विचार सरोकार : मजदूर दिवस, श्रम की गरिमा और मानवता का उत्सव
1 मई, जिसे हम 'अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस' के रूप में मनाते हैं, केवल एक कैलेंडर की तारीख नहीं है यह उस पसीने का सम्मान है जिससे सभ्यता का निर्माण हुआ है। हम सभी को राष्ट्र की असली नींव श्रमिक के हर श्रम का सम्मान करना चाहिए। किसी भी राष्ट्र की प्रगति का पहिया इंजीनियरों के नक्शों से ज्यादा मजदूरों के कंधों पर टिका होता है।
⚫ मजदूर दिवस पर विशेष
⚫ उमा त्रिवेदी, बैंगलोर
दुनिया की हर ऊँची इमारत, हर दौड़ती सड़क और हर आधुनिक सुविधा के पीछे उन हाथों का संघर्ष छिपा है, जिनमें अक्सर छाले होते हैं। 1 मई, जिसे हम 'अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस' के रूप में मनाते हैं, केवल एक कैलेंडर की तारीख नहीं है यह उस पसीने का सम्मान है जिससे सभ्यता का निर्माण हुआ है। हम सभी को राष्ट्र की असली नींव श्रमिक के हर श्रम का सम्मान करना चाहिए। किसी भी राष्ट्र की प्रगति का पहिया इंजीनियरों के नक्शों से ज्यादा मजदूरों के कंधों पर टिका होता है।

हम अक्सर 'सफलता' को सफेद कॉलर वाली नौकरियों से जोड़ देते हैं, लेकिन सच तो यह है कि श्रम की कोई श्रेणी नहीं होती। चाहे वह खेतों में तपता किसान हो, निर्माण स्थल पर ईंटें ढोता मजदूर हो,या सड़कों की सफाई करता सफ़ाईकर्मी हर एक का योगदान समान रूप से पूजनीय है।

"श्रम वह सोना है जिससे मनुष्य अपना भाग्य और राष्ट्र का भविष्य गढ़ता है।" मजदूर मशीन नहीं, एक भावना है अक्सर हम मजदूरों को केवल 'मैनपावर' या आंकड़ों के रूप में देखते हैं। हम भूल जाते हैं कि उस फटे कुर्ते और धूल भरे चेहरे के पीछे भी एक पिता है जो अपने बच्चों के सपनों के लिए अपनी नींद कुर्बान करता है, एक माँ है जो तपती धूप में भी वात्सल्य नहीं खोती।
मजदूर का मानवीय पक्ष उसकी अतुलनीय सहनशक्ति में झलकता है। वह अभावों में भी मुस्कुराना जानता है और अपनी मेहनत की रोटी में जो मिठास पाता है,वह शायद महलों के छप्पन भोग में भी न मिले। उनका श्रम केवल शारीरिक नहीं, बल्कि भावनात्मक निवेश भी है।
छोटा समझने की मानसिकता को त्यागे
हमारा दायित्व होना चाहिए कि हम केवल सहानुभूति नहीं, गरिमा दें। मजदूर दिवस मनाने की सार्थकता तभी है जब हम उनके प्रति अपना नजरिया बदलें। उन्हें 'छोटा' समझने की मानसिकता का त्याग करें। उनके साथ समानता और एकरूपता का भाव रखें। उनके श्रम का समय पर और सम्मानजनक भुगतान सुनिश्चित हो। एक उचित मूल्य हो । कड़कड़ाती धूप में काम करते मजदूर को पानी पूछ लेना या मुस्कुराकर बात कर लेना,किसी बड़े पुरस्कार से कम नहीं है अतः उनके प्रति संवेदनशीलता जरूर रखें। अर्थात आज का दिन संकल्प लेने का है कि हम श्रम की चोरी न करें और श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करें। आइए, इस 1 मई को उन हाथों को नमन करें जो खुद तपकर हमारे जीवन को शीतल और सुलभ बनाते हैं।
जय हिंद
जय श्रमिक!
⚫उमा त्रिवेदी, बैंगलोर, कर्नाटक
Hemant Bhatt