शख्सियत : मनुष्य की चेतना की गति अनुगामी होती है

शख्सियत : मनुष्य की चेतना की गति अनुगामी होती है

साहित्यकार रुचि बहुगुणा उनियाल का कहना

⚫ नरेंद्र गौड़

’मनुष्य का सर्वोपरि गुण है कि वह कभी हारता नहीं है। कठिन से कठिन समय में उसकी मेधा उसे रास्ता दिखाती है। मनुष्य की चेतना का अब तक का विकास द्वंदों के कारण हुआ है। वाल्मीकि के अंतर में उठे ज्वार-भाटे ने रामायण को जन्म दिया। महाभारत के सबसे कठिन मोड़ पर जबर्दस्त उहापोह की स्थिति में गीता का दर्शन जन्मा। यह चेतना की अनुगामी गति है जिसका चक्र कभी पीछे नहीं घूमता।’


यह बात हिंदी की प्रतिष्ठित रचनाकार रुचि बहुगुणा उनियाल ने कही। इनका मानना है कि किसी भी दर्शन के लक्षण सर्वप्रथम उस समाज के साहित्य और कला में प्रकट होते हैं। हर दौर की कविता एक बार ठहरकर अपनी सार्थकता और प्रासंगिकता पर नए सिरे से विचार करती हैै और फिर अपने रंग-रूप तथा काव्य तेवर में समयानुकूल परिवर्तन कर आगे बढ़ती है। अंग्रेज़ी कविता में तो हर दशक के बाद कविता की जरूरत पर गंभीरता से विचार हुआ है।

कविता में साहित्य की अन्य विधाओं के तत्व

रुचि जी ने एक सवाल के जवाब में कहा कि साहित्य की अन्य विधाओं के तत्व भी कविता में समाहित हो जाते हैं। नई कविता का उत्स हम निराला की कविता से देख सकते हैं। निराला को आधुनिक नई कविता का जनक माना जाता है। निराला जैसे-जैसे नई कविता की ओर, कविता की मुक्ति की ओर बढ़ रहे थे, वैसे-वैसे ही वे छायावाद की प्रचलित शैली से भिन्न होते जा रहे थे। उनकी कविता में हम साहित्य की अन्य विधाओं के तत्वों का समावेश भी देख सकते हैं।

बचपन से रहा साहित्य के प्रति अनुराग

एक सवाल के जवाब में रुचि जी का कहना था कि बहुत छुटपन से उनका साहित्य के प्रति अनुराग रहा जो शनैः-शनैः बढ़ता चला गया। प्रत्येक रचनाकार अपने समकालीन साहित्य और पूर्वज रचनाकारों को पढ़कर प्रभावित होता है, किंतु वह अपने अनुभव संसार से रचनाओं में क्या नवोन्मेष करता है, यह बात ही उसे भीड़ से अलग करती है। वहीं रचनाकार के लिए किसी रचना को जन्म देना ठीक ऐसा ही सुख-पीड़ा को सहन करना होता है जैसे किसी स्त्री के लिए माँ बनना।

अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित

देहरादून उत्तराखंड में जन्मी रुचि बहुगुणा ने अंग्रेजी साहित्य तथा समाजशास्त्र में एमए किया है। इनके दो कविता संग्रह प्रकाशित हैं, पहला ’मन को ठौर’ बोधि प्रकाशन, जयपुर से  और दूसरा संकलन ’आखर की बात’ प्रेम कविताओं को लेकर है, जिसे वर्ष 2022 में  न्यू  वल्र्ड पब्लिकेशन दिल्ली ने छापा है। इसके अलावा ’प्रेम तुम रहना’, प्रेम कविताओं का साझा संकलन छपा है। इनकी रचनाएँ प्रतिष्ठित पत्रिका ‘पाखी’, ’परिंदे’, ’युगवाणी’, ’आदिज्ञान’- ’स्त्री लेखा’, ’कविकुम्भ’ आदि में प्रकाशित होती रही हैं। इनकी अनेक कविताओं के अनुवाद मलयालम, उडिया, पंजाबी, मराठी, बांग्ला, संस्कृत सहित अनेक भारतीय भाषाओं में हो चुके हैं। भारतीय कविता कोश व प्रतिष्ठित वेव पत्रिका हिंदवी, स्त्री दर्पण, जानकीपुल, समकालीन जनमत, अविसद के साथ ही पहली बार ब्लाॅग स्पाॅट पर रचनाएं प्रकाशित हैं। इनकी संस्मरणात्मक गद्य की पुस्तक ’छुंईं की कुट्यारी’ जल्द ही प्रकाशित हो रही है।

रुचि बहुगुणा उनियाल की कविताएँ 


ओस की बूँद

मैं बस एक ओस की बूँद
तुम प्राची की प्रत्यंचा 
खींचते भास्कर
भले ही वाष्पित हो जाऊँ 
तुम्हारे छूते ही
पर मिलना अवश्य
तुम्हारे स्पर्श से मैं 
आलोकित हो उठती हूँ!

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रचनात्मक पीड़ाएँ 

वो पीड़ाएं सुख से ऊपर उठ गईं
जिनमें रचनात्मकता का जन्म हुआ
वो पीड़ाएं अधिक 
सुखकर रहीं सुख से
जिनमें मनुष्य ने 
किसी को संभाला
पीड़ाओं ने बताया कि
मनुष्य होना अब भी 
पशुत्व से ऊपर है
जब एक इंसान ने 
दूसरे इंसान की
पीड़ा को महसूस किया
तब पीड़ाओं ने 
बताया कि केवल
सुख और खुशी ही हमें 
पूर्ण नहीं करते
बल्कि दुःख और 
पीड़ा भी मनुष्य को
तराशते हैं वक्त-वक्त पर!

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रात की नींद 

रात चाहती है
थोड़ी देर की नींद
नींद कि जिसमें तुम 
सपने न देखो
सपनों के होने से 
रात की नींद 
हराम हो जाती है
तुम नींद में भी 
हो जाते हो चेतन
रात चाहती है केवल 
शून्य हो जाए
लेकिन तुम नींद में भी 
प्रहर गिनते हो
फलां प्रहर देखा था सपना
जैसे दिन रात की 
गोद में सो जाता है
वैसे रात नहीं सो पाती 
निश्चिंत होकर
तुम्हारे सपने उसकी 
नींद बिगाड़ देते हैं!

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गणितीय नियम

गणितीय नियम
बेकार थे सब! 
केवल रोटी ही थी हमेशा केंद्र में
रोटी की त्रिज्या बराबर ही
अस्तित्व था उसका!
रोटी के गोल आकार में ही
देखा जा सकता था
ऐसे निर्मम समय में
घनाकार, त्रिकोण व आयत!
सृष्टि के लिए जो भी हो
पर उसके लिए सारे
ज्यामितीय नियम
रोटी की परिधि से ही
बंधे हुए थे!
भाषाओं का व्याकरण 
और विज्ञान के सब रहस्य
रोटी के गोल आकार में ही
निहित थे!