शख़्सियत : क़िताबों की दुनिया से अब बहुत दूर जा चुके लोग

डिजिटल युग में लोग किताबों से दूर होते जा रहे हैं। भारत में भी जिस दिन नेट नहीं चलता लोगों की चिंता बढ़ जाती है। रात -रात भर करवटें बदलने लगते हैं। डाॅटा लगातार महंगा हो रहा है, लेकिन मोबाइल हाथ से नहीं छूटता।

शख़्सियत : क़िताबों की दुनिया से अब बहुत दूर जा चुके लोग

कलमकार सरिता गर्ग ’सरि’ का कहना

नरेंद्र गौड़

 ’’आज के इस डिजिटल युग में लोग किताबों से दूर होते जा रहे हैं और मोबाइल लैपटाप की दुनिया में ग़ुमशुदा हैं। मोबाइल ने इंसान को एकाकी बना दिया है। वहीं आपसी सम्बंधों की मर्यादा टूूट रही है। आज की पीढ़ी किताबों से दूर हो चुकी है। जिसे देखों वही मोबाइल की तरफ झुका नजर आता है।’’


 यह बात आधुनिक कविता की सशक्त हस्ताक्षर सरिता गर्ग  'सरि’ ने कही। इनका कहना था कि आज खेल के मैदानों में माॅल या फिर बहुमंजिला इमारतें बन चुकी हैं और कुछ एक मैदान हैं भी तो वहां बच्चों की किलकारियां अब नहीं गूंजती। बच्चे मोबाइल पर गेम खेलते नज़र आते हैं।

सोशल मीडिया पर बैन की वजह से नेपाल में तख्त़ा पलट 

 एक सवाल के जवाब में सरिता जी ने कहा कि सोशल मीडिया भारत की नहीं दुनिया के तमाम देशों को अपनी  गिरफ़्त में ले चुका है। नेपाल सरकार ने फेसबुक, इंस्ट्राग्राम, मेसेंजर, यूट्यूब आदि सोशल मीडिया पर बैन लगा दिया तो वहां युवा पीढी सड़कों पर उतर आई। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के मकान में आग लगा दी और वह इस्तीफा देकर भाग गये। कई शहरों में कफ्र्यू लगाना पड़ा। अनेक लोग मारे गए हैं। पूरा देश अराजक हालात से गुजरा और तख़्ता पलट हो गया। यह घटना साबित करती है कि सोशल मीडिया से महरूम करने के क्या परिणाम होते हैं और इसने युवाओं के दिलो दीमाग़ पर किस क़दर क़ब्जा कर लिया है। भारत में भी जिस दिन नेट नहीं चलता लोगों की चिंता बढ़ जाती है। रात -रात भर करवटें बदलने लगते हैं। डाॅटा लगातार महंगा हो रहा है, लेकिन मोबाइल हाथ से नहीं छूटता।

सोशल मीडिया आय का जरिया 

 एक सवाल के जवाब में सरिता जी का कहना था कि नेपाल में भयंकर ग़रीबी है, वहां के लाखों युवक रोज़गार के लिए अन्य देशों में छोटे मोटे काम करने को मजबूर हैं। वहीं सोशल मीडिया प्लेटफार्म वहां के युवकों की आय का ज़रिया भी है। इसके व्दारा वहां रोजी रोटी चलती है। भारत में भी हालत बेहतर नहीं है। यहां भी भयंकर बेरोजगारी है और ऐसी हालत में जहां भी काम मिल जाये लोग करने को मजबूर हैं। सोशल मीडिया भी आय का जरिया है, लेकिन नेट बैलेंस सस्ता होना चाहिए।

चैनलों पर पूंजीपतियों का कब्जा

 एक सवाल के जवाब में सरिता जी ने कहा कि टीवी के ज़रिये जो समाचार प्रसारित होते हैं, उन चैनलों पर पूंजीपतियों का कब्जा है, ऐसे में आम आदमी की त़कलीफ़ उजागर नहीं होती है। देश की प्रमुख समस्याएं मसलन बेरोजगारी, महंगाई, खाद्यान्न संकट, पेट्रोल, डीजल की बढ़ती कीमतें आदि को लेकर खबरें ग़ायब हैं। समूचा मीडिया गोदी मीडिया में तब्दील हो चुका है।

हाथों में क़िताबों के बजाये मोबाइल

सरिता जी का कहना था कि वक्त़ का एक दौर था जब हाथों में क़िताबें लिये युवाओं को देखना आम बात थी। बसों और ट्रेनों में लोग अख़बार, पत्रिकाएं और क़िताबें पढ़ते नजर आते थे, लेकिन आज तो सभी के सिर मोबाइल की तरफ झुके दिखते हैं। घरों में भी परिवार के सभी सदस्यों के बीच बातचीत नहीं होती हैं, सभी अपने-अपने मोबाइल चला रहे होते हैं। पहले जहां लोग अपने पड़ोसी से घंटों बोलते बतियाते थे, औरतें एक दूसरे के घर जाकर सुख दुख बांटती थी, ऐसे रिश्ते अब दम तोड़ चुके हैं। आदमी से आदमी दूर हो चुका है।

अनेक पुस्तकें प्रकाशित एवं चर्चित

 सरिता जी भिवाड़ी (राजस्थान) में रहती हैं। हिंदी साहित्य में एमए के अलावा बीएड कर चुकी हैं, दिल्ली में प्रवक्ता रही हैं। कविता, कहानियां, समीक्षा लिखने के साथ ही मंच संचालन के क्षेत्र में भी ख़ासा दख़ल रखती हैं। चित्रकला और अभिनय में भी गहरी रुचि ही नहीं वरन् इस क्षेत्र में पारंगत भी हैं। ’रेशमी अहसास’ कहानी संग्रह,  ’शुचित्र पन्ने’, ’उतर गया चांद जल में,’ ’तुम केवल मेरे हो’, ’छप्पन भोग’, कविता संकलन, ’क़तरा-क़तरा रात पिघलती’ (ग़ज़ल संकलन) के अलावा बारह साझा संकलनों में आपकी बीसियों कविताएं संकलित हैं। आकाशवाणी से रचनाओं का प्रसारण होता रहा है। अनेक पत्र- पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं। पांच पुस्तकों का संपादन आपने किया है। विभिन्न 750 साहित्य संस्थानों व्दारा सम्मानित किया जा चुका है। आपकी कविता में पे्रम के विभिन्न रूप परिलक्षित हैं। इनका मानना है कि प्रेम में वह ताक़त है जो दुनिया में आपसी रिष्ते मजबूत बना सकता है और आतंक हिंसा को समाप्त कर सकता है। प्रेम को सरल अर्थों में नहीं देखा जाना चाहिए, वरन इसे विराट स्वरूप में ग्रहण किया जाए। सरिता जी की कविताओं की भाषा अत्यंत सरल और अर्थ पारदर्शी एवं बहुआयामी हैं। कविताओं की आवाज़ बहुत दूर तक जाती है। उनमें दुर्लभ अर्थ विस्तार है। बारबार इनकी रचनाएं पढ़ने पर कई अर्थ खुलते हैं।

चुनिंदा कविताएं


आया है मधुमास रुलाने

तुम्हें देख जो खिल जाते थे
फूल लगे हैं अब मुरझाने
दर्द छलकता है आँखों से
आ जाओ तुम पीर मिटाने
बेगाने से लगते हैं अब
चिर-परिचित थे जो भी अपने
द्वार हृदय के बंद हो गए
धूमिल हैं अब सारे सपने
हिय बाती अब क्षीण हो चली
आ जाओ तुम पुनः जलाने
दर्द छलकता है
सौंधी गंध नहीं माटी में
अब सुवास है नहीं तुम्हारी
जलतरंग अब नहीं श्वांस में
धड़कन लगती थमी हमारी
जीवन दान मिलेगा जब तुम 
आ जाओगे हमें जिलाने 
दर्द छलकता है
दिशाहीन हैं सारी राहें
तुम बिन लगे अमावस रातें
तन तो सूखा रह जाता है
हृदय भिगो जाती बरसातें 
पतझड़ जैसा जीवन है अब 
आया है मधुमास रुलाने
दर्द छलकता है।

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चश्मा उनका यदि होती मैं

सोचा करती हूँ मैं अक्सर
नए ख्य़ाल मुझको आते
साथ सदा रहती मैं उनके
जुदा कभी ना हो पाते
काश कभी अपने प्रियवर का 
चश्मा जो मैं बन पाती
बैठ नाक पर उनकी मैं भी
जीभर कर फिर इतराती 
दूर न करते कभी मुझे वो 
सदा खूब ही दुलराते
बहुत हिफाजत से रखते फिर
दूरी कभी न सह पाते
कर थामे अख़बार कभी वो
खोज नहीं मुझको पाते
सिर पर बैठी मैं मुस्काती
मुझे ढूँढते चिल्लाते 
कान पकड़ कर सुबह-शाम मैं
उनके सिर पर चढ़ जाती 
पास सदा रह कर उनसे मंै
नख़रे अपने उठवाती
कभी-कभी थक कर वो अपनी
छाती पर मुझको रखते
तब आलिंगन का सुख देकर
थोड़ा सुख वह भी चखते
तकिये के नीचे रख मुझको
कभी चैन से सो जाते
कभी दबा करतल में मुझको
शयन-लाभ का सुख पाते
कुर्ते के कोने से अपने
मुझे पोंछते नहलाते
गिर जाती कभी यदि हाथ से
उठा नेह से सहलाते
उनका चश्मा बन जाऊँ यदि
पल भर अलग न हो पाऊँ 
सदा-सदा आँखों में बसकर
मैं भी उनमें खो जाऊँ।

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 तुम्हें ही पुकारा था

यादों की चादर पर तुम्हें 
क़सीदे-सा काढ़ती
स्पर्श करती
लिपट कर सो जाती हूँ
और तुम मेरी छुअन से अनजान
किसी सरोवर में तैरते
मराल बन जाते हो
कस के आंखें मींचे
सोने की कोशिश में जागती
तुम्हें छूने को आगे बढ़ती हूँ
पर मेरी उंगलियों का 
असहाय कम्पन
तुम देख नहीं पाते
मेरे अहसास को झिंझोड़ती
आँखों की भीगी कोर
आनन भिगोती 
कह जाती है मुझसे
तुम यहाँ नहीं हो
और मैं डूबती चेतना संभाले
पंखुड़ी- सी बिखर जाती हूँ
उसी सरोवर में
शायद मैंने टूट कर 
बिखर कर भी 
तुम्हें ही पुकारा था।

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याद आयेंगे हम

तुम्हें याद बहुत हम आएंगे
फिर से होगा जब मधुर मिलन
फिर वेगवती सांसें होंगी
जब थिरकेगा अपना तन-मन
तब स्वप्निल सी रातें होंगी
उर निलय में तेरा वास रहा
तब मौन मुखर हो जाएगा
काली बदली ओढ़े वितान
काँधे से लग सो जाएगा
अनजानी छुअन कभी तन पर
जब अपनी मुहर लगाएगी
तब रोम-रोम कम्पित होगा
काया तब नग़में गाएगी
भीगी  रातों बरसातों में
जब स्वप्न सभी जग जाएंगे
विस्मृत से उन अहसासों को
क्या हम फिर से जी पाएंगे
जब चाँद गगन पर उतरेगा
जुगनू बारात सजाएंगे
ग़र चले गए हम अम्बर पर
तुम्हें याद बहुत हम आएंगे।

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मिलन का यह क्षण

दृष्टि यदि यह निशा के एकांत में 
तुमसे न मिलती-
मिलन का यह क्षण कहो 
कैसे यहां फिर ख़ास होता
ना थिरकतीं पायलें पदचाप से 
यदि प्रिय तुम्हारे
अंक भर कर थाम कटि से 
क्या तुम्हारे पास होता
देखकर मुझको अगर 
उस रात्रि ना तुम मुस्कुराती 
फिर भला कैसे तड़ित का 
अभ्र में आभास होता
तुम अगर चलती नहीं 
गजगामिनी-सी दो कदम भी
इस हृदय में तब नहीं 
किंचित तुम्हारा वास होता
प्रणय के यदि ताप से 
पिघली न होती भावनाएं
झिलमिलाते जुगनुओं के बीच 
क्या मधुमास होता
और यदि तुम चख न पाती 
स्वाद इन अनुभूतियों का
चित्त की इस मरुधरा पर 
प्रेम का क्या भास होता
जो न उड़ती मन मयूरी 
पंख यों रँग में लपेटे
फिर कहो प्रिय किस तरह मैं 
यों तुम्हारा दास होता
बज रहे मन में मँजीरे 
धड़कनों की थाप पर अब
तुम न होती तो भला 
मन में कहां उल्लास होता।