शख़्सियत : ख़तरों का सामना करती रही है अभिव्यक्ति की आज़ादी

आज हर वह रचनाकार, कलाकार जो सच को अपनी अन्तर्वस्तु बनाना चाहता है, उसे अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। वह चाहे वास्तविक अर्थों में भूमिगत भले ही न हो निर्वासित सा ज़रूर महसूस करेगा, अन्यथा आत्म निर्वासन की यातना भोगेगा।

शख़्सियत : ख़तरों का सामना करती रही है अभिव्यक्ति की आज़ादी

कवयित्री अनीता चमोली का कहना

⚫ नरेंद्र गौड़

अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने की क्षमता मनुष्य को प्रकृति से मिली है। यदि यह क्षमता नहीं होती तो उसका जीवन निरर्थक बनकर रह जाता, लेकिन अभिव्यक्ति की यह आज़ादी सदियों से अनेक ख़तरों का सामना करती रही है। अपने को अभिव्यक्त करने की वज़ह से ही सुकरात को ज़हर पीना पड़ा था। आज भी अभिव्यक्ति की आज़ादी अनेक ख़तरों का सामना कर रही है।

रचनाकार अनीता चमोली

यह बात जानीमानी कवयित्री अनीता चमोली ने कही। इनका कहना था कि मनुष्य को भाषा आसानी से नहीं मिली है। इसने कई पड़ाव पार किए हैं, तब कहीं जाकर भाषा का विकास हो सका, लेकिन कहने की आज़ादी को हमेशा ख़तरों का सामना करना पड़ा है। राजशाही के दिनों सत्य बोलने वालों को न केवल जेल में डाल दिया गया था, वरन् उनकी हत्या तक कर दी गई।

अभिव्यक्त के बिना मनुष्य नहीं रह पाता

आज जबकि देश आज़़ाद है, लेकिन फिर भी सही बात कहने की वज़ह से अनेक लेखक, पत्रकार और बुध्दिजीवी उत्पीड़न का सामना कर रहे हैं। सही बात कहने के कारण तुलसीदास, मीरा, कबीर, नानक, संत रैदास को भी विरोध का सामना करना पड़ा था, जबकि भावना साथ छोड़ने लगे यानी हताशा गहराने लगे तब मनुष्य को तर्क का सहारा लेना पड़ता है। ऐसे में वह स्वयं को अभिव्यक्त किये बिना नहीं रह पाता है। कहना न होगा कि इसी अभिव्यक्ति के कारण हज़ारों लोगों को मौत का सामना करना पड़ा।

अभिव्यक्ति पर हमला करता है फ़ासिज्म

एक सवाल के जवाब में अनीता का कहना था कि फ़ासिज्म सबसे पहले अभिव्यक्ति पर हमला करता है। आज हर वह रचनाकार, कलाकार जो सच को अपनी अन्तर्वस्तु बनाना चाहता है, उसे अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। वह चाहे वास्तविक अर्थों में भूमिगत भले ही न हो निर्वासित सा ज़रूर महसूस करेगा, अन्यथा आत्म निर्वासन की यातना भोगेगा। उसके सामने आत्म निर्वासन का रास्ता सच को कहने का साहस चुक जाने के हाल में है। अभिव्यक्ति का संकट वहीं झेलता है जो बोलता है और सच बोलता है।

कविता के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह

आज कविता के भविष्य पर भी प्रश्नचिन्ह लगाये जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि कविता मर चुकी है। वहीं कथाकार निर्मल वर्मा ने तो यहां तक कह दिया था कि कहानी मर चुकी है, लेकिन सभी जानते हैं कि ऐसा हुआ नहीं। न कविता मरी और न कहानी का अंत हुआ। एक से बढ़कर एक कवि और कथाकार सामने आ रहे हैं। साहित्य अर्थात् अभिव्यक्ति का कभी अंत या समापन नहीं होगा। अभिव्यक्ति के तमाम ख़तरे उठाकर भी साहित्य सृजन हो रहा है। इस प्रकार की उक्तियां महज चैंकाने के लिए गढ़ी जा रही हैं।

प्रासंगिकता पर विचार करती है कविता

एक सवाल के जवाब में अनीता का कहना था कि हर दौर की कविता एक बार ठहरकर अपनी सार्थकता और प्रासंगिकता पर नये सिरे से विचार करती है और फिर अपना रूप तथा काव्य तेवर समयानुकूल परिवर्तन कर आगे बढ़ती है। अंग्रेजी कविता में तो हर दशक के बाद कविता की ज़रूरत पर गंभीरता से विचार हुआ है। हिंदी के विगत दो तीन दशक की कविता में कवियों ने कविता पर सर्वाधिक लिखा है। और सुखद यह है कि इनमें कविता पर उनकी और गहरी आस्था व्यक्त हुई है।

अनेक संगोष्ठियों में प्रतिभागी

पौड़ी गढ़वाल उत्तराखंड के ग्राम अरोटा, पोस्ट देहलचांैरी पट्टी रावतस्यूं में स्व. श्री प्रेमलालजी बमराड़ा और स्व. श्रीमती सुबुध्दि देवी के यहां जन्मी अनीता जी ने हिंदी साहित्य में एमए किया है। लिखने की प्रेरणा इन्हें अपने पति श्री सुधीर चमोली से मिली। आप इन दिनों देहरादून में रहते हुए स्वयं का व्यवसाय कर रही हैं। आप 15 सेमिनार और 35 काव्यमंचों से रचनापाठ कर चुकी हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में कविताओं का प्रकाशन होता रहा है। कविता संकलन ’सृजन’ तथा कहानी संकलन ’गुलमोहर’ प्रकाशनाधीन हैं।

अनीता चमोली की कविताएं

रूप और गुण का संवाद

रूप इतराकर बोला गुण से 
मैं तुमसे धनवान बड़ा
मेरे सामने तुझे कोई न पूछे 
जीवन मुझसे है हरा, भरा 
चैन चुराऊं चंचल मन का 
मुझ में जो खो जाता है 
नजर भर के कोई देख ले मुझको 
वो मेरा हो जाता है 
गुण ने देखा रूप चकोर को 
और प्यारी सी बात कही
समय का असर जब तुम पर होता
दिखते तुम फिर कहीं नहीं
चित चुराऊं न में चंचल
मैं तो रूह में समाता हूंँ
जब भी तू होता है फीका
तब में ही रह जाता हूँ
तू नैनों को धोखा देकर 
हर मन को छल जाता है
मुझको जो कोई भी पा ले
वो जीवन भर मुस्काता है।

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सीखो

देश को यदि बचाना है तो 
वोट का अधिकार अपनाना सीखो 
भ्रष्टाचारी सब हट जाएंगे 
देशभक्तों को पहचाना सीखो 
मुफ्त़ की सुविधाओं का 
लालच त्याग कर 
मेहनत से कमाना सीखो 
फंसो न इनके झूठे वादों में 
दोगला चरित्र इनका जानना सीखो
धर्म के नाम पर बांट रहे हैं
तुम संविधान की मानना सीखो 
अपनी एकता के बल पर 
तख्त़ इनका पलटाना सीखो 
लूट रहे हैं मिलकर देश को
इनसे देश बचाना सीखो 
राजनीति की अंधी गलियों में
क्रांति की ज्योति जलाना सीखो।

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वक्त़ ने थामा हमको

वक्त़ ने थामा हमको
और वक्त ही  ने हमको  घेरा है 
वक्त हो जाए जिस पर मेहरबाँ
वो कहे वक्त मेरा है
वक्त ना होता सगा किसी का 
ये सच सबको डराता  है  
भूत भविष्य और वर्तमान में
ये हम सबको उलझाता है 
राजा से कब रंक बना दे 
कितने रंक  राजा बने यहां
जो भी इसके साथ है चलता
जीता है उसी ने सारा जहां  
जो कद्र करे ना इसकी 
ये भी उसको ठुकराता है  
दर-दर की वो खाता ठोकर 
ये खून के आंसू रुलाता है   
कभी हंसाता कभी रुलाता
अपना हर रूप दिखाता है   
वक्त ही देता है जख्म हमें 
ये खुद ही जख्म भर जाता है  
रूकता किसी के लिए नहीं वक्त 
बिना रुके चलते जाता है 
चलते- चलते बदलता है वक्त 
इसकी गति संग जमाना ढल जाता  है   
समझो  वक्त की चाल सदा 
वक्त हमें समझाता है 
जो समझा वो खुश रहता है 
जो ना समझे दुःख पाता है।

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कौन से राम?

जिस राम को जगत में पाया मैंने
वो तो करुणा के सागर हैं
मुस्कान है जिनके अधरों पर
दया से भरे वो गागर हैं
कंचन सी है उनकी काया
करते कभी न तांडव हैं
क्षमादान करने वाले राम 
ऐसे गुणों के मानव हैं
पर सोचती हूँ 
कौन हैं वे राम
जिन्होंने धनुष उठाया था
धर्म बचाने के खातिर
राक्षसों को मार गिराया था
दिल में बसे वे कौन से राम हैं
जो जंगल के वासी थे
शरीर था जिनका वज्र के जैसा
जो लंका के बने अधिशासी थे
जानूँ मैं न केवल उस राम को
जिनके अधरों पर मुस्कान बसी
जानूँ मैं उस वीर राम को भी
जिसने अहंकार तोड़ने हेतु
सागर को दी थी धमकी
क्षमा-दानी कोई न उनके जैसा
सुना है मैंने कथा व्यासों से
पर जिस राम को जाना हृदय ने 
उन्होंने क्षमा न दी रावण को
हरे प्राण अथक प्रयासों से
आशा है, मैं बन पाऊँ वो राम
जिससे जग ने हमें मिलाया है,
पर कठिन है बन पाना उस राम जैसा
जिसे अंतरमन ने दरसाया है
क्या कोई बन पाएगा वह राम 
जिसने पिता का वचन निभाया था
ठुकराकर अपने राजपाट को
जीवन में संघर्ष अपनाया था
क्यों मन के मंदिर में हम
कोमल राम की छवि बसाते हैं?
वनवासी राम के पैरों में पड़े छाले
हमसे क्यों छुप जाते हैं?
क्यों दिखते हैं कोमल हाथ सदा
जो आशीष देने को खड़े
पर छुप गए नजरों से वे छाले
जो संघर्ष मे,भरण-पोषण हेतु पडे़
अधूरा ज्ञान, अधूरा मिलन 
हमें राम से कैसे मिलवाएगा?
देख न पाएँ यदि संघर्ष राम का,
तो वो राम हमें
संघर्ष करना कैसे सिखलाएगा?

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कान्हा-कान्हा रटते

कान्हा-कान्हा रटते-रटते
तुमसे मैं हृदय लगा बैठी 
दिल के अंधियारे कोने में 
तेरे नाम का दीप जला बैठी 
जीवन का तू हिस्सा बन जा 
मैं तुझमें ही  समा  जाऊं
अब तो हाथ पकड ले मेरा
तू ही बता मैं कहाॅं जाऊं।