स्मृति शेष : संस्कारवान पीढ़ी के निर्माता थे  " बाबूजी "

सेवानिवृत्ति के पश्चात का जीवनकाल उन्होंने सामाजिक कार्यों को दिया। वह समाज में बिना पद लिए नीव के पत्थर की तरह रहे।

स्मृति शेष : संस्कारवान पीढ़ी के निर्माता थे  " बाबूजी "

सतीश त्रिपाठी

भविष्य की पीढ़ी को संस्कार देना आसान नहीं है लेकिन जिन्होंने अपने पुत्रों को ही संस्कार नहीं दिए अपितु अपने जीवन के नौ दशक में समाज में पूरी संस्कारवान पीढ़ी को तैयार कर दी ऐसे सरल , सहज , बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे शिक्षक श्री घनश्यामलाल त्रिपाठी जिन्हें  हम सभी  " बाबूजी " कहकर संबोधित करते थे l

 "बाबूजी " का स्वास्थ्य विगत दिनों से खराब था l लेकिन  उनमें अद्भुत दृढ़ इच्छा शक्ति थी। शनिवार ( 30 अगस्त ) को   सूचना मिली कि "बाबूजी" नहीं रहे। समाज  में शोक की लहर छा गई l

ढाई दशक तक मिला मार्गदर्शन

विगत 25 वर्षों से "बाबूजी" से मेरा सामाजिक कार्यक्रमों में मिलना होता रहा है। श्री महर्षि श्रृंग विद्यापीठ का स्थापना काल हो या श्री गणेश मांगलिक भवन का नवनिर्माण "बाबूजी" ने हमेशा मार्गदर्शन दिया। सेवानिवृत्ति के पश्चात का जीवनकाल उन्होंने सामाजिक कार्यों को दिया। वह समाज में बिना पद लिए नीव के पत्थर की तरह रहे। श्री महर्षि श्रृंग विद्यापीठ की स्थापना के दौरान "बाबूजी " ने मुझे व्यक्तिगत मार्गदर्शन दिया।

हमेशा दिया रचनात्मक कार्यों को समर्थन

"बाबूजी" से मेरी मुलाकात अधिकांश  तत्कालीन श्री सिखवाल समाज देवस्थान  न्यास अध्यक्ष श्री रणछोड़लाल  व्यास (अब नहीं रहे ) के  निवास माणक चौक पर हुआ करती थी। उन्होंने सदैव रचनात्मक कार्यों को समर्थन दिया। "बाबूजी" की सेवानिवृत्ति ( शिक्षक ) को लगभग 36 वर्ष हो गए। उसके बावजूद आज भी उनकी पहचान नामली वाले मास्टर साहब के रूप में है।  इससे यह समझा  जा सकता है कि वह अपने शिक्षक जीवन को सार्थक रूप देकर दुनिया को अलविदा कह गए। "बाबूजी" को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि l

सतीश त्रिपाठी,
(अपर लोक अभियोजक एवं शासकीय अभिभाषक रतलाम )