शख्सियत : धारदार कविताएं क्यों नहीं लिखी जाती हैं अब?

आज की कविता सामाजिक सरोकारों के बजाये निजी भावनाओं का हिस्सा हो चुकी है, वह अमूर्त पीड़ा के मकड़जाल किसी कटी पतंग की मानिंद जा उलझी है। सामाजिक यथार्थ से दूरी जितनी अधिक बढ़ेगी, उतनी ही कविता की धार बोथरी होती चली जाएगी।

शख्सियत : धारदार कविताएं क्यों नहीं लिखी जाती हैं अब?

लेखिका सुमंगला ’सुमन’ का कहना

⚫ नरेंद्र गौड़

 ’इन दिनों पहले की तरह धारदार कविताएं अब नहीं लिखी जाती हैं, इसके  पीछे सत्ता और बाज़ार का दबाव प्रमुख कारण हैं। वक्त़ का एक दौर था, जबकि कविता सत्ता से टकराती थी, आज अक्सर वह मंच, पुरस्कार और प्रकाशन की शर्तों से बंध चुकी है। कविता में धार तभी रहती है जब कवि में जोखिम उठाने की गंभीर इच्छा शक्ति हो’।

यह बात लेखिका सुमंगला ‘सुमन’ ने कही। इनका मानना है कि अब कविता ’वायरल’ होने की दौड़ में शामिल हो चुकी है। छोटे, भावुक, साझा करने योग्य वाक्य कविता की जगह ले रहे हैं। धार के लिए जो धैर्य, गहराई और टकराव चाहिए, वह इस गति में घुल जाते हैं। एक सवाल के जवाब में सुमंगला जी का कहना था कि आज साफ-साफ बोलने की कीमत बढ़ी है। कई कवि धारदार कविताएं लिख तो रहे हैं, लेकिन ऐसी कविता प्रकाशित नहीं कराते हैं। एक प्रकार से आत्म सेंसरशिप भी धारदार कविताओं के सामने नहीं आने का प्रमुख कारण है। आज की कविता सामाजिक सरोकारों के बजाये निजी भावनाओं का हिस्सा हो चुकी है, वह अमूर्त पीड़ा के मकड़जाल किसी कटी पतंग की मानिंद जा उलझी है। सामाजिक यथार्थ से दूरी जितनी अधिक बढ़ेगी, उतनी ही कविता की धार बोथरी होती चली जाएगी।

कस्बों में लिखी जा रही धारदार कविताएं

सुमंगला जी का कहना था कि नागार्जुन, मुक्तिबोध, धूमिल, पाश आदि कवियों की परंपरा से आधुनिक कवियों का संवाद कम हो चला है। कविता की धार कुंद होने का यह भी बड़ा कारण रहा है। धारदार कविताएं कस्बों के कवि लिख जरूर रहे हैं, लेकिन उनकी कविताएं छापेखाने तक जाने को मोहताज हैं। आज धारदार कविताएं लधु पत्रिकाओं, ब्लाॅगों, व्यक्तिगत मंचों और हाशिए की आवाज़ों में मौजूद हैं। सवाल यह नहीं है कि धारादार कविताएं क्यों नहीं लिखी जा रही हैं, बल्कि यह है कि हम उन्हें सुनने और सामने लाने को कितने तैयार हैं?

लेखन आत्मा की आवाज़

सुमंगला जी मुम्बई रहती हैं, लेखन इनके लिए केवल अभिव्यक्ति का जरिया नहीं होकर आत्मा की आवाज है।  मुम्बई जैसे महानगर जहां मराठी का बोलबाला है, जहां आप हिंदी साहित्य की मशाल जलाए हुए हैं। रचनात्मक लेखन के साथ ही अनेक लेखकीय गतिविधियों में भाग लेते हुए अन्य रचनाकारों का प्रोत्साहित भी करती हैं।  आपके विचार साहित्य और समाज के समकालीन प्रश्नों को उजागर करते हैं। इनके दो काव्य संग्रह, एक लघुकथा संग्रह और एक ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं

माँ की ममता पर केंद्रित कविताएं

 सुमंगला जी ने माँ की ममता, त्याग और बलिदान पर केंद्रित अनेक कविताओं का सृजन किया है। इतना ही नहीं इस कार्य से संबंधित एक अभियान भी चला रही हैं। मुंबई की तेज रफ्तार जिंदगी के बीच, साहित्य इनके  लिए वह ठहराव ह,ै जहाँ ये स्वयं से मिलती हैं। लेखन केवल कागज पर शब्द उकेरना या अभिव्यक्ति का माध्यम मात्र नहीं है, बल्कि यह आत्मा की पुकार है। जब समाज की विसंगतियाँ या मानवीय संवेदनाएँ मन को झकझोरती हैं, तो वे शब्द बनकर स्वतः ही प्रस्फुटित होने लगते हैं। मुंबई की विविधता और यहाँ के संघर्षों ने इनकी लेखनी को एक नई दृष्टि और गहराई दी है। आप छंदबद्ध और मुक्त छंद, दोनों ही विधाओं में सहजता से अपनी बात कहने में सिध्दहस्त हैं। सुमंगला जी केवल एकांत में लिखने वाली लेखिका नहीं हैं, बल्कि साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय रूप से जुड़कर नए लेखकों और विचारों को मंच प्रदान करने में विश्वास रखती हैं।

प्रकाशन एवं सम्मान

 सुमंगला जी की रचनाएँ देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रही हैं। राष्ट्रीय स्तर के समाचार पत्रों के साहित्यिक पृष्ठों पर आपके लेख और कविताएँ न केवल सराही गई हैं, बल्कि वे समाज के वैचारिक विमर्श को नई दिशा भी प्रदान करती हैं। साहित्य के प्रति अनवरत समर्पण और उत्कृष्ट सृजनशीलता के लिए  इन्हें समय-समय पर विभिन्न राज्य स्तरीय एवं प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया है। जिनमें अटल सम्मान, साहित्य सेवा सम्मान, राष्ट्रगौरव सम्मान और आचार्य मनीषी सम्मान सहित 100 से अधिक पुरस्कारों से इन्हें नवाजा जा चुका है।

सुमंगला  सुमन की कविताएं

स्त्री 

जब सहन करती है
तो पृथ्वी की कोख-सा धैर्य बुनती है
पर जब प्रचंड हो उठती है
तो वही पृथ्वी
उसके चरणों में कम्पन बन काँपती है
जिस क्षण उसके भीतर
अन्याय के विरुद्ध अग्नि जागती है
उसी क्षण दिशाओं के रक्त में
तूफानों की धड़कन तेज हो जाती है
वह उठती है
तो केवल चलती नहीं
बल्कि कालचक्र को
अपनी एड़ियों में बाँधकर
उसका मार्ग बदल देती है
और जब वह तांडव करती है
तो असत्य का साम्राज्य
धूल बनकर बिखर जाता है
देव भी नतशिर खड़े रहते हैं
और दिक्काल की सीमाएँ
उसकी ऊर्जा के आगे
राख-सी उड़ जाती हैं।

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स्त्री (दो)

सृजन की जननी भी वही
विनाश की विजयी नाद भी वही
वह चाहे तो जीवन गढ़ दे
और चाहे तो
तारों की छाती चीरकर
नए सूर्य का उद्घोष कर दे।

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ग़ज़लें

मुम्बई की  हवा  सुहानी  है
जिंदगी की यही निशानी है
कोई कीमत चुका न पाएगा 
प्यार की तो यही कहानी है
जब  कहर  टूटता  यहाँ कोई 
आए आँखों में इसके पानी है
ये सदा जिन्दगी की है हमदम 
यारों इसकी कथा पुरानी है
ये लुटाती रही सदा ही खुशी 
जिंदगी की अमर निशानी है
हर खुशी है यहाँ सदा कायम  
ग़म की इसमें नहीं  कहानी है
दिल यहाँ है ’सुमन’ समंदर सा 
लगता आँखों में खूँ  सा पानी है।

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 (दो)

बेवफा नहीं थी फिर भी  बेवफाई  कर गई
होता ही नही यकीन जग हँसाई कर गई
आईना थी वो मेरी ग़ज़ल की जानती थी वो 
जाने  कैसे  मेरे  इश्क  से  जुदाई  कर गई
पास में  नहीं हो तुम  खयाल पर तुम्हारा है
सोचता  रहा  मैं वो आ  के दवा  कर गई
होठ पे गुलों की खुशबू और बातों में शहद
कहने को ज़ुदा है फिर भी  आशनाई कर गई
बढ़  गई  हैं  धड़कनंे  तुम्हारे  इंतजार में 
वो मिली थी और दिल तलक फिजाई कर गई
मैं गुजर रहा था उसके मोड़़ से वो इसलिए
आँखों  से  हमारे  प्यार की  बढ़ाई कर गई
जो सजाया था सुमी ने ख्वाब वो चटक गया 
तुझसे दूर होकर जीना नहीं जुदाई कर गई।

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(तीन)

संग-ए-मरमर  पे  चलोगे  तो  फिसल  जाओगे
हुस्न  को  सच जो कहोगे  तो फिसल  जाओगे
रंग   आँखों  के, अदाओं   के  बहुत   धोखे  हैं
जो  अदाओं  में  फंसोगे,  तो  फिसल  जाओगे
जो  दिखाई  दे  वही  हो,  ये  जरूरी  तो  नहीं
दिल  के  मौसम में बहोगे, तो  फिसल जाओगे
इश्क  की  राहों  में  मिलते  हैं  सभी  को काँटे
कितना  इससे  भी बचोगे तो, फिसल जाओगे
झूठ  की  शाख  में जो  ख्वाब  सजाए हैं सभी
नींद  के साये  से  उठोगे, तो  फिसल  जाओगे
जिंदगी  अपनी सदाकत से जिओ खुल करके
ख्वाब बनकर जो जिओगे, तो फिसल जाओगे
हमनशीं  शक्ल  में चाहत  नहीं  होती है ‘सुमन’
तुम जो हर शख््स पे मरोगे, तो फिसल जाओगे।