शख्सियत : अवधूत जयनारायण बापजी थे धुरंधर वक्ता, अभिभाषक और साहित्यकार, पैरवी बिना किए कैसे जीत गए मुकदमा?
जैसा कि लोग बताते हैं जयनारायण जी ने सोचा कि आज उनकी वजह से ईश्वर को तकलीफ पहुंची और उन्हें अदालत आना पड़ा। बस, उसी दिन से उन्होंने वकालत छोड़ दी और पूरी तरह भक्तिभाव में लीन रहने लगे।
⚫ नरेंद्र गौड़
अवधूत जयनारायण बापजी धार्मिक व्यक्ति ही नहीं धुरंधर वक्ता, अभिभाषक और साहित्यकार थे। वे अनेक भाषाएं जानते थे। उन्होंने परमार्थ के कार्यों के लिए देश भर में अनेक आश्रम स्थापित किए, जहां सेवा सम्बंधी कार्य आज भी जारी हैं। उनके चमत्कारों को लेकर जनमानस में बहुत सी किंवदंतियां प्रचलित हैं।

आगर मालवा में हुआ था जन्म
देश के अनेक पूजाघरों और दुकानों पर बापजी की फोटो दीवारों पर सादर नजर आ जायेगी। दुकानदार इनकी तस्वीर की पूजा अर्चना के बाद ही कारोबार की शुभारंभ करते हैं। शाजापुर की युवा पीढ़ी को जानकारी नहीं होगी कि बापजी का जन्म उन्हीं के जिले के निकट आगर जिले में हुआ और विवाह शाजापुर में हुआ था।
पैरवी किये बिना जीत गये मुकदमा
जयनारायण बापजी को लेकर 1932 में घटित एक चमत्कारी घटना आगर के बच्चे बूढ़े, जवान सभी की जुबान पर है, जिसमें उन दिनों के वकील रहे बापजी एक दि आगर के बैजनाथ मंदिर में महादेव की पूजा में इतने लीन हो गए कि एक पक्षकार की तरफ से मुकदमा लड़ने के लिए अदालत जाने की याद नहीं रही। अचानक आंखें खुली तो घबराए भागे-भागे कोर्ट गए, लेकिन वहां नजारा ही अलग था। सभी ने उन्हें बधाई देते नजर आए कि वकील साहब! आपने तो गजब पैरवी की आप मुकदमा जीत गये। यहां तक कि जज ने भी उनकी पैरवी की तारीफ की और कहा कि उन्होंने अपने जीवन काल में ऐसे तर्क किसी वकील से नहीं सुने, लेकिन जयनारायण जी को लगा कि सभी मिलकर उनका मजाक उड़ा रहे हैं, क्योंकि जब वह अदालत पहुंचे नहीं तो उनकी तरफ से मुकदमा किसने लड़ा और जीत भी लिया! जब भरोसा नहीं हुआ तो जज साहब ने उन्हें वह रजिस्टर दिखाया जिस पर उनके हस्ताक्षर थे।
चमत्कारी घटना के बाद छोड़ी वकालत
जैसा कि लोग बताते हैं जयनारायण जी ने सोचा कि आज उनकी वजह से ईश्वर को तकलीफ पहुंची और उन्हें अदालत आना पड़ा। बस, उसी दिन से उन्होंने वकालत छोड़ दी और पूरी तरह भक्तिभाव में लीन रहने लगे। देश को मिली आजाद होने के पूर्व फौजी छावनी आगर थी। यहां बैजनाथ मंदिर से जुड़ी एक और कहानी यह भी है कि एक अंग्रेज वर्ल्ड वार में लड़ने गया था, आगर में उसकी पत्नी चिंता कर रही थी।
अंग्रेज अफसर ने कराया मंदिर का जीर्णोध्दार
अंग्रेज अफसर की पत्नी ने बैजनाथ महादेव से मन्नत मांगी कि उसका पति सही सलामत लौट आया तो वह पति से कहकर मंदिर का जीर्णोध्दार अवश्य कराएगी। कुछ दिनों बाद वाकई पति सुरक्षित लौट आया और मंदिर का जीर्णोध्दार शास्त्रोक्त विधि से पंडितों व्दारा कराया गया था।
अदालत का वह कमरा सुरक्षित
अदालत का वह कमरा आज भी सुरक्षित रखा गया है, जहां अभिभाषक जयनारायण जी ने पैरवी किए बिना मुकदमा जीता था। वहां बापजी की तस्वीर लगी है और परिसर में बापजी की आदमकद प्रतिमा भी है। श्रध्दालुओं में उनके दस्तखत की फोटो काॅपी खूब बंटी जिसे आगर के पूजाघरों में आज भी देखी जा सकती है।
श्रीलालजी पंड्या थे प्रथम आध्यात्मिक गुरू
जयनारायण जी बापजी का जन्म आगर में पुष्टिमार्गीय बलदेवदास जी उपाध्याय और श्रीमती मथुराबाई के घर 23 मार्च 1896 को रामनवमीं के दिन हुआ था। उनका विवाह सन् 1911 में शाजापुर निवासी भीकमजी भट्ट की सुपुत्री कलावती देवी के साथ हुआ। एक रिश्तेदार स्व. श्रीलालजी पंड्या को जयनारायण जी अपना प्रथम आध्यात्मिक गुरू मानते थे, जिनके संपर्क में आने के बाद उन्होंने 1916 में रेवेन्यू एजेंट की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी। फौजदारी वकील की परीक्षा पास करने के बाद वह प्रांतीय अदालतों में भी मुकदमें लड़ने लगे थे।
अनेक भाषाओं के ज्ञाता
जयनारायण जी को संस्कृत, उर्दू, गुजराती, मराठी सहित अनेक भाषाओं में धाराप्रवाह बोलने और पढ़ने में महारथ हासिल थी। उन्हें बचपन से ही आगर के बैजनाथ महादेव के प्रति अगाध श्रध्दा थी। वह प्रखर बुध्दि के धनी थे जिसके चलते सभी परीक्षाएं प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। माता पिता के निधन के बाद जयनारायणजी का मन और भी विरक्त रहने लगा, अपनी पुत्री का विवाह करने के बाद वह इस जिम्मेदारी से भी मुक्त हो गए।
अवधूत नित्यानंद बापजी के बने शिष्य
इसी दौरान जयनारायण जी पहली बार धार में अवधूत नित्यानंद बापजी के दर्शन करने पहुंचे और इतने अधिक प्रभावित हुए कि उनके शिष्य बन गये। शाजापुर शहर में शहीद पार्क के ठीक सामने नित्यानंद जी का आश्रम है। जहां सम्मोहन की मुद्रा में उनकी मूर्ति स्थापित है। इस आश्रम में नित्य पूजा अर्चना सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। लालजी पंड्या से ही प्रेरणा ग्रहण कर जयनारायण बापजी ने ध्यानयोग सीखना प्रारंभ किया और 1920 में आगर के प्रसिध्द बैजनाथ मंदिर परिसर में एकांत स्थान पर गायत्री उपासना का अखंड अनुष्ठान किया जो सन् 1931 तक अनवरत जारी रहा। उसी समय उक्त चमत्कारिक घटना घटित हुई थी। जिसने उनके जीवन में आमूलचूल परिवर्तन ला दिया।
धोंसवास में समाधि
26 अक्टूबर 1945 जयनारायण बापजी रतलाम के समीप धोंसवास के नित्यानंद आश्रम में ब्रम्हलीन हुए, जहां उनकी समाधि और मंदिर बना हुआ हैं, श्रध्दालु दर्शन के लिए जाते हैं। जयनारायण बापजी की प्रमुख प्रकाशित कृतियों में नित्यानंद विलास, सत्वज्ञान गुटका, चैदह रत्न, गुप्त सागर प्रमुख हैं।
Hemant Bhatt