शख्सियत : देश की मूलभूत समस्याओं से जनता को जागरूक बनाना रचनाकारों का दायित्व

आज मोबाइल कम्पनियों ने युवाओं को गुलाम बना दिया है। ठीक उसी तरह जैसे ब्रिटिश ईस्टइंडिया कम्पनी ने तिजारत के जरिये घुसपैठ की थी और देखते ही देखते तमाम राजे रजवाड़े ही नहीं मुगलिया सल्तनत तक बर्बाद हो गई। मोबाइल कंपनियां भी विदेशी हैं।

शख्सियत : देश की मूलभूत समस्याओं से जनता को जागरूक बनाना रचनाकारों का दायित्व

कवयित्री करुणा झा का कहना

⚫ नरेंद्र गौड़

 ’’देश अनेक समस्याओं का सामना कर रहा है मसलन भूख, बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद आदि। ऐसे में लेखकों बुध्दिजीवियों, कलाकारों का दायित्व है कि इन समस्याओं को लेकर जनता को जागरूक करे और बताये कि इनके लिए कौन लोग जिम्मेदार हैं।’’

यह बात समकालीन कविता की सशक्त हस्ताक्षर करुणा झा ने कही। एक सवाल के जवाब में इन्होंने कहा कि हाल ही में राजस्थान सरकार में चपरासी की जॉब के लिए लाखों प्रतियोगियों ने भाग लिया जिसमें अधिकतर ग्रेज्युएट, एमएससी, बीटेक और पीएचडी थे। वहीं दूसरी तरफ मुंबई में एप्पल 17 फोन खरीदने के लिए युवाओं की इतनी भीड़ पहुंच गई कि धक्का मुक्की होने लगी। कई लोगों के पांव कुचल गये और अनेक लोगों को भारी कुंठा और निराशा में खाली हाथ लौटना पड़ा। उस फोन की कीमत 85000 से लगाकर 2 लाख तक है, यह हालत है देश की। इसे आर्थिक असमानता भी कह सकते हैं और मोबाइल को लेकर हद से ज्यादा दीवानगी भी। आज मोबाइल कम्पनियों ने युवाओं को गुलाम बना दिया है। ठीक उसी तरह जैसे ब्रिटिश ईस्टइंडिया कम्पनी ने तिजारत के जरिये घुसपैठ की थी और देखते ही देखते तमाम राजे रजवाड़े ही नहीं मुगलिया सल्तनत तक बर्बाद हो गई। मोबाइल कंपनियां भी विदेशी हैं। आज इंस्ट्राग्राम, फेसबुक, वॉट्सऐप, मेसेंजर, एआई जैसे कई सोशल साइट्स हैं। रात दिन लोग यही देखते रहते हैं। यहां तक कि बूढ़ों से लेकर बच्चे तक। इसीलिए लेखकों, कलाकारों, बुध्दिजीवियों की नैतिक जिम्मेदारी है कि लोगों को जागरूक करें।

आसान नहीं समस्याओं का निदान

 करुणा जी का कहना था कि इनमें बहुत- सी समस्याएं ऐसी हैं जिनका निदान और उपचार सरकार के पास है और बहुत- सी वह हैं जिसके लिए नागरिक जिम्मेदार हैं। बीमारी इतनी आसान नहीं है। खासकर उन परिस्थितियों में जबकि लेखक ही एकमत नहीं हैं, वह भी विभाजित हैं। बहुत से लेखक वामपंथी हैं तो अनेक दक्षिणपंथी हैं।

लेखकों ने किया जन जागरण

 जहां तक लेखकों व्दारा जनता को जागरूक बनाने का सवाल है तो ऐसे लेखक हुए भी हैं जैसे भारतेंदु हरिशचंद्र, नागार्जुन, निराला, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल, मुक्तिबोध, धूमिल, लीलाधर जगुड़ी आदि। इनकी रचनाएं जनसापेक्ष्य हैं। मसलन निराला ने लिखा ’वह तोड़ती पत्थर, देखा मैंने इलाहबाद के पथ पर’, मुक्तिबोध की कविता ’अंधरे में’ का जिक्र किया जा सकता है। इनकी कविताओं में यथार्थ की सत्य घटनाओं का सार्थक काव्य रूपांतर है। इसे रपट कविता या काव्य रिपोर्ताज भी कहा गया है।

कहानियों के जरिए जन जागरण

 जन जागरण के प्रयास कथा कहानियों के माध्यम से भी कम नहीं हुए हैं। विष्णुचंद्र शर्मा की लिखी ’पंचतंत्र’ कथाएं, ईसप की कहानियां, किस्सा तोता मैना आदि को इस संदर्भ में लिया जा सकता है। यहां एक सवाल यह भी उठता है कि आज अधिकांश लेखन पुस्तकों, अखबारों और पत्र पत्रिकाओं के जरिए हो रहा है। इसमें से कितना जनता तक जा रहा है और वह लोगों को किस तरह प्रभावित कर रहा है इसकी पड़ताल होना चाहिए। बहुत सा साहित्य पढ़ा नहीं जा रहा और पढ़ा जा रहा है तो उसे समाज का उच्च तथा मध्यवित्तीय तबका पढ़ रहा है। निम्न वर्गीय लोगों की पहुंच वहीं तक है जितना टीवी दिखाता है और टीवी में क्या दिखाया जा रहा है, उसमें आम आदमी की तकलीफ गायब है।

अनेक पुस्तकें प्रकाशित

 करुणा झा राजबिहार में रहती हैं आपने  बिहार विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एमए किया है। साहित्य, संगीत और कला में गहरी रूचि है। इनकी प्रकाशित पुस्तकों में मैथिली कविता संकलन ’भगजोगनी’, नेपाली निबंध संग्रह ’शंखघोष’, मैथिली लघुकथा संग्रह ’जीवनदान’, हिंदी निबंध संग्रह ’जीवन पथ पर चलते-चलते’, हिंदी कविता संकलन ’बोलना गुनाह है’, मैथिली गजल संकलन ’फाटल हृदय’, हिंदी कविता संग्रह ’पैरों तले चांदनी’ शामिल हैं। आपको अनेक पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है जिनमें हिन्दी सेवा सम्मान (कनाडा), सुलभ हिन्दी साहित्य सम्मान (मलेशिया ), साहित्य सेवी सम्मान (मॉरिशस ), लेडी ऑफ द इयर ( कोलकाता ), हिन्दी भाषा सहोदरी सम्मान (गोवा), नारी रत्न सम्मान (असम), मैथिली भाषा साहित्य सम्मान, शिवदत मिश्र मैथिली साहित्य पुरस्कार, कला संस्कृति सम्मान, मैथिली साहित्य सम्मान, मैथिली लोकसेवा सम्मान, मिथिला रत्न सम्मान, मिथिला विभूति सम्मान, लोकगीत सेवा सम्मान, अटल मिथिला सम्मान आदि शामिल हैं।

करुणा झा की कविताएं

कसम हमें सब नदियों की

गंगा की कसम यमुना की कसम
है कसम हमें सब नदियों की
गर नदियाँ ही न रहीं तो हम
क्या खाक चुनेंगे सदियों की
अविरल निर्मल कलकल पानी
वरदान दिया है नदियों ने
सदियों से हमको पाला है
धन-धान दिया है नदियों ने
है आज लड़ाई जीवन की
मानव निर्मित प्रदूषण की
जो माल बनाने की खातिर
हद लांघ रहे सब शोषण की
बन-बाग उजारे पर्वत के
सब पेड़ उखाड़े पर्वत के
पग-पग पर बाँध बना डाला
सब सार उतारे पर्वत के
कैसे नदियों की आभा हो
जब पथ उनका अवरोधित हो
कंचन सी चमक कहाँ पाएं
जब मिश्रित जल में दूषण हो
इसलिए कसम खानी होगी
चाहे जीवन हानि होगी
हम नदियों को हद-मुक्त करें
धरती को नद से युक्त करें
सभ्यता वहीं है जहां नदी
और नदी जहां है खुशी वहीं
इसलिए खुशी का ध्यान धरो
आओ नदियों का ध्यान धरो
ऋषि-मुनि ही केवल नहीं पात्र
ऋण हम पर भी है नदियों का
जो उऋण होना है हमको
हरना है सब दुःख नदियों का
गंगा की कसम यमुना की कसम
है कसम हमें सब नदियों की
गर नदियाँ ही न रहीं तो हम
क्या खाक चुनेंगे सदियों की।

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खबरिया चैनल

चैनल सभी खबरिया पागल 
अद्भुत, अलग नजरिया पागल 
हल्ला-गुल्ला-हंगामा भर 
करते आठ पहरिया पागल 
युद्धोन्मत्त, उन्मादित करना 
नेता, मंत्री, गड़बड़िया पागल 
शब्दवाण से मिटा रहे हैं 
दुश्मन देश जबरिया पागल 
आत्ममुग्ध, अतिआत्मविश्वासी 
गांव के संग शहरिया पागल 
जनता मरी शहीद हुए सैनिक 
देशभक्ति फुरफुरिया पागल 
डूब रहे हैं पतनशील हो 
दिल में प्रेम लहरिया पागल 
पहलगाम पर ’करुणा’ उपजी 
देखो मजा ’सिंदुरिया’ पागल।

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फकत् इंसान बदला

कुछ नहीं, बदला फकत् इंसान है 
और सबकी जिंदगी हलकान है 
झूठ का परचम हवा में और सच
है सड़क पर ही लहुलुहान है 
यातना-गृह आपने सुंदर बनाया
खिड़कियां हैं और न रोशनदान है
शक्ल-ओ-सूरत से पता कैसे चले 
आदमी है जो भला शैतान है
इस फकीरी की दुहाई दीजिए 
इस फकीरी की अलग पहचान है 
व्यर्थ ’करूणा’ देश की चिंता करें 
व्यर्थ रटना आन-बान ओ शान है।

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सिंदूर की कीमत

सिंदूर की है कीमत सिंदूर की है अस्मत 
सिंदूर की है ताकत सिंदूर की है बरकत 
सिंदूर पोंछने की तुमने जो की है जुर्रत 
सिंदूर ही करेगी बाकी तुम्हारी हजमत 
सिंदूर आव पर है सिंदूर ताव पर है 
सिंदूर आज फिर से अपने शबाब पर है 
मिट जाओगे दरिंदें कट जाओगे परिंदे 
सिंदूर की बगावत हट जाओगे करिंदे 
भारत की आन-बान-शान है सिंदूर समझो 
भारत के सीमाओं की निगेहबान समझो 
आ जाएगी जो खुद पे सबको संहार देगी 
झुक जाओ जो तो अपना सब कुछ निसार देगी सिंदूर की कथा क्या सिंदूर की व्यथा क्या 
सिंदूर है सुरक्षित फिर उसकी दास्तां क्या।