शख्सियत : गीता की तरह एक और दर्शन लेगा जन्म

जनवरी 2026 तक की स्थिति के अनुसार दुनिया के कई हिस्सों में युध्द और सैन्य तनाव जारी हैं। मुझे लगता है कि ऐसे में इस सदी के इसी दौर में गीता की तरह एक और नये दर्शन का जन्म होगा, लेकिन हम कोई भविष्यवक्ता तो हैं नहीं कि इसका ठीक-ठीक समय बता दें!

शख्सियत : गीता की तरह एक और दर्शन लेगा जन्म

कवयित्री डाॅ. राजश्री तिरवीर का कहना

⚫ नरेंद्र गौड़

 ’विश्व की परिस्थितियां हमें बता रही हैं कि राजनीतिक उथल-पुथल, सामाजिक ज्वार-भाटे, धार्मिक अगतिकता, अराजक प्रतिरोध तथा हताश निहिलिज्म के खुरदरे और उबड़-खाबड़ टीले पर ही नये दर्शन, एक समग्र सिध्दांत और विकल्प के कल्पवृक्ष का बिरवा फूटेगा, जिसकी जड़ें अब तक की मानवीय मनीषा में गहरे तक व्याप्त होंगी। मुझे लगता है कि ऐसे में इस सदी के इसी दौर में गीता की तरह एक और नये दर्शन का जन्म होगा।’ 

यह बात कवयित्री डाॅ. राजश्री तिरवीर ने कही। इनका कहना था कि महाभारत युध्द के दौरान जिस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण के मुखारविंद से गीता दर्शन का जन्म हुआ, कलिंग युध्द के बाद सम्राट अशोक के जरिये बौध्द दर्शन का प्रचार प्रसार हुआ और प्रथम,   व्दितीय युध्द के बाद पूंजीवाद का उदय हुआ, ठीक उसी प्रकार आज विश्व अराजकता के जिस मुहाने पर खड़ा है, उससे लगता यही है कि एक और नये दर्शन का अवश्य जन्म होगा।

अनेक देशों के बीच जारी है युध्द

 एक सवाल के जवाब में डाॅ. राजश्री ने कहा कि जनवरी 2026 तक की स्थिति के अनुसार दुनिया के कई हिस्सों में युध्द और सैन्य तनाव जारी हैं, प्रमुख देश जिनमें रूस और यूक्रेन के बीच फरवरी 2022 से चल रहा जो कि 2026 में भी जारी हैं, इसी प्रकार इजराइल और हमास के बीच संघर्ष समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा हैं। साथ ही वेस्ट बैंक में भी इजराइली सुरक्षा बलों और फिलिस्तीनियों के बीच झड़पें बढ़ रही हैं। ऐसे में लगता यही है कि कोई नया दर्शन अवश्य जन्म लेगा, लेकिन हम कोई भविष्यवक्ता तो हैं नहीं कि इसका ठीक-ठीक समय बता दें!

गीता का दर्शन विश्व में सर्वोपरि

डाॅ. राजश्री का कहना था कि गीता का दर्शन स्वयं समझने का सशक्त माध्यम है और यह विश्व में सर्वोपरि है। एक सवाल के जवाब में इन्होंने कहा कि साहित्य को समय काटने का जरिया ही नहीं माना जाए, वरन्  सामाजिक, मनोवैज्ञानिक संरचना को समझने का यह बेहतरीन माध्यम है। साहित्य के माध्यम से हम स्वयं को व्यक्त करते हैं।  इसे पढ़ने से ज्ञान, संवेदनशीलता और तार्किक क्षमता विकसित होती है, चरित्र का निर्माण होता है, भाषा और संचार कौशल में सुधार होता है।

साहित्य से जुड़ना जीवन का दुर्लभ अनुभव

 डाॅ. राजश्री का कहना था कि साहित्य से जुड़ना उनके स्वयं के जीवन का दुर्लभ अनुभव रहा है। इसके माध्यम से इन्होंने अपने ही नहीं वरन आसपास के परिवेश को समझा हैं। सामाजिक मूल्यों, संस्कृति को समझने तथा व्यक्त करने इससे मदद मिली है। भावना साथ छोड़ने लगे तो साहित्य हमें तर्क का रास्ता बताता है।

साहित्य में होंगी नये दर्शन की जड़ें

 एक सवाल के जवाब में इन्होंने कहा कि कठिन से कठिन समय में भी साहित्य हमारा बेहतर मार्ग दर्शक बन जाता है। जिस नये दर्शन की बात कही जा रही है, उसकी जड़ें भी साहित्य की किसी न किसी शाखा प्रशाखा के भीतर होंगी। डाॅ. राजश्री ने स्प्ष्ट किया कि यह कोई आध्यात्मिक भविष्यवाणी या रहस्यात्मक पूर्वाभास नहीं, बल्कि विश्व परिदृश्य के जटिल यथार्थ पर आधारित पूर्वानुमान है और हमें इस नये दर्शन के लिए तत्पर होना चाहिए।

कर्नाटक विवि व्दारा स्वर्ण पदक से सम्मानित

 मराठा मंडल कला और वाणिज्य महाविद्यालय, खानापूर, बेलगांव, कर्नाटक में डाॅ. राजश्री तिरवीर सहायक प्राध्यापक हैं। हिंदी में एम.ए, पी-एच.डी, स्लेट, डी.लिट् कर चुकी हैं। उल्लेखनीय है कि आपको एम.ए. में उत्कृष्ट अंक प्राप्त करने पर कर्नाटक विश्वविद्यालय व्दारा स्वर्ण पदक से सम्मानित भी किया जा चुका है। इनकी प्रकाशित कृतियों की बात की जाए तो समीक्षा ग्रंथ (हिंदी के नाट्य काव्यों में मिथक), एक काव्य नाटक (परित्यक्त लव-कुश) प्रकाशित हैं। इनकी गजलों का संकलन ’चमन- चमन के फूल’ छपा है जिसका सम्पादन नीतू सुदीप्ति ने किया है एवं सुनिल परिट के संपादन में ’हे मेरे नाम’ प्रकाशित हुई है।

अनेक सेमिनारों में प्रपत्र प्रस्तुत

 राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में आलेख और दैनिक समाचार पत्रों में हिंदी, मराठी कविताएं प्रकाशित होती रही है। आपने अनेक राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में प्रपत्र प्रस्तुत किए हैं। काव्य पाठ के लिए 25 से अधिक सम्मान पत्रों से सम्मानित किया जा चुका है। डाॅ. राजश्री रस, छंद और अलंकार जैसी साहित्य की अब अप्रचलित विधाओं को लोकप्रिय तथा जीवंत बनाने का भी प्रयास कर रही हैं। 

डाॅ. राजश्री की कविताएं

गीत (राधिका छंद)

किसने भर दी है गंध हमारे मन में।
छाई है आज उमंग, हमारे तन में।।
अब उसे ढ़ूँढते नैन, कहीं दिख जाये
कह रहे श्रवण आवाज, वही सुन जाये,
दिख रहा उसी का रूप, सभी दर्पन मःें 
छायी है आज उमंग, हमारे तन में।।
हो निशा सुहागिन गयी, उषा शरमायीः
अनुरागों की रागिनी, बड़ी ललचायी।
हैं भरे प्यार के गीत, खुले यौवन में,
छायी है आज उमंग, हमारे तन में।।
पड़ती न चैन दिन में न, नींद रातों में,
सुख मिलता है बस मात्र, उन्हीं बातों में।
ऐसे न जगे थे भाव, कभी बचपन में
छायी है आज उमंग, हमारे तन में
यह ही इस जग में प्यार, कहा जाता क्या ?
हर दिल में यह अहसास, सहा जाता क्या ?
क्या जलती है यह आग, सुधी सज्जन में,
छायी है आज उमंग, हमारे तन में।

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विष्णु पद छन्द आधारित गीतिका

तुम हो जितने मुखर मीत मैं, उतनी शर्मीली।
मैं हूँ सूखी घास फूस तुम, माचिस की तीली।।
तुम फूलों सँग रास रचो मैं, शूलों से खेलूँ, 
तुम हँसते रहते पर मेरी, हैं आँखें गीली।।
करें तुम्हारी सेवा सारे, मेरा शोषण हो, 
तुम सुख से हो लाल लाल मैं, दुख से हूँ पीली।।
तुम्हें बुलाती दुनियाँ कोई- भी न मुझे पूँछे, 
सेज तुम्हारी कोमल है क्या, मेरी पथरीली।।
कैसे मिलन हमारा होगा, जाओ दूर हटो, 
कसी प्यार की डोर उसे मैं, करती  अब ढीली।

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गजल

आती है याद उसकी घुलकर के हिचकियों में
संगीत सुन के थिरकन मचले ज्यों नचनियों में
भगवान को जो जल्दी तुम चाहते हो मिलना
तो वो मिलेगा दलितों दीनों की सिसकियों में
मासूमियत को भी अब कामी न बख्शते हैं,
है डर बड़ा समाया फूलों की किल्लियों में 
बाजारों में भरी हैं पोशाकें सब विदेशी
यौवन प्रदर्शनों की है होड़ युवतियों में
इजहार जिसका पहले ठुकरा दिया था चिढ़कर
उसको ही ढ़ूंढ़ती अब ’तिरवीर’ वीथियों में।

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महाशृंगार छन्द

कहाँ से आती है स्तब्ध, 
प्रेम के गीतों की झंकार,
और छू किसके कोमल अंग,
सुगंधित आती इधर बयार।।
उमड़ती सुषमाओं को घेर,
खड़ा है राजमार्ग पर कौन।
माधुरी जिसकी लगे गुलाम,
देखकर होते हैं सब  मौन।।
मनाने आया है क्या आज, 
मधुरता का सुखमय त्यौहार।
कहाँ से आती है स्तब्ध, 
प्रेम के गीतों की झंकार।।
आज मेरा मन अधिक हताश,
देखकर इसकी सुगठित काय।
निकट से छविदर्शन की चाह,
करो कोई अतिशीघ्र उपाय।।
सहेली होते हैं अवरुद्ध, 
आज मेरी आहों के द्वार।।
कहाँ से आती है स्तब्ध, 
प्रेम के गीतों की झंकार।।