शख्सियत : अपना काम कुशलता से संपादित करना नहीं किसी कविता से कम
कविता लिखने को भले ही आसान मान लिया गया है, जबकि ऐसा है नहीं! कविता में मनुष्य समुदाय की स्थिति, उसके संघर्ष और जिजीविषा का चित्रण एवं परिवर्तन की दिशा यथार्थ की मांग होती है
⚫ कवयित्री रंजना लता का कहना
⚫ नरेंद्र गौड़
’अपने कार्य का सम्पादन अत्यंत कुशलता से करना भी कविता है, यह काम किसी कविता से कम नहीं है। यदि कोई महिला लजीज खाना बनाती है, वह दाल में बघार लगाती है तो आसपास के घरों में खुशबू दौड़ जाती है, उसकी यह कुशलता कविता ही है। कोई डाॅक्टर हाॅर्ट की सर्जरी में मास्टर है तो उसका यह काम बेहतरीन कविता से कम नहीं है। हरिप्रसाद चैरसिया का बांसुरी वादन, उस्ताद बिसमिल्ला खां का शहनाई वादन, रविशकंर का सितार बजाना भी अलिखित लेकिन बेजोड़ कविता है। प्रकृति भी महान कवयित्री है जो आकाश के विशाल फलक पर अनगिनत चित्र रच देती है। भंवरों का गुंजन, फूलों का खिलना, उनकी सुगंध, वृक्षों में नई कोपलों का आना भी किसी कविता से कम नहीं है। कविता का सागर अत्यंत विशाल और अथाह है।’

कवयित्री और बिहार के शासकीय अस्पताल में नर्स रंजना लता ने यह बात कही। एक सवाल के जवाब में रंजना जी ने कहा कि कविता लिखने को भले ही आसान मान लिया गया है, जबकि ऐसा है नहीं! कविता में मनुष्य समुदाय की स्थिति, उसके संघर्ष और जिजीविषा का चित्रण एवं परिवर्तन की दिशा यथार्थ की मांग होती है। इसके लिए मनुष्य के श्रम और संघर्ष के संबंध और साथ ही मनुष्य व प्रकृति के। द्वंद्वात्मक संबंध को समझना अनिवार्य है। कविता में शाब्दिक दृश्य-चित्र होते हैं और ये बिम्बों-प्रतीकों की श्रृंखला से निर्मित होते हैं, जिनमें एक प्रवाह, क्रम और लय होती है। बिम्ब तथा प्रतीक किसी न किसी विचार अथवा भाव का प्रतिनिधित्व करते हैं। मोबाइल, कम्प्युटर के कारण भले ही कविता लिखने को आसान मान लिया गया हो, लेकिन कविता लिखना बहुत कठिन कार्य है। इसके लिए लम्बा अभ्यास और लगातार साधना करना पड़ती है।
आर्थिक असमानता के कारण विसंगतियां
एक सवाल के जवाब में रंजना जी ने कहा कि आर्थिक एवं सामाजिक असमानता के कारण हजारों विसंगतियों का सामना हमारा देश ही नहीं तीसरी दुनिया के तमाम देश कर रहे हैं। वह दौर भी दस्तक देने जा रहा है, जब मरीज डाॅक्टर के बजाए चैट बाॅट्स के जरिए उपचार कराने लगेंगे। अमेरिका में डाॅक्टर महंगे हैं और महीनों की वेटिंग चल रही है जिसके चलते युवा चैट बाॅट्स के जरिये अपना खुद इलाज कर रहे हैं। भारत में भी यह सब होते देर नहीं लगेगी, लेकिन इसके बावजूद देहात की अनपढ़ जनता झाड़-फूंक, तंत्र- मंत्र की शरण में जाना बंद नहीं करेगी।
ढोंगी बाबाओं का बोलबाला
हमारे देश में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विसंगतियां देखने को मिल जायेंगी। आप सोशल साइट्स पर देखिए, आपको कई तरह के बाबा देखने को मिल जाएंगे। जिन्होंने अपने तथाकथित चमत्कारों के जरिये भक्तों का विशाल समुदाय खड़ा कर लिया है। कोई हवा के दम पर जिंदा रहने का दावा कर रहा है, तो कोई पर्ची निकालकर भविष्य बता रहा है तो कोई नारियल फोड़कर सिंदूर निकाल रहा है। यही कारण है कि देहातों में आज भी लोग अंधविश्वास से मुक्त नहीं हुए हैं। भले ही गांव में अस्पताल है, लेकिन सांप काटने पर लोग पहले झाड़ फूंक कराने मरीज को ले जाते हैं, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। ऐसे में उसे बचाना असंभव है।
नर्स क्यों नहीं लिख सकती कविता?
एक सवाल के जवाब में रंजना जी ने कहा कि ऐसा नहीं कि नर्स, अध्यापिका, डाॅक्टर, बस ड्रायवर, कंडेक्टर, रेलवे स्टेशन मास्टर कविता नहीं लिख सकते। बल्कि ऐसे लोग भी कविता लिखते हैं तो वह अपने काम को और अधिक कुशलता से करने लगेंगे। कविता लिखने पर किसी का काॅपीराइट तो है नहीं! यह पूछे जाने पर कि ’डाॅक्टर और नर्स के पेशे में आज पहले से अधिक जोखिम की वजह क्या है?’ रंजना जी का कहना था कि पहले ग्रामीण ही नहीं शहरों में भी डाॅक्टर और उनके तमाम सहयोगियों को भगवान माना जाता था, अब ऐसा नहीं है। लोग पढ़ लिख चुके है और वह मामूली गलती पर हंगामा खड़ा कर देते हैं। ऐसी घटनाएं आये दिन होती हैं। लोगों को आधा डाॅक्टर तो केमिस्ट बना देते हैं जो डाॅक्टर की पर्ची के बिना दवाएं थमा देते हैं।
बचपन से साहित्यिक संस्कार
समस्तीपुर बिहार में स्व. रामप्यारे सिंह और श्रीमती उषा देवी के घर जन्मी रंजना जी इतिहास में एमए कर चुकी हैं। इन दिनों आप मधुबनी (बिहार) जिले के ग्राम नूरचक्र नवटोली, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में एएनएम हैं। बचपन से साहित्यिक संस्कार मिलने के कारण गीत, ग़ज़ल और आधुनिक कविताएं लिखने लगी थी।
रचनाओं का प्रकाशन और प्रसारण
प्रभात खबर, इंदौर समाचार, कोलफील्ड मिरर, दी ग्राम टुडे, अमर उजाला काव्य, संस्कार न्यूज आदि बीसियों जगह इनकी कविताओं का प्रकाशन होता रहा है। मासिक पत्रिका कविता कानन, स्वर्णिम दर्पण, अभ्युदय, सूर्यप्रभा, साहित्य की दुनिया आदि में भी इनकी रचनाएं छपती रही हैं। कई आॅनलाइन मंचों से आप रचना पाठ कर चुकी हैं तथा कई संस्थाओं व्दारा पुरस्कृत किया जा चुका है जिसकी फेहरिस्त लम्बी है। सांझा काव्य संग्रह ’ख्वाबों के परिंदे’ में कविताओं के प्रकाशन के अलावा इनके दो एकल काव्य संग्रह ‘अलबेली हूं मैं’ और ’एक ही आसमान के तले’ को पाठकों की बहुत सराहना मिली है। उल्लेखनीय है कि रंजना जी पटना के मंत्रिमंडल सचिवालय राजभाषा में भी कविता पाठ कर चुकी हैं।
रंजना लता की कविताएं
कौन हो तुम
तपती रेत सी जिंदगी में
कुछ बूंदों की बारिश तुम
आहत मन, बिखरे भावों में
छोटी- सी हो ख्वाहिश तुम
सोचती हूं, आखिर कौन हो तुम?
खाली-खाली सी शामों में
एक कप चाय की प्याली तुम
किसी दरख्त़ की शाखों पर
फूलों से लदी डाली तुम
सोचती हूं, आखिर कौन हो तुम?
झोंका हो किसी ख़ुशबू का
या हो पूरा अतर तुम
चहकते हुए परिंदों से
या भरे हुए शजर हो तुम
सोचती हूं, आखिर कौन हो तुम?
किसी डूबती किश्ती का
मिल जाए वो साहिल तुम
किसी भटकती राहों की
दिख जाए वो मंजिल तुम,
सोचती हूं आखिर कौन हो तुम?
लहरें हो समंदर की
या दरिया के गीत तुम
रात के गहरे सन्नाटे में
मनभावन संगीत तुम
सोचती हूं, आखिर कौन हो तुम?
ठहरे-ठहरे से पानी में
उठती हुई तरंग तुम
किसी मासूम बचपन का
अल्हड-़ सी उमंग तुम
सोचती हूं आखिर कौन हो तुम?
कोरे स़फेद क़ाग़ज पर
लिखी हुई ग़ज़ल तुम
जख्म़ी रूह का मरहम
या खुदा का फ़जल तुम
सोचती हूं आखिर कौन हो तुम?
खुदा से जो मांगी थी,
वो मुकम्मल दुआ तुम
रूह को जो छू जाए
हो दिलकश अदा तुम
सोचती हूं आखिर कौन हो तुम?
सदियों से ज़र्द अधरों पर
खिली हुई मुस्कान तुम
मैं कहां अब मैं रही
मेरी तो पहचान तुम
सोचती हूं आखिर कौन हो तुम?
सोचती हूं, आखिर कौन हो तुम?
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गहन अंधेरा है
माना कि गहन अंधेरा है
उस पार हमें तो जाना है।
यह जीवन तो कुरुक्षेत्र यहां
अब हार जीत संग जीना है
सुरभोग मिले या हलाहल
फिर घूंट-घूंट कर पीना है
दुख सहकर भी मुस्काना है
उस पार हमें तो जाना है।
सदियां पर सदियां बीत गईं
सब आते हैं फिर जाते हैं
पग-पग पर है संघर्ष यहां
तुम कहो कि क्या हम पाते हैं
खाली-खाली रह जाना है
उस पार हमें तो जाना है।
कभी गीत खुशियों के गाते
कभी शोक तो विरानी है
बीत-बीत क्षण बरस हो गए
नयनों में केवल पानी है
जीवन का यही फसाना है
उस पार हमें तो जाना है।

Hemant Bhatt