विचार सरोकार : आध्यात्मिक क्रांति के प्रणेता महर्षि अरविंद 

महर्षि अरविंद यानी आध्यात्मिक क्रांति के प्रणेता । महर्षि अरविंद यानी पाश्चात्य संस्कृति पर भारतीय संस्कृति की विजय पताका, महर्षि अरविंद यानी राष्ट्रवाद का शंखनाद ,और महर्षि अरविंद यानी चेतना का दीपक। 

विचार सरोकार : आध्यात्मिक क्रांति के प्रणेता महर्षि अरविंद 

श्वेता नागर 

महर्षि अरविंद यानी आध्यात्मिक क्रांति के प्रणेता । महर्षि अरविंद यानी पाश्चात्य संस्कृति पर भारतीय संस्कृति की विजय पताका, महर्षि अरविंद यानी राष्ट्रवाद का शंखनाद ,और महर्षि अरविंद यानी चेतना का दीपक। 

15 अगस्त 1872 को  महर्षि अरविंद का इस पावन भारत भूमि पर अवतरण भारत की स्वाधीनता के सूर्योदय का संकेत था । क्योंकि महर्षि अरविंद को 7 वर्ष की आयु में ही शिक्षा ग्रहण करने के लिए उनके पिता ने इंग्लैंड भेज दिया था वे नहीं चाहते थे कि महर्षि अरविंद पर जरा सा भी भारतीय संस्कृति का प्रभाव पड़े । महर्षि अरविंद के पिता चाहते थे कि वे शिक्षा पूर्ण कर आईसीएस परीक्षा में बैठे और महर्षि अरविंद अपने पिता की इच्छा का मान रखते हुए इस परीक्षा में बैठे और उच्चतम अंकों के साथ इस परीक्षा को उत्तीर्ण किया । लेकिन कहा गया है " होई सोई जो राम रचि राखा " इसलिए ईश्वर ने उनके लिए राष्ट्रधर्म का मार्ग चुन रखा था जिस पर चलकर महर्षि अरविंद ने भारत माता की सेवा में अपना जीवन अर्पण कर दिया ,और भारतीय संस्कारों के आलोक से संपूर्ण विश्व में मानवता का प्रकाश फैलाया। 


अपनी पत्नी को लिखे पत्र से महर्षि अरविंद का राष्ट्र के प्रति किस कदर समर्पण भाव था यह सिद्ध होता है उन्होंने पत्र में लिखा था कि मेरे तीन पागलपन है पहला पागलपन है जो कुछ भी हम कमाते हैं उस पर केवल हमारा हक नहीं है वह देश के लिए है । दूसरा पागलपन है यदि ईश्वर है तो मैं उन्हें खोज कर रहूंगा और तीसरा पागलपन है राष्ट्र केवल जमीन का टुकड़ा नहीं है । केवल जड़ पदार्थ नहीं है । वन, पर्वत , नदी नहीं है । देश मेरे लिए मां के समान है इसलिए कोई मां के सीने पर रक्तपात करता है तो हमारा कर्तव्य है उस राक्षस का वध करना।


बंगाल विभाजन के खिलाफ पूरे देश में राष्ट्रीयता की ज्वाला जल उठी थी तब महर्षि अरविंद उससे कैसे दूर रहते । राष्ट्रीयता की ज्वाला को और तेज करने के लिए महर्षि अरविंद ने बडौदा की नौकरी छोड़ दी और कलकत्ता आ गए । अंग्रेजी दैनिक समाचार पत्र वंदे मातरम में महर्षि अरविंद ने निर्भीक होकर अपने विचारों को व्यक्त किया , और उनके विचार खूब लोकप्रिय हुए । महर्षि अरविंद की लेखनी ने यह सिद्ध किया कि रचनात्मकता कैसे क्रांति के बीज बो सकती है , कैसे बदलाव ला सकती है । अंग्रेजी अखबार स्टेट्समैन ने महर्षि अरविंद के चतुराई पूर्ण तरीके से वन्दे मातरम में लिखे लेखों के लिए कहा था कि "वंदे मातरम की हर पंक्ति में राजद्रोह फूट रहा है पर यह इस तरह लिखा गया है कि कानून द्वारा अखबार के खिलाफ कदम नहीं उठाया जा सकता । " इसके बाद अलीपुर बम कांड घटना ने ही क्रांतिकारी अरविंद को महर्षि अरविंद बनाया । 1908 में हुए अलीपुर बम कांड में महर्षि अरविंद , उनके भाई बारिन  घोष और अन्य अनुशीलन समिति के सदस्यों को आरोपी बनाया गया। महर्षि अरविंद की इस केस में पैरवी देशबंधु चित्तरंजन दास ने की । न्यायालय के समक्ष अपने अंतिम तर्क में चित्तरंजन दास कहते हैं "आज अभियुक्त केवल इस न्यायालय के समक्ष नहीं इतिहास के उच्च न्यायालय के आगे दंडायमान है। अभियुक्त का पृथ्वी से विदा ले लेने के बाद भी इतिहास उन्हें देश प्रेम का कवि , राष्ट्रीयता का पुरोधा और मानवता का प्रेमी कहेगा । "वास्तव में चित्तरंजन दास की वाणी ईश्वरीय वाणी  सिद्ध हुई।

महर्षि अरविंद के दर्शन के गहन अध्येता और वरिष्ठ साहित्यकार डॉ मुरलीधर चांदनीवाला जी लिखते हैं कि "महर्षि अरविंद का जीवन वैश्य कविता की तरह है । वे उस विश्व के प्रजापति हैं, जो कभी तीव्र , कभी मंद गति से निरंतर रूपांतरित हो रहा है । उनकी साधना को देशभक्ति के साथ-साथ मानवीय चेतना के विकास और उसके महा अभियान के रूप में देखना होगा।"