शख्सियत : परिवेश से अछूता नहीं रह सकता लेखक का रचना संसार

कुल्लू हिमाचल प्रदेश में जन्मी मंजूषा जी राजनीति शास्त्र में एमए कर चुकी हैं। अनेक संयुक्त संकलनों में कविताएं प्रकाशित हैं जिनमें ’सिर्फ तुम’, ’सारांश समय का’, ’कविता के रंग’, ’काव्यशाला’ प्रमुख हैं।वहां आज भी लोग जादू टोना सहित कई अंध विश्वासों के शिकार हैं। इस प्रदेश के लोगों की आय का बहुत बड़ा हिस्सा पर्यटन है।

शख्सियत : परिवेश से अछूता नहीं रह सकता लेखक का रचना संसार

कवयित्री मंजूषा नेगी का कहना

⚫ नरेंद्र गौड़

’लेखक भले ही वह कवि, कहानीकार, उपन्यासकार, नाटककार ही क्यों न हो, अपने परिवेश को अनदेखा नहीं कर सकता। वह बार बार उस शहर, गांव, कस्बे की तरफ लौटता है, जहां उसका जन्म हुआ। यही स्मृतियां उसकी रचना को धारदार और मजबूत आधार भी प्रदान करती हैं। यदि पड़ताल की जाए तो भारत ही नहीं विश्व साहित्य का बहुत बड़ा हिस्सा ’नॉस्टेलजिया’ की उपज है।’ रचनाकार के रचनाकर्म व शब्द-संपदा में परिवेश सदा मुखरित होता है । परिवेश आत्यंतिक कोमलता है, भावनात्मक जुड़ाव है, इससे कोई भी रचनाकार अछूता कैसे रह सकता है, कविता तो फिर अधूरी है।’

हिंदी कविता की सशक्त हस्ताक्षर मंजूषा नेगी

यह बात हिंदी कविता की सशक्त हस्ताक्षर मंजूषा नेगी ने कही। इनका जन्म हिमाचल प्रदेश के खूबसूरत शहर कुल्लू में हुआ, वहां के बर्फ से ढ़के पहाड़, नदियां, झरनों की तरफ अनेक रूपों में इनकी कविता लौटती है। कुल्लू मनाली का नाम सुनते ही लोग रोमांचित हो उठते हैं, ऐसे में भला इनकी कविताएं वहां के देवदार, चीड़, कैल, ओक और स्प्रूस जैसे वृक्षों के सघन और आत्मीय संसार से भला कैसे अछूती रह सकती हैं। आप पहाड़ों से सम्बन्ध रखती हैं। प्रकृति इनका घर है यही बात प्रेरणा की तरह इनके भीतर आत्मसात रही। हिमाचल जैसे खूबसूरत पहाड़ी राज्य में जन्म होना प्रकृति के सानिध्य में जीवन जीना, इसे अपना परम सौभाग्य मानती हैं। 

पहाड़ों का संघर्ष भरा जीवन

ऐसा नहीं कि हिमाचल प्रदेश में सिर्फ प्राकृतिक सौंदर्य ही है। वहां के गरीब लोगों का जीवन बहुत संघर्ष से भरा है। महिलाओं को जलावन की लकड़ियां और पशुओं के लिए चारा लेने ऊंचे पहाड़ों की चढ़ाई चढ़ना पड़ती है। वहां आज भी लोग जादू टोना सहित कई अंध विश्वासों के शिकार हैं। इस प्रदेश के लोगों की आय का बहुत बड़ा हिस्सा पर्यटन है।

बात अगर कविता की करें

कविता उस फूल के आन्तरिक सौंदर्य की तरह है जो बाहर की तरफ खिलता है आभा में जो दिव्य है। हर क्षण अनुभूतियों का जीवंत रूप है जिसे कविता पूर्ण  और परिपक्वता से स्वीकार करती है । आज की कविता इस क्रूर समय में संवेदनशील उपस्थिति है जिसकी परिधि में असंख्य उपमाएं हैं शिथिलता से बचने के लिए। आज कविता प्रगाढ़ रूप से चेतना के पुनर्जागरण के लिए उस समय उस जगह पर आ चुकी है जहां जिम्मेवारी वहन करने के लिए कवि को तन्मयता से तैयार होना चाहिए। मानवीय मूल्यों को कविता ने हमेशा आत्मसात किया है। सर्वदा जीवन का बोध होता रहे इससे बड़ी विडम्बना की बात क्या है यहां कविता ही तो है दस्तक देती हुई मानवता और उसकी जिजीविषा के प्रति। रचनाकर्म शब्द भाषा विकट की तरह उपस्थित न होकर संबल होनी चाहिए। कविता की ऐसी विस्तृत गहन परिपाटी हैं, जहां विभिन्न आयाम हैं वहीं वहाँ मनुष्यता के लिए उसकी विशिष्टता भी है।

अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन

कुल्लू हिमाचल प्रदेश में जन्मी मंजूषा जी राजनीति शास्त्र में एमए कर चुकी हैं। अनेक संयुक्त संकलनों में कविताएं प्रकाशित हैं जिनमें ’सिर्फ तुम’, ’सारांश समय का’, ’कविता के रंग’, ’काव्यशाला’ प्रमुख हैं। साथ ही साहित्य एवं सांस्कृतिक पत्रिका ’विश्व हिंदी साहित्य’, ’हरिगंधा’, ’परिंदे’, ’एहसास की उड़ान’, ’गर्भनाल’, ’अमर उजाला’, ’रूपायन’, ’अनहद कोलकाता’, ’आवाज प्लस’, ’व्यावहारिक आध्यात्म’, ’हिमतरू’, ’उत्कर्ष मेल’, ’आगमन एक खूबसूरत शुरूआत’, ’सारा सच’, ’लेखनियां’, ’वेव खबर’, हिमाचल प्रदेश संस्कृति विभाग की पत्रिका विपाशा, हरियाणा साहित्य अकादमी की पत्रिका हरिगंधा आदि में कविताएं प्रकाशित होती रही है।

मंजूषा नेगी की कविताएं


हम जीवित हैं

हवाएं सरसराती हुई 
देह में इस तरह प्रवेश करती हैं 
जैसे जीवन की शेष बची सांसों के 
चक्रव्यूह का भेद जानना चाहती हों
भावनाओं का कोई मोल नहीं 
बेझिझक निःसंकोच कह रहे हैं सब 
बंद करो ये रोने का नाटक 
इस खारे पानी का किसी के लिए 
कोई महत्त्व नहीं 
रात के चिरागों में उदासियां बहुत हैं 
सुबह का निकला वो पंछी घर 
लौटने का रास्ता भटक गया है 
कहीं गुम हो गया है तमस में 
नितांत अकेला जीवन यापन कैसा 
वियाबान जंगल में डेरा डाला 
या अपनों का मातम मानना नहीं आया 
ईश्वर को प्राप्त करने की इच्छा में 
कभी खुद को भी ढूंढ पाओगे  
बहुत शोर है अनर्गल बातों का 
इस घुलते जहर से हवाएँ भी 
रूष्ट हो गयी हैं 
ढूंढ रही है पैनी निगाह से मूक 
बधिरों को 
आसमान बोलता है--
ऐ जमीन वालों, 
तुम जीने का सबक कब सीखोगे 
कब तक मेरे कांधे पर निकले सूरज  
को अपने जीने की वजह बनाओगे।

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पहाड़ की चिड़ियां 

पहाड़ की चिड़ियों ने 
गाना छोड़ दिया 
हमने भी उन्हें मनाना छोड़ दिया
मोड़ दिया रास्ता स्वप्न का  
प्रेम का 
तोड़ दिया प्रेमी हृदय 
भरता हुआ आदमी अब रीतता है 
कैसे कैसे समय बीतता है 
कुरुक्षेत्र का भाग जहां 
जहां महाभारत का परचम हो 
देखें वहां कोई कैसे जीतता है।

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स्वर्णिम मुखों की स्वर्णिम परम्परा

स्वर्णिम मुखों की स्वर्णिम परंपरा 
लोक गाथाओं में बैभव का गान 
देवताओं के उत्सवों में पिशाचों की 
टोली और आचारहीनता की धूम
दुर्गा के प्रहारों से बचते 
दुर्ग की भयावह हंसी   
जलतत्व नष्ट होने पर कमंडल में 
रखा जल अभी भी पवित्र है   
देवीयलोक की अविश्वसनीय सी 
बहुधा बातें मेरे घर के पास ही हो रही हैं 
रहस्य्मयी कथा का सारा वृत्तांत 
सब के सर माथे मढ़ा जा रहा है 
पुरुष गुपचुप बैठे बीड़ी सुलगाते हुए 
हर बात में सर हिला कर हामी भरते हुए 
बीच बीच में स्त्रियों को भी बीड़ी पकड़ा देते हैं 
एक दीर्घा में खड़े इन पहाड़ों के 
ठेठ रिवाजों के मुताबिक स्त्रियां 
अमानुष सी लगती हैं 
चिलम हुक्का बीड़ी पीने की शौकीन 
घोर परिश्रम से घिरी ये लौंग 
गोखरू चांदी के चन्द्रहार बड़े 
चाव से पहनती  हैं 
देवीय प्रकोप या माता निकलने पर 
झाड़ फूंक भी करवाती हैं 
रख रखाव असंभव है
रजस्वला स्त्रियां 
कहीं पांव नहीं धरती
चूल्हा चौका, आंगन, मंदिर घर व्दार
सब निषेध हो जाता है
पुरूष के वर्चस्व झूठे अभिमान
उद्दंडता के स्वरूप 
गाय भैंसों के साथ वाले कमरे में
ये भी रख दी लाजी हैं
उन पांच दिनों वाली अछूत गाय
लोकलाज की आशंका से परे
पुरूष निर्विघ्न दूसरी स्त्री के साथ
सोने को कामातुर रहते हैं
संकरी नदी के किनारे 
जन्म लेती कहानियां
पानी का शोर और घराटों में
चलती चक्की के बीच पिसती
कणक का दर्द कौन जानता है?
जाने भी क्यों?
प्रकृति दिलफेंक है यहां
विद्रोह की परिभाषा नई और
रूदन का सिस्टम निठल्ला है
आकाश बहुत सारे हैं
सब उड़ जाते हैं और
कंक पंख पसारे विराजती है
शमशानों में।

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कितनी खामोशियां

अंदर कितनी ही खामोशियां पलती गयी
आँखों में दर्द का समंदर पर मैं जलती गयी 
साथ होने को बस एक मेरा साया ही था 
मैं अकेली ऐसी कितनी राह चलती गयी 
अधखुले नैनों में टूटे ख्वाबों की किरचें थी
सहर होते ही उन आँखों को मलती गयी

रोज एक दिन चढ़ा और उतरा मेरे आंगन में 
कुछ इस तरह से मेरी शामें भी ढलती गयी
घडी भर को आसमान में नजरें जो टिका दी 
कितनी ही उम्मीदें मेरा दामन छलती गयी
अतीत की रख फैल गयी पानियों में इस तरह 
यादों की धुंधली सतह खुद बखुद जलती गयी 
ये अधूरापन ही मुझे रास आने लगा था मगर   
दर्पण में देखा जाने क्यों कमी कोई खलती गयी।