शख़्सियत : स्थानीय परिवेश में होती हैं श्रेष्ठ कविता की जड़ें

जीवन से जुड़ा कवि लोक भाषा चुनता है और लोक भाषा परिवर्तनशील होती है, इसलिए इसमें सृजनात्मक क्षमता भी सर्वाधिक होती है। स्थानीय जन जीवन की अभिव्यक्ति के लिए सुसंस्कृत भाषा अनेक बार अक्षम प्रमाणित होती है, तब कवि स्थानीय भाषा का प्रयेाग कर लेता है।

शख़्सियत : स्थानीय परिवेश में होती हैं श्रेष्ठ कविता की जड़ें

कवयित्री ललिता नारायणी का कहना

⚫ नरेंद्र गौड़

 ’श्रेष्ठ कविता हमें यह आभास करा देती है कि वह कहां के जन जीवन का प्रतिबिम्ब प्रस्तुत कर रही है। कवि जहां रह रहा है, वह उस परिवेश को कविता में व्यक्त करता है। कवि की जड़ें अपने स्थानीय परिवेश में होती हैं। इन कविताओं में स्थान विशेष के संदर्भ होते हैं। इन संदर्भों से हमें वहां के आंचलिक जीवन की झलक मिल जाती है। जो कविता स्थानीय नहीं होती, वह कहीं की नहीं होती। ऐसी कविता दीर्घजीवी नहीं होती, क्योंकि उसकी जड़ें ही नहीं होती हैं।’

कवयित्री ललिता नारायणी


 यह बात जानी मानी कवयित्री ललिता नारायणी ने कही। इनका मानना है कि कविता में कवि भाषा के किस रूप को प्रयुक्त करता है- इस पर हमारा ध्यान जाना स्वाभाविक है। कई बार भाषा प्रयोग हमें कठिनाई में डाल देते हैं। अजनबी शब्द हमारे समक्ष प्रश्न चिह्न बन जाते हैं। जीवन से जुड़ा कवि लोक भाषा चुनता है और लोक भाषा परिवर्तनशील होती है, इसलिए इसमें सृजनात्मक क्षमता भी सर्वाधिक होती है। स्थानीय जन जीवन की अभिव्यक्ति के लिए सुसंस्कृत भाषा अनेक बार अक्षम प्रमाणित होती है, तब कवि स्थानीय भाषा का प्रयेाग कर लेता है।

कवि लेते हैं बोलियों का सहारा

 एक सवाल के जवाब में ललिता जी का कहना था कि हिंदी कविता को लें तो हमारे जन से जुड़े कवि बोलियों का सहारा लेते हैं। हिंदी क्षेत्र का बहुसंख्यक समाज हिंदी की बोलियों का ही प्रयोग करता है। यदि कवि इस लोक समाज को अभिव्यक्ति प्रदान करे तो वह लोक भाषा की उपेक्षा नहीं कर सकता। लेकिन, लोक भाषा का प्रयोग एक चुनौती भी है। कवि को इसके प्रति सचेत होना होता है। कविता में प्रयुक्त लोक भाषा का प्रसंग और संदर्भ से भावार्थ स्पष्ट होना चाहिए। लोक भाषा का सफल प्रयोग लोक सम्पृक्ति से ही सम्भव है।

कवि और वैज्ञानिक समान

 ललिता जी का मानना है कि हम ऐसी कविता पढ़कर प्रसन्नता अनुभव करते हैं जिसमें हम जन जीवन का ऐसा पक्ष पता चलता है, जिसकी हमें जानकारी नहीं रही। हम नये अनुभव संसार में प्रवेश करते हैं। कहा जाता हे कि कवि और वैज्ञानिक काफी हद तक समान होते हैं। दोनों वस्तु जगत का सूक्ष्म पर्यावलोकन करते हैं। कवि पर्यावलोकन से अपने अनुभवों को समृध्द करता है और विचारों का सत्यापन करता है। वहीं वैज्ञानिक आविष्कार के लिए सूत्र और साधन तैयार करता है।

अनेक उपलब्धियां और पुरस्कार

ललिता जी एलएलबी कर चुकी हैं। आप कविता, कहानी, आलेख लिखने के साथ ही कुशल चित्रकार भी हैं। कविता संकलन ’कुछ पृष्ठ अभी खाली है’ के अलावा सात साझा संकलनों में इनकी रचनाएं शामिल हैं। आपको कई सम्मान मिल चुके हैं जिनमें महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, अमृता प्रीतम, कलम के सिपाही, रविंद्रनाथ टैगोर शामिल हैं। साहित्यनामा, द फेस ऑफ इंडिया, कंट्री ऑफ इंडिया, अमर उजाला, दैनिक जागरण, अमृत प्रभात, हिंदुस्तान आदि प्रतिष्ठित पत्र- पत्रिकाओं में रचनाएं व पेंटिंग प्रकाशित हो चुकी है। कला के क्षेत्र में ललिता जी को मणिकर्णिका आर्ट गैलरी द्वारा महिला दिवस अंतरराष्ट्रीय कला अवार्ड, पॉवर ऑफ वूमेन अवार्ड, रानी लक्ष्मी बाई, रविंद्रनाथ टैगोर अवार्ड...भाव्या फाउंडेशन द्वारा अंतरराष्ट्रीय मैत्री सम्मेलन में राष्ट्र गौरव अवॉर्ड, सिद्धू कानू कलारत्न अवॉर्ड, इंडियन बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉर्ड सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है।

ललिता जी की कविताएं

मरहम की खदानें

आज मरहम की होती खदानें कहीं
दान कर आते सरहद  किनारे कहीं
मौत टलती  इसी  के बहाने कहीं
जिंदगी  बांचती फिर कहानी  कहीं
धूप में हौसले जो जले थे कहीं 
कर्ज मॉं का चुकाते फिर वो कहीं  
चल पड़े जो कदम दो कदम हारकर 
गूंजती फिर सदायें बहारें कहीं 
खाट सूनी पड़ी दर किनारे कहीं 
मां के आंचल भी लोरी सुनाते कहीं 
धूल में ख्वाब जिनके मिटे थे कहीं 
संगमरमर  सी मूरत सजाते कहीं  
बच गई राख में कोई चिंगारी कहीं 
हर  तिरंगे से आती आवाजें कहीं   
जाग उठती जहाँ में जवानी कहीं  
वो लहू फिर से लिखते कहानी कहीं।

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प्रतीक्षा

तुम होते  तो भरी अमावस
पूनम का पखवारा  होता 
तुम सरहद पर दिये जलाते 
ड्योढ़ी पर उजियारा होता
चिट्ठी  पत्री राह निहारें 
चंदा तारे रात संवारें 
मुट्ठी  में जब पाती आती 
छत का कोना अतरा होता 
सैंदुर ,टिकुली ,पायल , बिछिया 
पत्रों में सब कुछ  मिल  जाता
जब-जब नाम तुम्हारा  पढ़ती 
चूड़ी  का खनकारा होता
आंगन में गोवर्धन रखकर 
बहना  भैया  दूज मनाती
रोली अक्षत थाल सजाकर  
पैसौं  का  बंटवारा होता 
हाथों  में  कजरौटा  लेकर 
मां  की बांह  बलैया  लेती 
आंचल  में  रख  सारे तीरथ 
मंदिर ,मस्जिद ,गुरुद्वारा होता 
पैर  कांपते  पगडंडी पर
लाठी में आवाज नहीं थी
बूढ़ी काया अम्बर ताके
इस गम का कोई किनारा होता
तुम होते भारी अमावस 
पूनम का पखवारा होता।

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जिंदगी

नगर -नगर शहर -शहर
गांव -गांव गली- गली
फक्कड़ों सा घूमता 
भ्रमण हुई जिंदगी 
गरल हो या सुधा
घूंट -घूंट पी गया
मौत भी आई नहीं 
मरण हुई जिंदगी 
द्रव्य दान कर दिए 
अनाथों के नाथ को 
बूंद बूंद रक्त की
करण हुई जिंदगी
बोलना गुनाह था 
मौन व्रत रख लिया
कहकहों के शोर में 
श्रवण हुई जिंदगी
ख्वाब गिरबी से रखे
नींद के अभाव में 
मंदिरों की सीढ़ियां 
धरण हुई जिंदगी 
न जीने की चाह थी 
ना मौत का ही भय कहीं 
सच कहूं तो मित्र ! अब 
परण हुई जिंदगी।