शख्सियत : जीवन में खुलते हैं कविता के सभी संदर्भ

शख्सियत : जीवन में खुलते हैं कविता के सभी संदर्भ

कलमकार अंजलि राय का कहना

⚫ नरेंद्र गौड़

कविता के सभी संदर्भ जीवन में खुलते हैं। जीवन ही कविता का वास्तविक रचना स्रोत है। एक श्रेष्ठ कविता हमारी परंपरा और संस्कृति में अपनी जगह बना लेती है। कविता में भी अन्य कलाओं की तरह गुजरे हुए का प्रभाव व्याप्त हो जाता है। उसके सूत्र परंपरा से जुड़ जाते हैं। संस्कृति जीवन के रिक्ति को भरती है, कविता संस्कृति में समा जाती है। हम उसे संस्कृति में रखकर देख सकते हैं। कविता के संदर्भ उसके आसपास एक प्रभामंडल की सृष्टि करते हैं।

कलमकार अंजलि राय

यह बात आधुनिक हिंदी कविता की सशक्त हस्ताक्षर अंजलि राय ने कही। इनका मानना है कि श्रेष्ठ कवि कार्य व्यापार, क्रिया प्रतिक्रियाओं से एक सामान्य व्यक्ति की तरह गुजरते हुए भी उनसे तटस्थता भी बनाए रखता है। इसलिए वह वस्तु जगत को संपूर्णता में व्यक्त करता है, उसकी विभिन्न परतों, विभिन्न आयामों को उद्घाटित करता है, वह वस्तु जगत को एकायामी रूप में नहीं देखता है।

कुछ कविताएं क्यों अधिक प्रभावित करती हैं

एक सवाल के जवाब में अंजली का कहना था कि कुछ कविताएं हमें इसलिए अधिक प्रभावित करती हैं कि उनमें कुछ ऐसा व्यक्त होता है जिस पर हम नए सिरे से दृष्टिपात करते हैं। हम सोचते हैं कि हमने चीजों को इस तरह क्यों नहीं देखा अथवा अनुभव किया। एक नई दृष्टि से देखने पर चीजें सहसा आलोकित हो उठती हैं।

कवि स्वायत्त चेतना का प्रयोग करता है

एक सवाल के जवाब में अंजली ने कहा कि देशकाल सापेक्ष जीवन जीता हुआ भी, कवि अपनी स्वायत्त चेतना का प्रयोग करता है। एक ओर कवि स्वयं को अपने काल की विकसित चेतना से जोड़ता है, साथ ही दूसरी ओर अपनी स्वायत्तता भी बनाए रखता है। यह कवि की स्वायत्तता सापेक्षता है। कविता के रूप में हम उसकी चेतना और संवेदना से पुनर्साक्षात्कार करते हैं और वह पुनः समूह का अंग बन जाती है। समूह की इकाई होते हुए भी कवि का उससे अद्भुत सम्बंध है। ग्रहण और प्रतिदान की यह प्रक्रिया कला सृजन का नैरन्तर्य क्रम है।

श्रेष्ठ कविता का छंद नहीं टूटता

अंजली राय का कहना था कि कविता का विन्यास परंपरागत छंदों में होता है तो कभी यह छंद उस सीमा का अतिक्रमण कर जाता है। क्रम भंग करके भी श्रेष्ठ कविता का छंद नहीं टूटता। अपने सम्पूर्णत्व में कविता का विन्यास एक अलग ही छंद का रूप ग्रहण कर लेता है। कविता की संरचना में ही लय निहित होती है। कविता में व्यक्त अर्थध्वनि उसे नई तरह की रागात्मकता प्रदान करती है। इस तरह की कविता में निहित गूंज अनुगूंज, उसे अनोखी लय से समृध्द करती है।

जीव विज्ञान इनकी जिज्ञासा का आधार

गाजीपुर उत्तरप्रदेश में रह रही अंजली राय बिहार राज्य में शिक्षक के पद पर कार्यरत हैं। इन्होंने जीव विज्ञान में स्नातक किया है। इनका कहना है कि जीव विज्ञान इनकी जिज्ञासा का आधार है, वही साहित्य एवं जीवन से प्रेम करने की वहज है। बचपन से इनकी रूचि कहानी किस्सों को सुनने और सुनाने के प्रति रही है। इसी अभिरूचि ने कविता की तरफ अग्रसर होने की दिशा में सीढ़ी का काम किया। इनकी कविताओं में सामाजिक यथार्थ, जीवन संघर्ष के विभिन्न चित्र और उसके अनेक रंग देखे जा सकते हैं। इनकी कविताएं बहुआयामी अर्थ लिए होती हैं और उनमें दुर्लभ अर्थ विस्तार है। वहीं इनकी कविताएं समाज सापेक्ष हैं। इनकी कविताएं जीते-जागते लोगों का चित्रण करती हैं। सामाजिक विद्रूपता का इनकी कविताएं भाषायिक विन्यास के साथ उजागर करती हैं। बिनब्याही लड़कियां, बेरोजगार लड़के, रीढ़हीन लोगों की दुनिया के अलावा भी बहुत कुछ विद्रूप चेहरों की पड़ताल इनकी कविताएं करती हैं। भाषा के बनावटीपन से रहित इनकी कविताएं प्रकृति को उस तरह नहीं देखती जैसा कि आमतौर पर देखा जाता है। प्रकृति चित्रण में भी आपकी सजग दृष्टि उसे मौलिक और अनूठे रूपाकारों में देखती है।

अंजलि राय की कविताएं

 रीढ़हीन दुनिया

दुनिया नोचना चाहती है 
बेरोजगार लड़कों की चमड़ी 
और उसे बेचकर अपना 
पेट भरना चाहती है 
कुरेदती है उनके घाव
अपने सवालों से कि- 
’क्या कर रहे हो आजकल?’
वहीं दुनिया उधेड़ना चाहती है 
बिनब्याही लड़कियों की ’आत्मा’
और उसे खरीदकर अपनी 
इज्त़त ढं़कना चाहती है 
ऐसी बाज़ारू दुनिया और 
उसमें रहने वाले 
लोगों के हिस्से सिर्फ़ और 
सिर्फ बाज़ार आता है 
और बाज़ार सिर्फ़ बेचना 
और खरीदना जानता है
वो जीना नहीं जानता 
न जीने देना चाहता है 
तो सुनो बेरोजगार लड़कों 
और बिनब्याही लड़कियों ! 
अपनी ही नजरों में गिरी हुई दुनिया 
और उसके मुर्दों से नजरें क्यूं चुराना?
तुम छाती ठोक कर कंधे उचकाकर चलना 
और बस उनके सवालों पर ठहाके
मार कर हंस देना
क्योंकि वो ऐसे डरे हुए रीढ़हीन लोग हैं 
जिन्हें तुम्हारी बेखौफ़ हंसी से 
डर लगता है 
और जो तुम्हें खुलकर जीते देख 
बार- बार अपनी मौत मरते हैं।

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 गुलमोहर

किसी रोज धूप की 
नज़रों से नज़रें मिलाएंगे 
किसी रोज तपती रेत में भी सुर्ख 
गुलमोहर हो जायेंगे
हां वहीं रेत जो समाज की 
आंखों की किरकिरी है
हां वहीं रेत जो मुठ्ठी से फिसलती है
मंजिल दूर होगी तो 
हाथ से फिसलना होगा
चांद तक जाने को 
चैखट से निकलना होगा
हां वहीं रेत जो रेगिस्तान का समंदर है 
हां वहीं रेत जो युद्ध गाथाओं का सिकंदर है 
हां वहीं रेत जो किसी मजबूत
नींव का हिस्सा है
हां वहीं रेत जो किसी दरकते पहाड़ के 
सीने और किसी
मांझी के इश्क का किस्सा है।।
रेत ,वक्त ,इश्क और गुलमोहर को
खिलने से आजतक 
भला कौन रोक पाया है?
चाहे धूप जितनी भी तपे
या तपाए हमें उतना ही चटख खिलना होगा
साथी एक रोज 
मुझे तुम्हारे हिस्से का 
’गुलमोहर’ बनना होगा।

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बेटियां 

रक्तरंजित इस भूमि पर
पल्लवित मुस्कान होंगी
कंटकों को सींचती भी
बेटियां बागवान होंगी
खींची लीक को मिटाती
शीश गौरव से उठाती
मिट्टी का स्वाभिमान होंगी
चक्रव्यूह को भेदती भी 
विजय का प्रमाण होंगी
.....बेटियां बागवान होंगी
बुझते लोक को बचाती
लौ सी दीप्तिमान होंगी
स्वप्न को आकार देती
नीला आसमान होंगी
.....बेटियां बागवान होंगी
शांति का उद्घोष करती
सशक्त शंखनाद होंगी
धुरी बनकर इस समय की
अविरल प्रवाह होंगी
.....बेटियां बागवान होंगी
स्वर्णिम कथाएं रचती
भावी गौरव गान होंगी 
अस्तित्व को आधार देती
जीवन अभयदान होंगी
.....बेटियां बागवान होंगी
रक्तरंजित इस भूमि पर
पल्लवित मुस्कान होंगी
कंटकों को सींचती भी
बेटियां बागवान होंगी।