शख्सियत : उर्दू को सांप्रदायिक नजरिये से देखना तंग दिमागी सोच

हिंदी की बोलियों (खड़ी बोली) और फ़ारसी अरबी के मेल से उर्दू का जन्म हुआ और आरंभिक दौर में इसे ’हिंदवी’ या ’हिंदुस्तानी’ कहा जाता था और 18-19 सदी के आसपास यह उर्दू कही जाने लगी। इसलिए यह कहना गलत है कि उर्दू का जन्म तथा विकास विदेश में हुआ, बल्कि इसकी पैदाइश भारत में हुई है। इसलिए इसे ’कठमुल्लो’ की भाषा कहना दिमागी दिवालियापन है। 

शख्सियत : उर्दू को सांप्रदायिक नजरिये से देखना तंग दिमागी सोच

शायर शफ़ीक़ मुराद का कहना

⚫ नरेंद्र गौड़

 ’यह कहना सही नहीं है कि उर्दू का जन्म किसी विदेशी भूमि में हुआ है, बल्कि भारत में इस भाषा ने सिर्फ जन्म ही नहीं लिया, वरन् यही इसका विकास भी हुआ है। उर्दू ही नहीं किसी भी भाषा को  सांप्रदायिक नजरिए से देखना तंग दिमागी सोच का परिणाम है। उर्दू भाषा लगभग 800 से 900 वर्ष पुरानी मानी जाती है। इसका विकास 12 वीं शताब्दी के आसपास दिल्ली और उसके समीपवर्ती क्षेत्रों में हुआ।’


 यह बात पंजाब (पाकिस्तान) में जन्में लेकिन विगत चालीस साल से जर्मनी में रह रहे सुप्रसिध्द शायर ज़नाब शफ़ीक़ मुराद ने कही। इनका कहना था कि हिंदी की बोलियों (खड़ी बोली) और फ़ारसी अरबी के मेल से उर्दू का जन्म हुआ और आरंभिक दौर में इसे ’हिंदवी’ या ’हिंदुस्तानी’ कहा जाता था और 18-19 सदी के आसपास यह उर्दू कही जाने लगी। इसलिए यह कहना गलत है कि उर्दू का जन्म तथा विकास विदेश में हुआ, बल्कि इसकी पैदाइश भारत में हुई है। इसलिए इसे ’कठमुल्लो’ की भाषा कहना दिमागी दिवालियापन है। 

अमीर ख़ुसरो उर्दू के पहले कवि

 जनाब शफ़ीक़ मुराद का कहना था कि 12 वीं से 16 वीं शताब्दी के दौरान मध्यकालीन दिल्ली सल्तनत के दौर में तुर्की और स्थानीय भारतीय संस्कृतियों के मेल मिलाप से यह भाषा विकसित हुई। अमीर खुसरो  (1253-1325) को उर्दू का पहला बड़ा कवि माना जाता है, जिन्होंने इस मिश्रित भाषा अर्थात ’हिंदवी’ में पहेलियां और दोहों की रचना की थी।

उर्दू का मतलब छावनी या लश्कर

एक सवाल के जवाब में शफ़ीक़ साहब का कहना था कि उर्दू को शुरू में हिंदवी, हिंदी ज़बान -ए -देहली या दक्कनी कहा जाता था। उर्दू एक तुर्की शब्द है जिसका अर्थ है ’छावनी’ या ’लश्कर’ और यह नाम 18 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में प्रचलित हुआ। यह भी ग़ौरतलब है कि उर्दू और हिंदी की व्याकरणिक संरचना समान है, जो भारत की गंगा जमुनी तहजीब का एक अनूठा उदाहरण है।

जर्मनी के लोकप्रिय शायर

 मोहतरम शफ़ीक़ मुराद का जन्म पंजाब पाकिस्तान में हुआ, लेकिन चालीस बरस से जर्मनी में निवासरत हैं। उर्दू अदब की दुनिया में इनकी पहचान ग़ज़ल के शायर के तौर पर है। जर्मनी के साहित्यजगत में इनका नाम अदब से लिया जाता है। वहां प्रवास करते हुए इन्होंने काव्यप्रेमियों के बीच शायरी की शमा को जलाये रखने में अहम् भूमिका का निर्वाह किया है। इनकी शायरी शब्दों की बाजीगरी नहीं, बल्कि यह आदमियत की भीतरी परतों में छिपे हुए सुख दुख का प्रतिबिम्ब है जो प्रवास और विस्थापन के संगम पर जन्म लेती है। हाल ही में इनकी शानदार ग़ज़लों का संकलन ’शह्-ए-मुराद’ प्रकाशित हुआ है। इसमें शामिल ग़ज़लों  के बारे में कुवैत में रह रहे मशहूर शायर तथा ’गल्फ़ उर्दू कौंसिल’ के अध्यक्ष डाॅ. अफ़रोज़ आलम का कहना है कि शफ़ीक़ मुराद की ग़ज़लों में रदीफ़ और का़फ़िये का चयन केवल तुकबंदी के लिए नहीं होता है, बल्कि वह इसके जरिए अर्थवत्ता की एक नई दुनिया निर्मित करते हैं। इनमें जज्बात की सच्चाई, भावों की कसौटी और वैचारिकता की एक खूबसूरत नक्का़शी है।

शफ़ीक़ मुराद की ग़ज़लें

भूल जाता है वो अक्सर गुफ्तगू करते हुए
मैं ही शह-ए- आरजू था आरजू करे हुए
मैं ही ह़र्फ -ए तमन्ना मैं ही था शह-ए-मुराद
मैं ही सजदों में बसा था जुस्तजू करते हुए
मैं ही था दस्त-ए-तलब में, मैं ही था हर्फ-ए-दुआ
जिंदगी के रास्तों को ख़ूबरू करते हुए
ढूंढता है आईने में वो मेरा हुस्न-ए-नज़र
और शरमाता है ख़ुद को रूबरू करते हुए
चाहतों के एक समंदर में हुए थे गो़त़ा जन
और हम निकले फ़ज़्ाा को मुश्कबू करते हुए
छुप गया शर्मा के फिर वो बादलों की ओट में 
चांद को देखा था तेरे रू ब रू करते हुए
रौशनी के फैलने का एक मंज़र था ’मुराद’
चांद चेहरा शायरी के रूबरू करते हुए।

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(दो)

यूं तो कहने को है ज़िंदगी राईगां
छोड़ जाएगे फिर भी हम अपना निशां
मेरी बातों को मा’नी न दे पाये वो
देखते ही रहे मेरा हुस्न-ए-बयां
ज़िंदगी जिन के कदमों में गुजरी मेरी 
वो समझते हैं वो हो गये राईगां
ज़र्रे ज़र्रे में उस का ही मंज़र मिले 
हुस्न फैला है जिस का जहां दर जहां
मेरे ’होने’ ने मह़दूद मुझ को किया
वरना फैला हुआ था करां ता करां
हा़सिल-ए-जिं़दगी बस यही है ’मुराद’
या इश्क़-ए-खु़दा या इश्क़-ए-बुतां

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(तीन)

था तेरे पहलू में मुझ को रौशनी मिलती गई
एक मरीज़-ए-इ’श्क़ को यूं ज़िंदगी मिलती गई
इस त़रह़ से रौशनी का सिलसिला चलता गया
आदमी को आदमी से आगही मिलती गई
सोच के इस दश्त में थी तीरगी ही तीरगी
चांद चेहरे से नज़्ार को रौशनी मिलती गई
फासले बढ़ते गए अपनी अनाओं के तुफै़ल
दोनों थे खु़द्दार फिर भी ख़ुदी मिलती गई
मैंने तो अल्फ़ाज़ को शे’रों में ढाला था ’मुराद’
जाने उस के हुस्न से क्यूं शायरी मिलती गई
थी तमन्ना, ख़्वाब थी या एक हकी़क़त थी ’मुराद’
पैरहन तब्दील कर के ज़िंदगी मिलती गई।

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(चार)

सोच जब पुर ख़ुमार रहती है
हर त़रफ ही बहार रहती है
वो जो सोचो पे बहार रहती है
ख़ुद भी वो बे क़रार रहती है
इ’श्क़ के मौसमों से गुज़रा हूं
एक शब -ए-इंतिजा़र रहती है
अब मेरा सामना नहीं करती 
ज़िंदगी शर्मसार रहती है
आंख पुर नम है और लब ख़ामोश
बात कोई तो यार रहती है
वो तो रहता है दिल में बर्सों से 
चश्म बर इंतिज़ार रहती है
बाद रुख़्सत के भी शफ़ीक़ ’मुराद’
कैफियत बर क़रार रहती है।

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(पांच)

उन से मिलने का बंद-ओ-बस्त किया
हमने ख़ुद को है लख़्त लख़्त किया 
उनको चाहा है इतनी शिद्दत से
हमने ख़ुद को है ख़ुद परस्त किया
वस्ल की शब जु़नूं के लम्हों को
जग ग़जारा तो सर गुज़श्त किया
उनको खुद पर न ऐतमाद रहा
उसने लहजे को आज सख़्त किया
अपनी सोच समेटकर मैंने 
दश्त-ए-इमकान को ही तख्त किया
याद बांधी गिरह में हमने ’मुराद’
और फिर याद ही को रख़्त किया।

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(छह)

जो जज़्बों पर थे क़ायम वो भी रिश्ते टूटते देखे
वफ़ा के सच्चे बंधन और वादे टूटते देखे
शब-ए-ग़म में बुझा रक्खे थे सांसों के दिए हमने
सुकूं तारी था जिन पर वो भी लम्हे टूटते देखे
हमारी ज़िंदगी तो रतजगा थी जागते गुज़री न देखे थे जो आंखों ने वो सपने टूटते देखे
वफ़ा की प्यार की डोरी में जो हमने पिरोए थे 
वो मोती आंसुओं के हमने सारे टूटते देखे
न जाने क्या छुपा हो तेरी चाहत के समुंदर में 
कि मैंने रात बचपन में खिलौने टूटते देखे
मुराद इस इ’श्क़ के हाथों मिली रुसवाइयां सबको 
कहीं दिल तो कहीं किस्मत के तारे टूटते देखे।

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(सात)

खेल है या कोई तमाशा है 
ज़िंदगानी का क्या खुलासा है
आगही को चिराग है रौशन 
हाथ में बेखुदी का कासा है
ज़िंदगी में ये हिजरतों का नशा
एक नये बाब का इज़ाफा है
बुझ गई प्यास तो लगा हमको
तिशनगी जिस्त का असासा है
मुझको बख्शा है किस ने शौक़-ए-जुनूं
मेरी बातों में किस का खासा है?
न कोई है सराब आंखों में 
न किसी ख्वाब का दिलासा है
कोई झूठा नहीं शफ़ीक़ ’मुराद’
सारे सच्चे हैं क्या तमाशा है।

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