शख्सियत : साहित्य में खेमबाजी के कारण बहुत से रचनाकार चले गए हांशिये पर
⚫ डाॅ. चंद्रकला भागीरथी का कहना
⚫ नरेंद्र गौड़
’’जिसे समकालीन कविता कहा जाता है, उसकी शुरूआत नवें दशक से हुई। आठवें दशक तक सामान्यतः दो काव्य धाराएं थी। इनमें एक प्रगतिशील जनवादी काव्यधारा थी और दूसरी को इसके इतर देख सकते हैं। यह दूसरी धारा अपने को ’प्रगतिशील जनवादी’ कहलाना पसंद नहीं करती थी। जो भी हो साहित्य में खेमेबाजी के कारण बहुत से रचनाकार हाशिये की तरफ धकेल दिए गए।’’

यह बात समकालीन कविता की सशक्त हस्ताक्षर डाॅ. चंद्रकला भागीरथी ने कहीं। इनका मानना है कि समकालीन कविता के मौजूदा दौर में दोनों काव्यधाराएं चुपचाप तरीके से ऐकमेक हो गई हैं। इनमें न तो प्रगतिशील जनवादी कवियों की घोषित प्रतिबध्दताएं हैं और न ही रूपवादी आग्रह। यह स्थिति कुछ
-कुछ नई कविता के पूर्वाद्ध जैसी है जिसमें अज्ञेय, विजय देवनारायण साही, शमशेर, त्रिलोचन और मुक्तिबोध जैसे नितांत भिन्न रंगों और अंदाजे बयां वाले कवि एक साथ ’नये कवि’ में शुमार थे। नई कविता के उत्तरार्ध में नागार्जुन, त्रिलोचन और केदारनाथ अग्रवाल की त्रयी अपने को वैचारिक आधार पर अलगाने लगी थी।
इसके बावजूद विपुल मात्रा में सृजन
डाॅ. चंद्रकला का कहना था कि श्रमिक वर्ग के प्रति गहरी संलग्नता, उनके वर्ग संघर्ष को उभारना और प्रतिरोध आंदोलन की पैरोकारी प्रगतिशील जनवादी कविता की विषय वस्तुगत अभिलाक्षणिकाएं थी। इसने कविताओं के प्रस्तुति विधान, शब्दावली और भंगिमाओं को प्रभावित किया था। इस धारा के अंतर्गत विपुल मात्रा में काव्य सृजन हुआ। इसकी सीमाओं पर भी उंगली रखी गई। यह पाया गया कि ऐसी बहुतेरी कविताएं कृत्रिम, सूत्रबध्द अथवा ’लाउड’ हैं। इस बीच सोवियत संघ का पतन हुआ और कवियों के प्रिय यूटोपिया पर विराट प्रश्नचिन्ह लग गया। समकालीन कविता में इस पूर्ववर्ती के सबक परिलक्षित होते हैं। ऐसा नहीं है कि इधर श्रमिक वर्ग पर कविताएं नहीं लिखी जा रहीं, बल्कि पूंजीवादी तर्ज पर हो रहे विकास से उत्पन्न विस्थापन और आर्थिक भूमंडलीकरण की परिणिति के रूप में विपन्न तबकों के हाशियाकरण पर कवियों ने मार्मिक और उल्लेखनीय कविताएं लिखी हैं।
दलित और आदिवासी प्रतिरोध
डाॅ. चंद्रकला ने एक सवाल के जवाब में कहा कि समकालीन कविता में सबसे उव्देलनकारी चिंतनधाराओं में दलित और आदिवासी प्रतिरोध तथा स्त्री प्रश्न हैं। यद्यपि इन धाराओं की चिंतन सारणियां अभी समस्यामूलक हैं किंतु विकास की प्रक्रिया में हैं। चूंकि इन पर सर्वाधिक विमर्श होता है इसलिए यहां इनके विस्तार में जाना बेकार है। उल्लेखनीय है कि हिंदी पट्टी में पहली बार दलित आदिवासियों ने सृजन विधाओं में अपने को अभिव्यक्त किया है और महिलाओं ने खुद को अपेक्षाकृत अधिक मुखरित किया है।
विगत 25 वर्षों से लेखन
15 अक्टूबर 1970 को धामपुर जिला बिजनौर उत्तरप्रदेश में जन्मी डाॅ. चंद्रकला इन दिनों धामपुर में निवास कर रही हैं। इन्होंने एमए, पीएचडी किया है और विगत 25 वर्षों से लेखन कार्य कर रही है। गद्य तथा पद्य दोनों विधाओं में इनका समान अधिकार है। आप शिक्षक हैं और समाजसेवा के कार्यों से भी जुड़ी हुई हैं। लेखन के साथ ही गायन, वादन, नृत्य तथा चित्रकारी में भी इनकी गहरी रूचि है।
प्रकाशित रचनाएं
डाॅ. चंद्रकला की अभी तक पांच पुस्तकें प्रकाशित होकर चर्चित हैं। इनमें जीवन की पुष्पवाटिका, कलयुग का जीवन, भक्ति रस में ईश्वर दर्शन, गीतों के रंग भागीरथी के संग, चंद्रिका काव्यांजलि शामिल हैं। इनके अलावा इन्होंने चार किताबों का संपादन भी किया है। इनकी रचनाएं लगभग 70 साझा संकलनों में शामिल हो चुकी हैं। वहीं लगभग एक हजार रचनाएं विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं तथा ई पत्रिकाओं में छप चुकी हैं। आपको अनेक पुरस्कारों से राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं व्दारा नवाजा जा चुका है। आपको विभिन्न प्रकार के लगभग एक हजार पुरस्कार राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर के 12 सेमिनारों में मिल चुके हैं।
डाॅ. चंद्रकला की चुनिंदा कविताएं
नारी के स्वयं वचन
मैं एक नाजुक कली थी
जब माँ बाप की गोद में पली थी
प्यार और संस्कार से सिंची गई थी
जब मैं धीरे-धीरे फूल बनी।
किसी और की बगिया में खिली
पूरी बगिया और माली को महकाया
पर पता न था ये चमन कब तक सजेगा।
कब तक इस बगिया में खिलुंगी
दहेज के लोभियो ने कुचला जला कर मारा
लव जेहादी भौरे ने काटा टुकड़े कर
मुझे संदूक में, फ्रिज में रख जंगल में फेका।
मैं तो एक परिवार को महका
दूसरे को महकाने आई थी
अपनी खुशबू, प्रेम से ये सृष्टि
संसार को चलाने आई थी।
पर कुछ राक्षसों ने मेरी कद्र न जानी
मेरी सुंदरता मेरी पवित्रता मेरे
अस्तित्व को नश्ट किया
किसी ने तो मुझे धरा के
गर्भ में ही मिटाया।
मेरी आत्मा रोई क्यों ईश्वर तूने
मेरी रचना कर इस मृत्यु लोक में सजाया
पर कहीं कहीं मैने हार न मानी।
तेरी दी हुई शिक्षा, आंतरिक शक्ति
और गुणों के ज्ञान से मैंने इस धरा के
हर कोने पर अपनी छाप छोड़़ी
मुझे भी मां दुर्गा लक्ष्मी सरस्वती की
तरह हमेशा याद किया जाएगा।
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प्यार भरा माँ का आँचल
जन्म लेते ही बच्चा जब
छिपता माँ के आँचल में
पालन पोषण करती माँ
ममत्व छिपा माँ के आँचल में।
कभी बच्चे को कोई कष्ट न हो
किसी की बुरी नजर न लगे
हर दुख कष्टों की धूप से
बचते बच्चे माँ के आँचल की छाँव में।
बच्चों को जब स्कूल छोड़ने जाती
तेज धूप से माँ है बचाती
वर्षा भी गर आ जाए
हम बचते माँ के आँचल की छाव में।
जब बच्चा बड़ा हो जाता
काम से थका हारा घर में आता
पसीना पौछता माँ का आँचल
रक्षा, सुरक्षा की शक्ति है माँ का आँचल में।
प्यार दुलार विश्वास का दर्पण
प्रेम, त्याग, दया, ममत्व का समर्पण
सब पाओगे माँ के आँचल में
इस आँचल से बड़ा नहीं कोई सुख
निस्वार्थ ममत्व भाव समाया माँ के आँचल में।
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ईश्वर में विश्वास की एक ज्योति
एक कदम तुम चलो
एक कदम हम चले
सही लक्ष्य मिल ही जायेगा
कांटों की फितरत है चुभना
कष्टों की फितरत है डराना
मन को मजबूत कर
दृढ़ लक्ष्य को अपनाना
एक दूजे का हाथ पकड़
हमें आगे ही बढते जाना।।
जब अन चाहे अनजाने कष्ट
जीवन में आ जाते हैं
बड़े बेरहम बड़ा बेदर्द देकर
हमें बहुत डराते सताते हैं।
मौत को बहुत नजदीक से
महसूस करते भय से
कुछ क्षण सुन्न पड़ जाते हैं।
बस एक विश्वास की डोर
जब ईश्वर से जुड जाती है।
तो अपने सभी साथ निभाते हैं।
वो कष्ट भरा मंजर भी बीत जाता
जब ईश्वर के चरणों में हम
समर्पण कर जाता

Hemant Bhatt