विचार सरोकार : सूर्य की उपासना और नव-चेतना का पर्व मकर संक्रांति

​वैज्ञानिक दृष्टि से, इस दिन से सूर्य उत्तरायण की ओर गति करना शुरू करता है। इसके परिणामस्वरूप दिन लंबे और रातें छोटी होने लगती हैं। यह समय ऋतु परिवर्तन का संदेश देता है; कड़ाके की ठंड धीरे-धीरे कम होने लगती है और वसंत के आगमन की सुगबुगाहट शुरू हो जाती है।

विचार सरोकार : सूर्य की उपासना और नव-चेतना का पर्व मकर संक्रांति

उमा त्रिवेदी

​भारत विविधताओं का देश है, जहाँ हर त्योहार प्रकृति के साथ हमारे गहरे संबंध को दर्शाता है। इन्ही में से एक प्रमुख पर्व है मकर संक्रांति। आमतौर पर यह पर्व प्रतिवर्ष 14 या 15 जनवरी को मनाया जाता है। जब सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है, तो इस खगोलीय घटना को 'मकर संक्रांति' कहा जाता है। इस ​पर्व का धार्मिक और आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टि से देखा जाए तो महत्व अत्यधिक महत्वपूर्ण है 


​हिंदू धर्म में मकर संक्रांति को 'देवताओं का दिन' माना जाता है। मान्यताओं के अनुसार, इस दिन सूर्य देव अपने पुत्र शनि के घर जाते हैं, जो पिता-पुत्र के प्रेम का प्रतीक है। महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए 'उत्तरायण' (सूर्य का उत्तर की ओर झुकाव) का ही प्रतीक्षा की थी, क्योंकि माना जाता है कि इस समय शरीर त्यागने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

वैज्ञानिक और प्राकृतिक महत्व

​वैज्ञानिक दृष्टि से, इस दिन से सूर्य उत्तरायण की ओर गति करना शुरू करता है। इसके परिणामस्वरूप दिन लंबे और रातें छोटी होने लगती हैं। यह समय ऋतु परिवर्तन का संदेश देता है; कड़ाके की ठंड धीरे-धीरे कम होने लगती है और वसंत के आगमन की सुगबुगाहट शुरू हो जाती है। खेती-किसानी की दृष्टि से भी यह नई फसल के स्वागत का समय होता है।

दान और खान-पान की परंपरा

मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ का विशेष महत्व है। आयुर्वेद के अनुसार, सर्दियों में तिल और गुड़ का सेवन शरीर को ऊर्जा और गर्माहट प्रदान करता है। 'तिल-गुड़ घ्या आणि गोड-गोड बोला' की कहावत सामाजिक समरसता और मधुर संबंधों पर जोर देती है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, खिचड़ी का सेवन और दान-पुण्य करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

यदि हम ​सांस्कृतिक विविधता की दृष्टि से देखे तो एक देश, अनेक नाम

यह पर्व पूरे भारत में अलग-अलग नामों और रिवाजों के साथ मनाया जाता है। उत्तर भारत में इसे 'खिचड़ी' या 'मकर संक्रांति' कहते हैं, जहाँ पतंगबाजी का विशेष उत्साह रहता है। पंजाब में यहाँ एक दिन पहले 'लोहड़ी' के रूप में अग्नि पूजन किया जाता है। तमिलनाडु में इसे 'पोंगल' के रूप में फसल उत्सव की तरह मनाया जाता है। असम यहाँ इसे 'माघ बिहू' कहा जाता है। वही ​गुजरात में उत्तरायण' के नाम से प्रसिद्ध, यहाँ का अंतर्राष्ट्रीय पतंग महोत्सव विश्वभर में विख्यात है। अर्थात  हम कह सकते हैं कि ​मकर संक्रांति का पर्व हमें अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है। यह पर्व सिखाता है कि जिस प्रकार सूर्य निरंतर आगे बढ़ता है, हमें भी अपने जीवन के विकारों को त्याग कर प्रेम, मिठास और दानशीलता के साथ आगे बढ़ना चाहिए।

उमा त्रिवेदी, कर्नाटक बैंगलोर