विचार सरोकार : हलफनामे की दहलीज पर खड़ा निष्पक्ष लोकतंत्र?

बड़े-बड़े नेता ये सड़क पर प्रदर्शन करते फिरे, लेकिन जहां वह जीत गए, वहां के लिए गूंगे हो गए।आज के आधुनिक सजग समय में जब पूरी पारदर्शिता रखी जाती है, तब निर्वाचन निष्पक्ष किए जाते हैं। जिन्हें आज गड़बड़ी दिख रही है, वे तब किधर थे?  

विचार सरोकार : हलफनामे की दहलीज पर खड़ा निष्पक्ष लोकतंत्र?

डॉ. प्रदीपसिंह राव, वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक

इस समय देश में बहुत ही रोचक बहस चल रही है कि पार्टी बड़ी की निर्वाचन आयोग? देश के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब कोई राजनीतिक दल निर्वाचन आयोग को ही खुली चुनौती दे रहे हैं कि हम नहीं तुम झूठे हो,और जो भी जीत रहे वो  तो वोट चोर हैं! इस आरोप में निर्वाचन आयोग बोल रहा है कि आरोप लगाना है तो हलफनामा दो, अन्यथा  देश को गुमराह करने के लिए माफी मांगो! उधर पार्टी कह रही की चुनाव में वोट लिस्ट में कोई गड़बड़ी नहीं हुई है,ऐसा हलफनामा पहले निर्वाचन आयोग दे।


फिर हम भी दे देंगे!तू डाल डाल तो हम पात पात! एक ही पिता के नाम के दर्जनों वोटर,और कई वोटर्स के फर्जी नाम। कई वोटर्स के नाम गायब। ऐसी तथाकथित शिकायतें मुख्य विपक्षी पार्टी ने  बकायदा पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन दे कर बताई हैं! तो क्या ये सब सच है? इसकी ताकीद जारी है।भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324/325 में निर्वाचन आयोग को महत्वपूर्ण शक्तियां दी गई हैं। अनुच्छेद 325 में मतदाता सूची से संबंधित उल्लेखनीय नियम बने हैं। 

समावेशन और बहिष्करण भारतीय नागरिकता पर आधारित

मतदाता सूची में नामों का "समावेशन और बहिष्करण "भारतीय नागरिकता पर आधारित है। मतदान आयु से अधिक किसी भी मतदाता को लिंग भेद, जाति, धर्म आदि के आधार पर मतदाता सूची से बाहर नहीं करना है और न किसी विशेष मतदाता सूची में शामिल करना है। यदि वह भारतीय नागरिकता के मापदंड में आता है तो उसका अधिकार है। देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्वाचन के लिए निर्वाचन आयोग भारतीय लोकतंत्र की आस्था का केंद्र है।

आयोग पर उठाई उंगली

इस पर विश्वास के बलबुते पर ही 1951/52 से आज तक निष्पक्ष चुनाव होते आए हैं। विपक्ष जब पक्ष में था, तब 2 सीट पर भी बैठ कर निर्वाचन आयोग को इतना बड़ा दोष नहीं दिया जाता था, जबकि बूथ कैप्चरिंग का "काला अध्याय" भी लोगों ने देखा है। विधान मंडलों के चुनाव में आज भी सैकड़ों चुनौतियां हैं,जिनका सामना आयोग कर रहा है। आपको याद ही होगा जब 2014 में सभी चुनावों में ईवीएम का उपयोग मतदान के लिए  किया तो जो हारे उन्होंने आयोग पर उंगली उठाई। आरोप लगाया कि ये हैक की जाती है और पंजे पर बटन दबाओ तो कमल पर वोट जाते हैं।

तब वे किधर थे

बड़े बड़े नेता ये सड़क पर प्रदर्शन करते फिरे, लेकिन जहां वह जीत गए, वहां के लिए गूंगे हो गए।आज के आधुनिक सजग समय में जब पूरी पारदर्शिता रखी जाती है, तब निर्वाचन निष्पक्ष किए जाते हैं। मतदाता सूची पर दावे और आपत्ति का पर्याप्त समय दिया जाता है। उसके बाद ही मतदाता सूची का अंतिम प्रकाशन किया जाता है। तो जिन्हें आज गड़बड़ी दिख रही है, वे तब किधर थे? हालांकि निर्वाचन आयोग को अपने पर लगे आरोपों का संवैधानिक संस्था को पूरी पारदर्शिता के साथ स्पष्टीकरण देना चाहिए, ताकि जनता का विश्वास जीत सके। 

इसमें भी लगता है विपक्ष को संदेह

विपक्ष यह भी कह रहा है कि हम आयोग से पूछते हैं तो बीजेपी प्रवक्ता क्यों बनती है (जबकि आरोप तो ये सीधे मोदी का नाम लेकर लगा रहे। चोर चोर बोल रहे।) आप गहराई से विचार करें तो जबसे सर्वोच्च न्यायालय ने बिहार में मतदाता सूचियों का "स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन" SIR (विशेष गहन पुनरीक्षण) शुरू करवाया है, तभी से हलचल मच गई है। इससे मतदाता सूची सारे दस्तावेजों के और प्रत्यक्ष मतदाता से रूबरू हो कर प्रामाणिक सूची तैयार करेगी।इसमें जितने फर्जी हैं, बाहर हो जाएंगे। इसमें भी विपक्ष को संदेह लगता है। तो क्या देश में अराजकता से चुनाव होंगे?सवाल यही खड़ा है।

मुस्तैदी नहीं औपचारिकता ज्यादा

आयोग में सुधार के लिए 1980 से तारकुंडे समिति,1989 में दिनेश गोस्वामी समिति, टी एन शेषन की सिफारिशें, इंद्रजीत गुप्त समिति की सिफारिशें लगातार सुधार के लिए लागू हुई। पहले से अधिक सुधार हुए वोटर आई डी फोटो युक्त सूची, वीडियो रिकार्डिंग, ईवीएम, वी वी पेट आदि कई सुधार हुए।यह सही है कि अभी भी कई लोगों के नाम दो दो, तीन तीन जगहों की सूची में हैं, जो मतदाता ने जगह बदलने पर भी न हटवाए। हालांकि दो जगह वो वोट नहीं दे सकता। ऐसे कई नाम अपडेट करने चाहिए। इसके लिए बहुत बड़ी और ट्रेंड फौज की जरूरत होगी। हर जगह अभी भी मुस्तैदी नहीं, औपचारिकता ज्यादा है।

करें भारत के निष्पक्ष लोकतंत्र की रक्षा

वोटर आई डी को आधार से लिंक करने से समस्या का समाधान हो सकता है। हर वोटर को ऑनलाइन अपडेट करना होगा।चुनौती को पक्ष विपक्ष दोनों मिलकर दूर करें। देश में जनवरी 2025 तक 99.1 करोड़ मतदाता पंजीकृत थे, जो धीरे धीरे एक अरब हो जाएंगे। इसमें 23 करोड़ के लगभग युवा मतदाता है और  लगभग 43 करोड़ महिला मतदाता हैं। हर दल भारत के  निष्पक्ष लोकतंत्र की रक्षा करें और जोश में होश न खोएं।