मुद्दे की बात “उपदेशों का लोकतंत्र और मौन की सत्ता : जनता पूछ रही है, क्या केवल सुनना ही उसका दायित्व है?”
आज सत्ता जनता से मितव्ययिता का आग्रह करती है। कहा जाता है — “ईंधन बचाइए”, “अनावश्यक खर्च मत कीजिए”, “सोना मत खरीदिए”, “संयमित जीवन अपनाइए।” परंतु जनता यह भी देखती है कि वही सत्ता स्वयं भव्य आयोजनों, विशाल काफिलों, प्रचार यात्राओं और प्रदर्शनवादी राजनीतिक संस्कृति में निरंतर संलग्न रहती है। छोटे-छोटे उद्घाटनों तक के लिए अपार सरकारी संसाधन लगाए जाते हैं, प्रशासनिक तंत्र सक्रिय होता है।
⚫ बृजेश त्रिवेदी
भारत का लोकतंत्र आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है, जहाँ जनता के भीतर प्रश्न बढ़ रहे हैं और सत्ता के मंचों से उपदेशों की प्रतिध्वनि लगातार गूंज रही है। स्वतंत्रता के बाद जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था की कल्पना जनसरोकार, संवाद, समानता और उत्तरदायित्व के आधार पर की गई थी, वही व्यवस्था आज अनेक नागरिकों के मन में यह प्रश्न उत्पन्न कर रही है कि आखिर सरकार का वास्तविक दायित्व क्या है? क्या शासन केवल भाषणों, उद्घाटनों, घोषणाओं और मंचीय प्रतीकों तक सीमित रह गया है, अथवा जनता की पीड़ा, संघर्ष और आशंकाओं को सुनना भी उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है?

तो क्या त्याग और अनुशासन केवल जनता के लिए
आज सत्ता जनता से मितव्ययिता का आग्रह करती है। कहा जाता है — “ईंधन बचाइए”, “अनावश्यक खर्च मत कीजिए”, “सोना मत खरीदिए”, “संयमित जीवन अपनाइए।” परंतु जनता यह भी देखती है कि वही सत्ता स्वयं भव्य आयोजनों, विशाल काफिलों, प्रचार यात्राओं और प्रदर्शनवादी राजनीतिक संस्कृति में निरंतर संलग्न रहती है। छोटे-छोटे उद्घाटनों तक के लिए अपार सरकारी संसाधन लगाए जाते हैं, प्रशासनिक तंत्र सक्रिय होता है और करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। तब सामान्य नागरिक के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या त्याग और अनुशासन केवल जनता के लिए आरक्षित कर दिए गए हैं?
तो वहां पर सामूहिक परिवहन की व्यवस्था क्यों नहीं
यदि राष्ट्रहित में ईंधन बचाना आवश्यक है, तो क्या यह सिद्धांत सत्ता के गलियारों में लागू नहीं होना चाहिए? क्यों प्रत्येक मंत्री के लिए अलग वाहन, प्रत्येक अधिकारी के लिए पृथक कार, प्रत्येक कार्यक्रम के लिए लंबा काफिला आवश्यक माना जाता है? क्यों संसद, सचिवालय और मंत्रालयों के लिए सामूहिक परिवहन व्यवस्था विकसित नहीं की जाती? यदि सामान्य कर्मचारी बसों और ट्रेनों में यात्रा कर सकते हैं, तो जनप्रतिनिधि ऐसा क्यों नहीं कर सकते?
प्रदर्शन बनाम लोकतंत्र
डिजिटल युग में जनता को “वर्क फ्रॉम होम” और “वर्चुअल मीटिंग” का संदेश दिया जाता है, परंतु सत्ता का बड़ा भाग आज भी भौतिक उपस्थिति और छवि-निर्माण पर आधारित दिखाई देता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो लोकतंत्र धीरे-धीरे प्रशासन से अधिक प्रदर्शन का माध्यम बनता जा रहा हो।
तो क्या काले धन की जड़े हो गई खत्म
नोटबंदी इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनकर उभरी। एक रात में राष्ट्र की आर्थिक संरचना पर गहरा प्रभाव डालने वाला निर्णय लागू कर दिया गया। जनता घंटों लाइनों में खड़ी रही, छोटे व्यापारी टूट गए, श्रमिक वर्ग परेशान हुआ, आर्थिक गतिविधियां रुक गईं — परंतु वर्षों बाद भी यह प्रश्न बना रहा कि क्या भ्रष्टाचार वास्तव में समाप्त हुआ? क्या काले धन की जड़ें सचमुच खत्म हो गईं? जनता ने कष्ट सहा, पर परिणाम आज भी विवाद और विमर्श का विषय बने हुए हैं।
तब खोने लगते हैं जन विश्वास
इसके पश्चात जीएसटी व्यवस्था आई। उद्देश्य चाहे कर प्रणाली को एकीकृत करना रहा हो, परंतु छोटे व्यापारियों और मध्यम वर्ग ने वर्षों तक उसकी जटिलताओं का भार उठाया। व्यापार करने वाला वर्ग स्वयं को नियमों, पोर्टलों और कर प्रक्रियाओं के बीच उलझा हुआ अनुभव करने लगा। सुधार आवश्यक होते हैं, परंतु जब सुधार संवाद से अधिक आदेश में परिवर्तित हो जाएं, तब वे जनविश्वास खोने लगते हैं।
संवेदना से अधिक मौन
कृषि कानूनों का प्रसंग भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक गहरे प्रश्न की भांति अंकित हो चुका है। डेढ़ वर्ष तक किसान सड़कों पर बैठे रहे। मौसम बदलते रहे, परिवार टूटते रहे, सैकड़ों किसानों की मृत्यु की खबरें आती रहीं, परंतु सत्ता के गलियारों में लंबे समय तक संवेदना से अधिक मौन सुनाई दिया। आंदोलनरत किसानों को “आंदोलनजीवी” कहकर संबोधित किया गया। अंततः परिस्थितियों और जनदबाव के बीच कृषि कानून वापस लिए गए, परंतु उस संघर्ष ने लोकतंत्र के भीतर संवादहीनता की पीड़ा को उजागर कर दिया।
तब लोकतंत्र का विश्वास होने लगता है कमजोर
आज यही स्थिति शिक्षा और युवाओं के अनेक प्रश्नों में भी दिखाई देती है। छात्र विभिन्न नीतियों और व्यवस्थाओं के विरोध में महीनों से आवाज उठा रहे हैं। यूजीसी से जुड़े विषयों पर हजारों छात्र लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं, परंतु उन्हें सुनने की संवेदनशीलता सत्ता में दिखाई नहीं देती। जनता की आवाज़ जब लंबे समय तक अनसुनी रह जाए, तब लोकतंत्र का विश्वास कमजोर होने लगता है।
नीति और संवेदना के मध्य दूरी का था वह प्रतीक
कोरोना काल की स्मृतियां तो इस व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक बन चुकी हैं। राष्ट्र के पास बसें थीं, रेल थीं, संसाधन थे, ईंधन था — फिर भी लाखों मजदूर पैदल चलने को विवश हुए। भूख, थकान और असुरक्षा के बीच सड़कों पर चलता हुआ वह भारत केवल एक दृश्य नहीं था; वह नीति और संवेदना के मध्य की दूरी का प्रतीक था। यदि मनुष्य से मनुष्य को संक्रमण का खतरा था, तो क्या वह खतरा केवल बसों और ट्रेनों में था? क्या भूख और बेबसी का कोई मूल्य नहीं था?
नारे और वास्तविकता के मध्य अंतर स्पष्ट
स्वदेशी की अवधारणा भी आज प्रश्नों के घेरे में खड़ी दिखाई देती है। भाषणों में आत्मनिर्भरता का स्वर गूंजता है, परंतु वास्तविकता यह है कि अनेक आवश्यक वस्तुएं, तकनीकें और यहां तक कि जीवनरक्षक दवाओं का कच्चा माल भी विदेशों से आता है। यदि विदेशी निर्भरता चिंता का विषय है, तो यह प्रश्न केवल सोने और ईंधन तक सीमित क्यों रहे? क्या दवाओं का सेवन भी रोक दिया जाए? यही वह बिंदु है जहाँ नारे और वास्तविकता के मध्य का अंतर स्पष्ट दिखाई देता है।
सोने को लेकर छोटे व्यापारियों की भीतर चिंता
सोने को लेकर दिए गए वक्तव्यों ने भी छोटे व्यापारियों के भीतर चिंता उत्पन्न की है। सराफा व्यापारी पूछ रहा है — यदि लोग 5 ग्राम, 10 ग्राम सोना भी न खरीदें, तो उसकी दुकान कैसे चलेगी? उसका परिवार कैसे जीवित रहेगा? और यदि वह व्यवसाय बदलकर चाय-पकौड़े का ठेला लगाए, तो महंगे गैस सिलेंडर के बीच वह भी कैसे संभव होगा? यही वास्तविक अर्थव्यवस्था है — जहाँ बड़े मंचों के भाषण नहीं, बल्कि रोज़ की बिक्री, छोटा व्यापार और घर का चूल्हा महत्वपूर्ण होता है।
तब होता है बड़ा संकट खड़ा
लोकतंत्र का सबसे बड़ा संकट तब उत्पन्न होता है जब जनता को यह अनुभव होने लगे कि उसकी भूमिका केवल सुनने तक सीमित कर दी गई है। सत्ता हर विषय पर जनता के बीच जाकर अपील करती है, परंतु जब वही जनता अपने प्रश्न, अपने संघर्ष और अपनी पीड़ा लेकर खड़ी होती है, तब उसे सुनने में वर्षों लग जाते हैं। यह स्थिति लोकतंत्र को संवाद से दूर और आदेश की व्यवस्था के निकट ले जाती है।
तब लोकतंत्र खोने लगता है नैतिक आधार धीरे-धीरे
इतिहास साक्षी है कि महान राष्ट्र उपदेशों से नहीं, उदाहरणों से निर्मित होते हैं। जब सत्ता स्वयं सादगी अपनाती है, तब जनता भी त्याग के लिए प्रेरित होती है। जब नेतृत्व स्वयं अनुशासन का पालन करता है, तब समाज में विश्वास उत्पन्न होता है। परंतु जब जनता के लिए संयम और सत्ता के लिए अपवाद निर्मित होने लगें, तब लोकतंत्र धीरे-धीरे अपना नैतिक आधार खोने लगता है।
संवेदनशील उत्तरदायित्व का नाम है लोकतंत्र
लोकतंत्र अभिनय नहीं है। यह केवल परिधान बदलने, मंच बदलने और भाषण बदलने की कला भी नहीं है। लोकतंत्र संवेदनशील उत्तरदायित्व का नाम है। जनता को उपदेश देना सरल है, पर जनता को सम्मानपूर्वक सुनना ही शासन की वास्तविक परीक्षा है।
सत्ताधीशों को जरूरत आत्म मंथन की
राष्ट्र केवल सत्ता से नहीं चलता; राष्ट्र चलता है विश्वास से। और जब जनता के भीतर यह प्रश्न उठने लगे कि उसकी आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं, तब सत्ता को भाषणों से अधिक आत्ममंथन की आवश्यकता होती है।
⚫ यह लेखक के अपने विचार हैं संपादक की सहमति जरूरी नहीं।
Hemant Bhatt