तपती रात, बुझती रोशनी और आधी रात के बाद तक जागती हुई जनता

तपती रात, बुझती रोशनी और आधी रात के बाद तक जागती हुई जनता

आउटसोर्स कर्मचारी के भरोसे विद्युत वितरण कंपनी

⚫ नागरिक ने किया चक्का जाम

⚫ रात को 5:30 घंटे तक परेशान होते रहे बच्चे, बुजुर्ग और जवान

⚫ 8 दिन से थी समस्या फिर भी नहीं जागे जिम्मेदार

हरमुद्दा
रतलाम, 12 मई। सोमवार रात्रि के लगभग आठ बजे का समय…आकाश से दिनभर बरसी अग्नि अब भी धरती की दीवारों में धधक रही थी। सूरज की गर्मी सहने वालों के अनुसार 46 डिग्री तापमान से झुलसा शहर रात में भी राहत का स्पर्श नहीं पा सका था। घरों की छतें अंगार बनी हुई थीं, गलियों में गर्म हवाएँ बह रही थीं और उसी बीच अचानक अंधकार ने पूरे क्षेत्र को अपनी गिरफ्त में ले लिया।

पंडित दीनदयाल नगर के सेक्टर A, B, C और D में बिजली बार-बार आने-जाने के पश्चात अंततः पूर्णतः बंद हो गई।  दीनदयाल नगर पंचमुखी हनुमान जी मंदिर के समीप स्थित डीपी में फॉल्ट उत्पन्न हो गया, जिसके कारण ट्रांसफार्मर ने कार्य करना बंद कर दिया। परंतु उससे भी अधिक चिंताजनक विषय यह रहा कि घंटों तक समस्या का समाधान नहीं हुआ। क्योंकि जिम्मेदार वितरण कंपनी आउटसोर्स कर्मचारी के भरोसा ही चल रही है। उन्होंने 2 घंटे बाद हाथ नीचे कर दिए। कहने लगे अब यह कार्य तो सुबह ही होगा। पार्षद पति कृष्णा संगीता सोनी ने विद्युत मंडल के अधिकारियों से चर्चा की। 

सभी नजर आए असहाय

बच्चों की बेचैनी, बुज़ुर्गों की व्याकुलता और महिलाओं की असहाय प्रतीक्षा सोमवार की अंधेरी रात में स्पष्ट दिखाई दे रही थी। कई घरों में भोजन तक नहीं बना था। बिजली के बिना घर केवल मकान रह जाते हैं — जहाँ न हवा का सहारा होता है, न पानी का भरोसा और न ही जीवन की सामान्य गति।

अव्यवस्था की विरुद्ध आक्रोश

धीरे-धीरे लोगों का धैर्य टूटने लगा। वह पीड़ा, जो वर्षों से उपेक्षा के नीचे दबाई जा रही थी, सड़क पर उतर आई। तब जाकर परेशान लोगों ने अपना आपा खोया और चक्का जाम किया। आम जनता का यह आक्रोश केवल बिजली कटौती के विरुद्ध नहीं था, बल्कि उस अव्यवस्था के विरुद्ध था जो शिकायतों को तब तक अनसुना करती है, जब तक जनता सड़कों पर उतरने को विवश न हो जाए। जबकि लगभग एक सप्ताह से विद्युत सप्लाई बाधित हो रही थी वोल्टेज कम ज्यादा हो रहा था फिर भी इस और ध्यान नहीं दिया गया। गर्मी का तापमान बड़ा और डीपी ने काम करना बंद कर दिया। 

रात 1:00 के बाद भी कुछ सप्लाई शुरू, कुछ फिर भी

स्थिति तब बदली जब पुलिस पहुँची, अधिकारी सक्रिय हुए और तत्पश्चात डीपी बदलने की प्रक्रिया प्रारंभ करने की बात कही गई। 8:00 बजे डीपी में विस्फ़ोट हुआ था मगर जिम्मेदार अधिकारियों को कोई फिक्र नहीं थी। विद्युत सप्लाई ठप होने के तकरीबन 4 घंटे बाद क्षेत्र के जिम्मेदार इंजीनियर ने पार्षद पति को आश्वस्त किया कि डीपी निकल चुकी है। क्रेन की व्यवस्था हो रही। 15:20 मिनट बाद डीपी आई फिर क्रेन भी मौके पर पहुँची, मशीनें भी आईं, आश्वासन भी दिए गए। कहा गया था कि 1 घंटे में काम हो जाएगा, मगर उसमें भी 2 घंटे लग गए। रात के बाद 1:00 बजे के बाद कुछ विद्युत सप्लाई शुरू हुआ और कुछ फिर भी बंद था।

क्या जिम्मेदार विरोध की भाषा समझते

परंतु इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा प्रश्न छोड़ दिया, क्या प्रशासनिक तंत्र अब केवल विरोध और अवरोध की भाषा ही समझता है? यदि नियमित मेंटेनेंस होता है, तो फिर हर हल्की हवा में बिजली व्यवस्था क्यों चरमरा जाती है? यदि विभाग सजग है, तो जनता को बार-बार सड़क पर उतरने की आवश्यकता क्यों पड़ती है?

तकनीकी विफलता नहीं अपितु तो संवेदनहीन कार्य प्रणाली का परिणाम

यह केवल तकनीकी विफलता नहीं, बल्कि संवेदनहीन कार्यप्रणाली का दर्पण है। क्योंकि जब तक जनता शांत रहती है, समस्याएँ फाइलों में बंद रहती हैं; और जब जनता सड़क पर आती है, तभी व्यवस्थापकों की नींद खुलती है। जिला प्रशासन के कोई भी जिम्मेदार अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचे, वह तो एसी की ठंडी हवा में आराम फरमा रहे। जिले की जिम्मेदार अधिकारियों का तो एक ही मूल मंत्र है "आग लगे बस्ती में हम हमारी मस्ती"। 

व्यवस्था की वास्तविक परीक्षा वातानुकूलित कार्यालयों में नहीं, बल्कि उन अंधेरी गलियों में होती

दीनदयाल नगर की यह रात केवल बिजली गुल होने की घटना नहीं थी, बल्कि उस मौन पीड़ा का प्रतीक थी जिसे आम नागरिक प्रतिदिन सहने को विवश है। तपती रात में बुझी हुई रोशनी ने यह स्पष्ट कर दिया कि व्यवस्था की वास्तविक परीक्षा वातानुकूलित कार्यालयों में नहीं, बल्कि उन अंधेरी गलियों में होती है, जहाँ आम आदमी अपने अधिकारों के लिए आज भी संघर्ष कर रहा है।