विचार सरोकार : मधु किश्वर की मति कथा

ज्योतिषीय घोषणाएं 2027 के आसपास बड़ी सियासी उथल पुथल और मोदी के बैराग्य की बात कहती हो, लेकिन हम चाहते हैं मोदी अपने समापन के पहले अपना विश्व रूप अवश्य दिखाए ताकि इतिहास याद रखे महापुरुष केवल उदार ही नहीं होते वो भयंकर और प्रचण्ड भी हो सकते हैं।

विचार सरोकार : मधु किश्वर की मति कथा

⚫त्रिभुवनेश भारद्वाज "शिवांश"

अत्यधिक उदारता के परिणामों को समझाते हुए, यह नीति श्लोक न केवल प्रश्नवाचक है बल्कि अनुकरणीय भी है -
अतिदानद्बलिरबन्धो  ह्यतिमन्नाद्
सुयोधन।
सर्वत्र प्रतिबंधित।

मतलब ये है कि अत्यधिक दान देने के कारण ही राजा बलि को बंधक बनना पड़ा और अत्यधिक अहंकार के कारण दुर्योधन का पतन हुआ। इसलिए, किसी भी चीज़ की अति पर भी तो विचार होना ही चाहिए।

अति उदारता भी वर्जित

महाभारत में अति दानी बनने वाला एक पात्र कर्ण है, जिसका ये प्रण है कि जो मांगेगा वो दूंगा। इसी शेखी में उसे सूर्य से रक्षा स्वरूप प्राप्त अपने कवच कुण्डल तक देना पड़े थे और परिणाम क्या हुआ ? उसे बीच मैदान निहत्था, निरीह व्याघ्र की भांति मरना पड़ा। यदि कर्ण तय करता कि याचक की याचना और दान की वस्तु दोनों पर विचार करके ही देने का निर्णय करूंगा तो आज महाभारत को हम अलग तरीके से पढ़ते होते। ऐसे ही उदारता भी अति के स्तर पर जाकर आत्मघाती हो जाती है। अति उदारता भी वर्जित है। आज की राजनीति के परिप्रेक्ष्य निश्चित ही बीते कल की राजनीतिक घटनाओं का पुनर्लेखन कहा जा सकता है लेकिन इतिहास बताता है कि उस वक्त देश के नेतृत्व ने क्या कदम उठाया था।

हर सत्य पथ की परीक्षा में एक नारी उपस्थित

ये सारी बात किश्वर और उनकी किताब को लेकर ही नहीं बल्कि आज देश में विपक्ष की घृणा वाली मनःस्थिति पर विचार की जरूरत के लिए विवश करती है। नेहरू जी के पास भी तो छवि ही थी जो अनेक असत्य प्रचारित कर विखण्डित करने का प्रयास होता रहा है। जब किसी की छवि ही उसका धन हो जाए तो उस छवि को तोड़े बिना शत्रु विजय वरण नहीं कर सकता। पौराणिक कथाओं को उठाकर देखिए हर सत्य पथ की परीक्षा के लिए एक नारी उपस्थित है। छवि बड़ी हो जाए तो छवि ही संकट बन जाती है। कोई ईमानदार के रूप में प्रसिद्ध है तो हठधर्मी बेईमान शत्रु। ऐसे अवसर की तलाश में रहते हैं जिससे ईमानदार को अपनी तरह ही स्खलित चरित्र साबित किया जा सके। इसलिए नाकारा ही सही विद्रूप नीति लगातार कोशिश पर काम करती है।

आज मोदी है एक ब्रांड

गौरतलब है कि भारतीय सियासत में आज मोदी एक ब्राण्ड बना है और इस ब्राण्ड से पार पाना कठिन है। एक अकेला व्यक्ति पूरा चुनाव जीत ले जाता है। छवि जब मजबूत होती है तो छवि को तोड़ने के लिए शत्रु नित्य निरंतर प्रतिपल छल, कपट और मिथ्या प्रलाप से वातावरण निर्मित करता है। शत्रु के कुप्रयासों पर मौन रहना या मुस्कुरा देना भी अच्छी नीति नहीं है। समय, काल और परिस्थितियां बदल जाए तो नीतियां भी बदल ही जाती है।

वरना अयोध्या की कहानी कुछ और होती

वचन के लिए प्राण देने का समय गया। राम आदर्श थे। सीता निःसन्देह पवित्र थी किंतु एक धोबी ने राम की उसी छवि को तोड़ने के लिए कपट का तीर चलाया और अयोध्या की प्रसन्नता को छीन लिया।राम अपने ही गढ़े आदर्श की भेंट चढ़े। पत्नी चली गई। परिवार बिखर गया और प्रायश्चित भोगते राम भी सरयू प्रयाण कर गए।यदि राम धोबी की कुटाई करने के विकल्प पर काम करते तो अयोध्या की कहानी कुछ और होती।

कोई विक्षिप्त ही कर सकता है वह प्रलाप

किश्वर भगवान नहीं हैं। आज वह भीष्म (मोदी) के सामने शिखंडी बनकर खड़ी हैं, और शिखंडी कौन है? पिछले पृष्ठ पर वही राजसी कन्या हैं जिनका विवाह प्रस्ताव भीष्म ने ठुकरा दिया था। मधु किश्वर अविमुक्तेश्वर खेमे से हैं। इतिहास पलटकर देखिए, मोदी जी अब "न भूतों न भविष्यती" नेता कह रहे हैं। जब उन्हें 2014 में कुछ विरोधाभासी घटना का पता चला, तो उन्होंने 2022 तक मोदी को महाननायक क्यों कहना जारी रखा? महत्वाकांक्षी महिला ही तो है किश्वर जो सब कुछ फँसाती है, जो लालची लोग फँसाते हैं। जब उन्हें राज की उपाधि, पद्म श्री, प्रधानमंत्री की विशेष कृपा आदि नहीं मिली, तो वह लंबे समय तक पागलों की तरह व्यवहार करती रहीं और फिर उसी अवस्था में उन्होंने वही उन्माद किया जो कोई पागल करता है।

महापुरुष उदार ही नहीं हो जाते प्रचंड

मोदीनामा लिखकर किसने हंगामा खड़ा करने की कोशिश की और इस अभियान का मास्टरमाइंड कौन बना? वे सभी जो मोदी की उदारता के ऋणी हैं। ज्योतिषीय भविष्यवाणियां: 2027 के आसपास बड़ा राजनीतिक उथल-पुथल। और मोदी के बैरग्य की बात हो लेकिन हम चांटे हैं। मोदी को अपने अंतिम दौर से पहले अपना विश्व रूप दिखाना होगा ताकि इतिहास याद रखे कि महान पुरुष न केवल उदार होते हैं, बल्कि वे उग्र और निडर भी हो सकते हैं।

⚫त्रिभुवनेश भारद्वाज "शिवांश" रतलाम