शख्सियत : पीढ़ियों तक जीवित और जीवंत रहती हैं सार्थक कविताएं

असल कविता वह है जिसे कवि जब लिखे तो उसका खून झलके, नसों का कंपन सुनाई दे, कराह और चुनौती एक साथ आयें।

शख्सियत : पीढ़ियों तक जीवित और जीवंत रहती हैं सार्थक कविताएं

कवयित्री ज्योति शर्मा का कहना

⚫ नरेंद्र गौड़

 ’’अब हर कोई लिख पा रहा है, साझा कर पा रहा है। सच है कि अधिकतर रचनाएँ सतही और क्षणिक होती हैं, पर सच्ची कविता  जिसमें संवेदना, भाषा और विचार की गहराई हो, भीड़ से अलग होकर स्वयं पहचानी जाती है। इतिहास बताता है कि हल्की कविताएँ समय के साथ मिट जाती हैं, जबकि सार्थक कविता पीढ़ियों तक जीवित और जीवंत रहती हैं।’’

रचनाकार ज्योति शर्मा

यह कहना था समकालीन कविता की सशक्त हस्ताक्षर ज्योति शर्मा का। इनका मानना है कि असल कविता वह है जिसे कवि जब लिखे तो उसका खून झलके, नसों का कंपन सुनाई दे, कराह और चुनौती एक साथ आयें।

खबरों में आदमी नहीं विज्ञापन बोलते हैं

 एक सवाल के जवाब में ज्योति ने कहा कि आज ख़बरों में आदमी नहीं, विज्ञापन बोलते हैं। आम जन की आवाज़ शोरगुल में दब गई है जैसे भीड़ में खोया कोई अनाम चेहरा।

समय के साथ धड़कती है समकालीन कविता

 समकालीन कविता को लेकर पूछे सवाल के जवाब में ज्योति ने कहा कि समकालीन वही रचना है जो समय के भीतर धड़कती हुई दिखाई दे। जिसमें आदमी की उलझनें, रोजमर्रा की थकान, सपनों का टूटना और नए सपनों का बनना  सब कुछ एक साथ मौजूद हो। भाषा भी ऐसी जो चमकदार नहीं, बल्कि जख््मी और बेचैन हो, जैसे जीवन खुद।

पहले की बनिस्बत आज आसान है लिखना

 ’’पहले की बनिस्बत अब कविता लिखना आसान है या मुश्किल?’’ यह पूछना वैसा है जैसे कोई पूछे क्या अब साँस लेना पहले से सरल हो गया है? कविता कभी आसान नहीं होती। पहले भी नहीं थी, अब भी नहीं है। फर्क़ सिर्फ़ इतना है कि पहले कविता लिखने के लिए शब्द कम और चुप्पियाँ ज्यादा थीं, अब शब्द बहुत हैं, चुप्पियाँ गायब हो रही हैं।

चारों तरफ बिखरे हैं शब्द

 एक सवाल के जवाब में इन्होंने कहा कि कवि को अब अपने भीतर से शब्द नहीं खोजना पड़ता, वे चारों ओर बिखरे पड़े हैं,  समाचारों में, विज्ञापनों में, दीवारों पर चिपके पोस्टरों में, यहाँ तक कि मोबाइल की स्क्रीन पर चमकते नोटिफिकेशन में, लेकिन यही शब्द कविता नहीं बनाते। कविता तब बनती है जब आदमी शब्दों की भीड़ से गुजरकर अपनी एकाकी चुप्पी तक पहुँचता है।

आज इसलिए लिखना आसन है क्योंकि

 ज्योति का कहना था कि आज लिखना शायद इसलिए आसान लगता है क्योंकि साधन बहुत हैं,  काग़ज़ नहीं तो स्क्रीन है, स्याही नहीं तो कीबोर्ड है। मगर कविता का काम तो वही है उस बेचैनी को दर्ज़ करना जिसे कोई उपकरण आसान नहीं कर सकता। तो कहना चाहिए लिखना अब आसान दिखता है, पर कविता अब भी उतनी ही कठिन है जितनी पहले थी। कथ्य का दबाव कवि को उपयुक्त भाषा और रूप की खोज के लिए निरंतर बाध्य करता है। परिवर्तनशील परिवेश कवि को बदलता है और कथ्य रूप को, इनमें यह पारस्परिक सह सम्बंध है। प्रभावशाली भाषा और रूप की यह खोज ही रचनाकार को प्रयोग की ओर प्रवृत्त करती है।

ज्योति का संकलन चर्चा के केंद्र में 

 ‘बहुत दिन चुप रहने के बाद’ ज्योति शर्मा का दूसरा कविता संकलन प्रकाशित हुआ है। जिसकी साहित्य जगत में खूब चर्चा हो रही है। अनेक जाने माने कवियों ने संकलन की सराहना करते हुए समीक्षात्मक टिप्पणी लिखी हैं। असद जै़दी का कहना है कि ज्योति के लेखन में बात को सीधे सच्चे ढंग से बेधड़क, बिला खौफो-खतर, कहने का जो माद्दा नजर आता है वह उनके वास्तविक स्वभाव की झलक है। यह उनकी विशेषता है कि अपनी ज़बान और बयान में वह साहित्यिक, गैर-साहित्यिक और दैनंदिन के बीच दीवारें खड़ी नहीं करतीं। यह चीज उनके यहाँ एक उसूल की हैसियत रखती है। उनके पास वह तेज नजर और वह ऐसा खुला दिमाग है जो एक पारंपरिक जीवन शैली, मध्यवर्गीय संस्कार और पुरानी समाज व्यवस्था के बीच पलकर और लड़कर ही पैदा हो सकता है।

 अरुण कमल का कहना

 अरुण कमल का कहना है कि ’’ज्योति का संग्रह ’’ बहुत दिन चुप रहने के बाद’’ समकालीन कविता की नयी समृद्धि का संकेतक है। नितांत नये अनुभव, अछूते बिम्ब और बोलचाल के मुहावरे इन कविताओं को विशिष्टता प्रदान करते हैं और उन्हें अग्रणी कवि के तौर पर स्थापित करते हैं। ”चाँदी का गहना है सुख, दिनोंदिन काला पड़ता जाता ” यह एक पंक्ति कवि की सूक्ष्म अनुभूति और उसे नये रूपाकार दे पाने की क्षमता का द्योतक है। “पहाड़ों में सितंबर” जैसी कविताएँ प्रकृति और मानव संबंध को नयी दृष्टि से देखती-परखती हैं।’’ इसी प्रकार मदन सोनी, मनीषा कुलश्रेष्ठ जैसे अनेक समकालीन रचनाकारों ने संकलन की सराहना की है।

अनेक पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित

 ज्योति शर्मा परास्नातक हैं। इन्हें ब्रज संस्कृति शोध सम्मान से नवाजा जा चुका है। इनका पहला संकलन  ’’नेपत्थ की नायिका ’’ बोधि प्रकाशन जयपुर ने छपा। इसके बाद दूसरा संग्रह हिंदी युग्म से ’’बहुत दिन चुप रहने के बाद’’ प्रकाशित और चर्चित हो रहा है। आप कई मंचों पर रचना पाठ कर चुकी हैं तथा साहित्य ऑन लाइन एवं ऑफ लाइन कार्यक्रमों में सहभागिता रही है। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं के प्रकाशित होने के साथ ही आप आकाशवाणी से भी रचना पाठ करती रही हैं।

ज्योति शर्मा की चुनिंदा कविताएं

शरीर को लेकर कविता लिखना

शरीर मौन है  
मांस की परतों में छिपा 
एक अघोषित ग्रंथ
उसकी धड़कनें 
भाषा नहीं जानती
पसीना शब्द नहीं बनता
दर्द के लिए कभी कोई
व्याकरण नहीं रची गई
मैं लिखना चाहती हूँ 
अपनी हड्डियों की ठंडक
रक्त में दौड़ते उफान की 
सनसनाहट को
त्वचा पर चुपचाप 
उतरते एकांत को
जैसे शीशे पर साँस का
धुँधलका हो
मन  गढ़ा जा सकता है 
किस्सों में उपमाओं से
शरीर होता है 
अनकहा अनुवादहीन
और शरीर पर लिखना
खुद को हाथों से छूने जैसा।

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 मैं तुम्हारे इंतज़ार के दिनों में

मैं तुम्हारे इंतज़ार के दिनों में 
अपनी खिड़की के 
पास रखा गमला 
हर दिन आधा
घुमाती रही ताकि धूप
दोनों तरफ बराबर बँट सके
उन दिनों में कपड़े 
सूखते-सूखते भी
थोड़े गीले रह जाते थे 
जैसे मेरी बातों  का
एक सिरा तुम्हारे जवाब से 
रह गया हो अधूरा
डाकिया आता, अखबार 
डालकर चला जाता 
मैं अखबार से पहले
उसके हाथ देखती

कभी-कभी, मैंने बिना 
वजह चाय को उबलने दिया
ताकि केतली में उठता 
भाप का बादल मुझे 
मुझे कुछ कहे, और मैं 
सुनने का बहाना पा जाऊँ
तुम्हारे इंतजार में दिन छोटे 
नहीं होते, वे फैल जाते हैं
कमरे के कोनों तक 
जहाँ धूल भी तुम्हारा नाम 
लिखने लगती है।

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भादो के बादल

भादो के बादल गरजे 
मानो धरती की निंद्रा को
जगाने आए हों
काले रेशमी परदों से 
झाँकती बिजली क्षण भर में 
आकाश को दीपशिखा बना देती है
धरती का हृदय उमग कर 
प्रेम की गीली धड़कन सुनाता है
धान की बालियाँ नन्हे हाथ जोड़ 
बरखा से आशीष माँगती हैं
गली-कूचों में भीगती हवा 
ज्यों विरहिणी के केशों में 
उलझा संदेश हो
और नदी अपनी उफनती बाहों में 
बादलों की बोली को
गले लगाना चाहती है
भादो के बादल गरजे तो लगता है 
यह केवल वर्षा का आह्वान नहीं
यह धरती और आकाश का 
अनादि मिलन गीत है।

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बचे रहे पहाड़

बचे रहे पहाड़
उनके माथे पर आकाश की 
नीली पगड़ी बँधी रहे
और उनके सीने में धरती की धड़कन
वे बचे रहेंगे जब तक 
कोई बच्चा पहाड़ की गोद में 
पहली बार गूंजेगा
और कोई चरवाहा बाँसुरी में 
उनकी प्रतिध्वनि को गाएगा।