाया गया। जो आज भी वहां रखा है।           यह सिर्फ नगर की धरोहर, पुरातात्विक वस्तुओं इमारतों के रख रखाव का मामला नहीं। किसी शायर ने ठीक ही लिखा है, 

"दीवार क्या गिरी मेरे मकान की, लोगों ने रास्ता ही बना लिया,
वो काबिले एहतराम हैं जिन्होंने गिरती दीवार को जज्बात से खड़ा कर दिया।

"हमें अभी नगर की और भी गौरव शाली इमारतों, बेजोड़ वस्तुओं की रक्षा का संकल्प लेना होगा। (क्रमशः)