शख्सियत : मोबाइल टीवी की दुनिया ने आदमी को आदमी से कर दिया दूर

आप किसी भी घर में चले जाइए, आपको परिवार के सदस्यों को अपने-अपने मोबाइल पर झुका हुआ पायेंगे। वहीं एक तरफ टीवी भी चल रहा होगा। मोबाइल से कुछ देर मुक्त होते ही लोगों की निगाह टीवी की स्क्रीन पर टिक जाती हैं। कुछ देर देखा और वापस मोबाइल पर अंगुलियां चलने लगती हैं। लोगों के दिमाग को मोबाइल और टीवी ने गिरवी रख लिया है।

शख्सियत : मोबाइल टीवी की दुनिया ने आदमी को आदमी से कर दिया दूर

मुदिता चतुर्वेदी का कहना

⚫ नरेंद्र गौड़

 ’चालीस-पचास साल पहले गली मोहल्लों में दोपहर के समय घरों के ओटलों पर बैठी महिलाओं को सुख- दुख बांटते देखे जाने के दृश्य आम बात थी। वहीं पुरूष भी निःसंकोच आपस में घंटों बोलते-बतियाते थे, लेकिन टीवी मोबाइल के चलन ने आदमी को आदमी से दूर कर दिया है। आपसी सम्बंधों के बीच ऐसी गहरी खाई निर्मित हो चुकी है, जिसे पाटना अब असम्भव है।’

 यह बात आधुनिक कविता की सशक्त हस्ताक्षर मुदिता चतुर्वेदी ने कही। इनका कहना था कि आप किसी भी घर में चले जाइए, आपको परिवार के सदस्यों को अपने-अपने मोबाइल पर झुका हुआ पायेंगे। वहीं एक तरफ टीवी भी चल रहा होगा। मोबाइल से कुछ देर मुक्त होते ही लोगों की निगाह टीवी की स्क्रीन पर टिक जाती हैं। कुछ देर देखा और वापस मोबाइल पर अंगुलियां चलने लगती हैं। लोगों के दिमाग को मोबाइल और टीवी ने गिरवी रख लिया है। रिश्तेदारों, दोस्तों, सखी- सहेली से बातें होती हैं। दो एक मिनट ही नहीं देर तक और इसी बातचीत की वजह से सम्बंध औपचारिक बन चुके हैं। रिश्तेदार एक दूसरे के घर सुख दुख के मौके पर जाना इस वजह से टाल देते हैं कि मोबाइल पर बातें हो तो चुकी है, अब उनके घर जाने की जरूरत क्या है!

साइबर ठगी आम बात

 मुदिता जी का कहना था कि मोबाइल के कारण लोग लाखों रूपए लुटा बैठते हैं। साइबर अपराधी बहुत कम पकड़े जाते हैं। भारतीय पुलिस तंत्र अभी इतना विकसित नहीं हुआ है कि ऐसे शातिर अपराधियों को धर दबोच सके। ठगी का शिकार बनने वालों में कई बार पढ़े लिखे लोग ही नहीं, बैकों के अफसर और खुद पुलिस वाले तक शामिल होते हैं। हाल ही में जारी आंकड़े के मुताबिक मध्यप्रदेश में विगत पांच साल के दौरान 1.27 लाख से ज्यादा लोग आॅनलाइन ठगी, फर्जीवाड़े, डेटाचोरी और वित्त्तीय अपराधों के शिकार हुए हैं। 1149 करोड़ की धोखाधड़ी हो चुकी जिसमें से सिर्फ 100 करोड़ रूपए की ही रिकवरी हो सकी है।

मिडिल कक्षा से ही बच्चों को किया जाए जागरूक

मुदिता जी का कहना है कि मिडिल कक्षा से ही बच्चों को मोबाइल का ज्ञान और इसके जरिये किए जाने वाले अपराधों की जानकारी दी जानी चाहिए। परिवर्तन की गति यही रही तो भारत ही नहीं दुनियाभर में एआई तकनीक का वर्चस्व होने वाला है, जहां मानव श्रम बहुत सीमित हो जाएगा।

इन संसाधनों की उपयोगिता से नहीं इन्कार

 मुदिता जी का कहना था कि ऐसा नहीं कि टीवी और मोबाइल को सिरे से खारिज कर दिया जाना चाहिये। इन संसाधनों से लाभ भी हैं। आज घर बैठे देश दुनिया की खबरों से रूबरू हो सकते हैं। पहले जहां रिश्तेदार को आवश्यक संदेश भेजना होता था तो डाक व्यवस्था का सहारा लेना पड़ता था, चिट्ठी पत्री पहुंचने में दस बारह दिन का समय लग जाता था, लेकिन आज पलक झपकते ही सूचना को दुनिया के किसी भी कोने में पहुंचा सकते हैं, दुनिया अब बहुत छोटी हो चुकी है।

कविताएं मनोभावों का व्यक्त करने का बेहतर साधन

 मुदिता जी मुम्बई में रहती है। इनका कहना है कि कविताएं अपने मनोभाव को अभिव्यक्त करने का बेहतरीन साधन है। कविता अनेक मनोविकारों से बचाती है। यह व्यक्ति को डिप्रेशन का शिकार नहीं होने देती है। लिखने के लिए अब कागज पेन जरूरी नहीं है। आप अपना मोबाइल उठाइये और लिख दीजिये।

फटेहाल गरीबी, लेकिन मोबाइल जरूरी

 मुदिता जी ने बताया कि मुफ्त राशन की दुकान पर आपको ऐसे फटेहाल युवक मिल जाएंगे जिनके पास हजारों रूपए का मोबाइल होगा, भले ही उनके पिता के पास खेती लायक मात्र एक एकड़ जमीन भी नहीं होगी। बेटों की जिद के कारण महंगे मोबाइल दिलाना उनके गरीब पिता की मजबूरी है। अनेक बच्चे मोबाइल चलाने को लेकर माता-पिता की डांट फटकार के कारण आत्महत्या तक कर चुके हैं। 

बचपन से लिखने का शौक

 मुदिता जी का जन्म आगरा में स्व. बृजेश चतुर्वेदी और श्रीमती रीता जी के घर हुआ। इन दिनों आप मुम्बई में रहती हैं। इन्हें कविता लिखने का शौक बचपन से रहा है। कविता, कहानियां लघुकथाएं लिखती रही हैं। इसके साथ ही पैंटिंग के प्रति भी गहरा रुझान है। इन्होंने कम्प्युटर साइंस में स्नातक शिक्षा ग्रहण की है। इनकी कविताएं सहज सरल लेकिन बहुआयामी अर्थ लिए होती हैं। प्रत्येक कविता में महाकाव्य की संभावना है। इनकी कविता में प्रकृति के अनेकानेक रंगों के साथ आम आदमी की तकलीफें भी उजागर हैं। कविता के प्रकाशन के प्रति शुरूआत से इनका खास रुझान रहा नहीं, न पुरस्कृत होने की लालसा।  

मुदिता चतुर्वेदी की कविताएं

आप हमको चाहें या न चाहें
करते रहेंगे यूं ही हम तो ख़ताएं
कभी संभले कभी गिरते जाएं
जनाब सुन लीजिए जवाब!
जब आप गिरे तो 

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सहारा देने वाला दिल में हो तुम

हर दिन दिल करे
इंतजार तेरा
नज़र रहे दरवाजे़ पर
कब होगा दीदार तेरा
बहुत मुश्किल है 
समझा पाना खुद को
कि आसान नहीं 
होता किसी से 
मिलना और जुदा होना
गुजर जाएंगे तेरी ख़ातिर
हर इम्तिहान से हम
आखिर इश्क तेरा है हीरा तो
जौहरी हम।

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कुछ मन की

कहते हैं वो हमसे 
यूं ही गाहे बगाहे 
हाथ हमेशा हमारा ही पाएंगे
नदी नहीं हैं हम
फिर भी हमारे इश्क में 
आप डूबते ही जायेंगे
पर धीरे- धीरे तैरना सीखते जाएंगे
हम आपके हैं और 
आप हमारे ही कहलाएंगे।

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तेरी बेवफाई

तुमसे इश्क था
बेशुमार था
इसीलिए तुझे जाने दिया
जिस दिन वापिस
आए थे न तुम
उसी इश्क पे ऐतबार था
अब उसी इश्क की ख़ातिर
दुआ ये करता हूं 
कभी तुझे इश्क न हो किसी से
नहीं चाहता मैं
कि तू भी रोए
मेरी तरह से।

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जिंदगी की गाड़ी

ज़िंदगी की रस्में निभाते हुए
प्यार से एक दूजे का 
हाथ थामे हुए
चलते जा रहे हैं बस 
चलते ही जा रहे हैं
मंजिल तक
न जाने क्या- क्या खोते और 
न जाने क्या क्या पाते हुए
रास्ते अंजान हैं कई बार बेइमान हैं
फिर भी भरोसा है तुम पर
देखो, संभालना हमें
कमजोर हैं पर टूटे नहीं हम।

⚫⚫⚫⚫⚫⚫⚫⚫⚫⚫⚫⚫⚫⚫⚫⚫⚫

आया सावन

भींगी भींगी 
धुली धुली सी सडकें
तेरे हाथ में 
मेरा हाथ
कितनी दूर निकल आए हम
यूं ही साथ- साथ चलते.
आ जा लिखें
इन गीले हरे- हरे पत्तों पर
तेरा और मेरा नाम 
एक साथ जैसे हो ओस की बूंद 
और हो पानी फुहार के
मिलन सा रहे
तेरा और मेरा ये प्यार
यूं ही साथ साथ चलते।

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प्यार या दोस्त

हम देखते रहे उन्हें जाते- जाते 
वो दूर होते गए हमारे 
पास आते आते
कभी सोचा भी न था
ऐसे दिन भी आयेंगे 
हम उन्हें भूले भी नहीं 
और वो हमें याद न कर पाएंगे।